Ramayan : Ram-Sita Vivaah Story in hindi part 1

Ramayan : Ram-Sita Vivaah Story in hindi part 1

रामायण : राम सीता विवाह कहानी(कथा) पार्ट 1

अहिल्या जी पर कृपा करके भगवान राम-लक्ष्मण मुनि विश्वामित्र के साथ चले हैं लेकिन आज प्रभु को हर्ष नही हैं थोड़ा दुःख हैं। की आज मैंने मुनिवर की पत्नी को चरणों से स्पर्श किया हैं। हालाँकि होना तो नही चाहिए लेकिन फिर भी भगवान हैं ना। दुःख हैं की मैं एक क्षत्रिय कुल में आया हूँ और एक ब्राह्मण की पत्नी को मेरे पैरों का स्पर्श हुआ हैं। फिर भगवान गंगा जी के तट पर पहुंचे हैं। वहां पर विश्वामित्र जी ने गंगा माँ की कथा सुनाई हैं की किस प्रकार से गंगा जी धरती पर आई। तब प्रभु ने ऋषियों सहित (गंगाजी में) स्नान किया। ब्राह्मणों ने भाँति-भाँति के दान पाए। गंगा स्नान करने के बाद भगवान प्रसन्न होकर चले और सोच रहे हैं की जो थोड़ा बहुत पाप हुआ होगा वो गंगा स्नान से दूर हो गया होगा। और फिर भगवान जनकपुर के निकट पहुँच गए हैं। जिस नगर की सोभा का गोस्वामी जी ने सुंदर वर्णन किया हैं। श्री रामजी ने जब जनकपुर की शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मण सहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृत के समान जल है और मणियों की सीढ़ियाँ (बनी हुई) हैं। जहाँ नगर के (सभी) स्त्री-पुरुष सुंदर, पवित्र, साधु स्वभाव वाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान हैं।

भगवान विश्वामित्र जी एक साथ एक आम के बगीचे में ठहरे हैं। और मुनि ने कहा की मैं यहाँ बैठा हूँ तुम दोनों भाई जाकर फूल ढूंढिए। मुझे पूजा करनी हैं। विश्वामित्र जी एक सुंदर भूमिका तैयार कर रहे हैं। भगवान को फुलवाड़ी लेने के लिए भेज दिया हैं। इधर जनक जी को खबर हुई हैं तो तुरंत विश्वामित्र जी से मिलने तुरंत आये हैं। इनके साथ में विद्वान, ब्राह्मण और मंत्री भी हैं। विश्वामित्र जी को बहुत सम्मान दिया हैं। चरण धोये हैं। और आसान पर बिठाया हैं। जब सब बैठ गए हैं तभी दोनों भाई वहां आ गए हैं। विश्वामित्र जी ऐसे ही चाहते थे की जब सारी सभा बैठी हो तब राम और लक्ष्मण आएं। और इसी तरह से हुआ। जब दोनों भाई आये तो उनका रूप देखकर सभी दंग रह गए और जनन जी समेत सारी सभा खड़ी हो गई हैं। दोनों भाइयों को देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रों में आनंद और प्रेम के आँसू उमड़ पड़े और शरीर रोमांचित हो उठे। रामजी को देखकर विदेह (जनक) विशेष रूप से विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) हो गए।

अब जनक जी ने पूछ लिया हैं की ये दोनों सुंदर बालक कौन हैं? जिनका दर्शन करते ही मेरे मन ने जबर्दस्ती ब्रह्मसुख को त्याग दिया है।  इनका दर्शन करने के बाद मेरे मन में प्रेम उमड़ रहा हैं। कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥

जनक जी ने अपने प्रेम को योग-भोग रूपी डिब्बे के बीच में बंद करके रखा हुआ था। वो आज जाग्रत हो गया हैं। और बार-बार विश्वामित्र जी पूछ रहे हैं ये कौन हैं?

विस्वामित्र जी कहते हैं- ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी॥ जहाँ तक संसार में लोग हैं ना ये सबको प्यारे लगते हैं।

मुनि की रहस्य भरी वाणी सुनकर श्री रामजी मन ही मन मुस्कुराते हैं  हँसकर मानो संकेत करते हैं कि रहस्य खोलिए नहीं। भगवान सोच रहे हैं की ये भेद ना खोल दें की मैं भगवान हूँ।

जनक जी सोच रहे हैं की मैं पूछ रहा हूँ ये कौन हैं? और मुनि कहते हैं ये सबको प्यारे लगते हैं।

तब मुनि ने कहा- ये रघुकुल मणि महाराज दशरथ के पुत्र हैं। मेरे यज्ञ को पूरा करने के लिए  राजा ने इन्हें मेरे साथ भेजा है। राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बल के धाम हैं। सारा जगत (इस बात का) साक्षी है कि इन्होंने युद्ध में असुरों को जीतकर मेरे यज्ञ की रक्षा की है।

ये सुंदर श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई आनंद को भी आनंद देने वाले हैं। सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता॥

मानो आज मुनि इस बात का जनक जी को संकेत कर रहे हैं की इन्होने मेरा यज्ञ तो पूर्ण करवा दिया हैं तुम चिंता मत करो तुम्हारा भी यज्ञ भी ये ही पूरा करवाएंगे।

इसके बाद जनक जी इनको जनकपुर में लेकर आये हैं। और एक सुंदर महल जो सब समय (सभी ऋतुओं में) सुखदायक था, वहाँ राजा ने उन्हें ले जाकर ठहराया। संत-महात्मा बताते हैं की ये जानकी जी(सीता जी) का निवास हैं। और जानकी को अपने महल में बुला लिया है।

रघुकुल के शिरोमणि प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऋषियों के साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मण समेत बैठे।

गोस्वामी जी कहते हैं की जब दोपहर हुई तो लक्ष्मण जी के मन में एक लालसा जगी हैं। क्यों ना हम जनकपुर देख कर आएं? परन्तु प्रभु श्री रामचन्द्रजी का डर है और फिर मुनि से भी सकुचाते हैं, इसलिए कुछ बोल नही पाते हैं और मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं।

एक बात सोचने की हैं की लक्ष्मण जी के ह्रदय में आज तक कोई लालसा नही जगी हैं। बस एक ही लालसा हैं की भगवान राम के चरणों में प्रीति जगी रहे। लेकिन आज क्यों लालसा जगी हैं। इसका एक कारण हैं जो संत महात्मा बताते हैं- लक्ष्मण जी कहते हैं ये मेरी माँ का नगर हैं। क्योंकि लक्ष्मण सीता जी को माँ ही कहते थे। और कौन होगा जिसका मन अपने ननिहाल को देखने का ना करे? बस इसलिए आज लालसा लगी हैं।

लेकिन भगवान राम जान गए हैं आज लक्ष्मण की अभिलाषा। अब रामजी ने गुरुदेव को कह दिया हैं की-

नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं॥ जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौं॥

हे गुरुदेव! आज मेरा लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, लेकिन आप के डर और संकोच के कारण बोल नही पा रहा हैं । यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं इनको नगर दिखलाकर तुरंत ही वापस ले आऊँ।

गुरूजी कहते हैं- अच्छा ठीक हैं अगर लक्ष्मण नगर देखना चाहता हैं तो उसे भेज दो। जनक जी के नौकर खड़े हैं मैं उन्हें बोल देता हूँ और वो दिखाकर ले आएंगे।

राम जी कहते हैं- नही, नही, गुरुदेव बात ऐसी हैं यदि मैं दिखाने चला जाता तो? मैं साथ चला जाऊं?

गुरुदेव बोले-  बेटा, देखना उसे हैं, दिखाएंगे जनक जी के नौकर। तुम क्यों परेशान हो रहे हो? तुम क्या करोगे? आज गुरुदेव रामजी के मन की भी देखना चाह रहे हैं।

राम जी बोले गुरुदेव , अगर मैं साथ जाता तो अच्छे से दिखा कर लाता।

गुरुदेव बोले की अच्छा, तुम पहले से जनकपुर देख चुके हो क्या? क्योंकि वो ही दिखायेगा जिसने खुद देखा हो।

रामजी ने संकेत किया- गुरुदेव, लखन छोटा हैं। कहीं नगर देखने के चक्कर में ज्यादा देर ना लगा दे। अगर मैं जाऊंगा ना, तो लक्ष्मण को तुरंत ले आऊंगा।

 गुरुदेव ने आज्ञा दे दी हैं। और कहा हैं अपने सुंदर मुख दिखलाकर सब नगर निवासियों के नेत्रों को सफल करो। दोनों भाई मुनि के चरणकमलों की वंदना करके चले हैं।

आज सबसे पहले बालकों ने भगवान के रूप का दर्शन किया है। और बालक इनके साथ हो लिए हैं।

एक सखी कहती हैं ए दोऊ दसरथ के ढोटा। ये दसरथ के पुत्र हैं। लक्ष्मण जी कहते हैं भैया ये तो अपने पिताजी को जानती हैं देखूं की कौन हैं?

राम जी कहते हैं नही लक्ष्मण ।

फिर वो कहती हैं एक राम हैं और एक लक्ष्मण हैं। राम जी की माँ कौसल्या हैं और लक्ष्मण की सुमित्रा है।

अब लक्ष्मण बोले की भैया ये तो अपने नाम और माता का नाम भी जानती हैं। अब तो देखना ही पड़ेगा।

भगवान बोले सावधान रहना ऊपर बिलकुल मत देखना। क्योंकि मर्यादा नही हैं ना।

तभी एक जनकपुर की मिथलानी बोली की हमे लगता हैं ये दोनों भाई बेहरे हैं। हम इतना बोल रही हैं ये हमारी ओर देख ही नही रहे हैं। तभी दूसरी बोली की मुझे लगता हैं की बेहरे ही नही गूंगे भी हैं। क्योंकि ये आपस में बात भी नही कर रहे हैं इशारे ही कर रहे हैं।

लक्ष्मण जी बोले की प्रभु अब इज्जत बहुत खराब हो रही है। हमे गूंगा, बहरा बना दिया है। रामजी आप एक नजर ऊपर डाल दो। तभी भगवान ने एक नजर उन पर डाली हैं और मिथिलापुर के नर-नारियां, बालक, वृद्ध सब निहाल हो गए हैं। सबने भगवान के रूप रस का पान किया है।

इसके बाद भगवान ने वह स्थान देखा हैं जहाँ पर धनुष यज्ञ का कार्यक्रम होगा। बहुत लंबा-चौड़ा सुंदर ढाला हुआ पक्का आँगन था। चारों ओर सोने के बड़े-बड़े मंच बने थे, जिन पर राजा लोग बैठेंगे। उनके पीछे समीप ही चारों ओर दूसरे मचानों का मंडलाकार घेरा सुशोभित था। नगर के बालक कोमल वचन कह-कहकर आदरपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्रजी को यज्ञशाला की रचना दिखला रहे हैं। श्री रामजी भक्ति के कारण धनुष यज्ञ शाला को आश्चर्य के साथ देख रहे हैं। इस प्रकार सब कौतुक (विचित्र रचना) देखकर वे गुरु के पास चले। अगर देर हो गई तो गुरूजी नाराज हो जायेंगे। फिर भगवान  ने कोमल, मधुर और सुंदर बातें कहकर बालकों को जबर्दस्ती विदा किया॥

फिर भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोच के साथ दोनों भाई गुरु के चरण कमलों में सिर नवाकर आज्ञा पाकर बैठे। भगवान ने संध्यावंदन किया है। फिर रात्रि के 2 प्रहर तक भगवान की प्राचीन कथाओं को कहा है और फिर मुनि के चरण दबाये हैं। तब श्रेष्ठ मुनि ने जाकर शयन किया। मुनि के बार बार कहने पर भगवान भी सोने चले गए हैं।

Read: Ram-Sita Vivaah part 2 : राम-सीता विवाह पार्ट 2

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