Ramayan : Ram Setu(katha) Story in hindi

Ramayan : Ram Setu(katha) Story in hindi

रामायण  : राम सेतु कहानी(कथा)

अब तक आपने पढ़ा की विभीषण भगवान की शरणागत हुआ है और भगवान राम के क्रोध करने पर समुद्र ने भगवान को सेतु बनाने का मार्ग सुझाया है।

यहाँ से तुलसीदासजी ने लंका कांड का प्रारम्भ किया है और शुरू में भगवान राम का वंदन किया है उसके बाद भगवान शिव का वंदन करते हैं।
समुद्र ने प्रभु राम का कहा की आप सेतु बनाइये। समुद्र के वचन सुनकर प्रभु श्री रामजी ने मंत्रियों को बुलाकर ऐसा कहा- अब विलंब किसलिए हो रहा है? सेतु (पुल) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे।

जाम्बवान्‌ ने हाथ जोड़कर कहा- श्री रामजी! सुनिए। हे नाथ! (सबसे बड़ा) सेतु तो आपका नाम ही है, जिस पर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर) मनुष्य संसार रूपी समुद्र से पार हो जाते हैं। फिर यह छोटा सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी?

हनुमान जी कहते हैं- प्रभु का प्रताप भारी बड़वानल (समुद्र की आग) के समान है। इसने पहले समुद्र के जल को सोख लिया था, परन्तु आपके शत्रुओं की स्त्रियों के आँसुओं की धारा से यह फिर भर गया और उसी से खारा भी हो गया। हनुमान जी की बात सुनकर प्रभु मुस्कुराये।

जाम्बवान्‌ ने नल-नील दोनों भाइयों को बुलाकर कहा- श्री रामजी के प्रताप को स्मरण करके सेतु तैयार करो। सभी वानरों को पत्थर लाने के लिए कहा गया है। सभी राम जी की जय जयकार करते हुए जा रहे हैं। वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की तरह ले लेते हैं। सभी पत्थरों पर राम नाम लिखा है।

Rameshwaram Shiv puja by Ram : राम द्वारा रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा 

सेतु की अत्यंत सुंदर रचना देखकर कृपासिन्धु श्री रामजी हँसकर वचन बोले- यहाँ की) भूमि परम रमणीय और उत्तम है। इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा। मेरे हृदय में यह महान्‌ संकल्प है॥
श्री रामजी के वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव ने बहुत से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुलाकर ले आए।

लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥ शिवलिंग की स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया (फिर भगवान बोले-) शिवजी के समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है॥

सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥ संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥
जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। शंकरजी से विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है॥

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥ जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥
जो मनुष्य (मेरे स्थापित किए हुए इन) रामेश्वरजी का दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जाएँगे और जो गंगाजल लाकर इन पर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा (अर्थात्‌ मेरे साथ एक हो जाएगा)
जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्री रामेश्वरजी की सेवा करेंगे, उन्हें शंकरजी मेरी भक्ति देंगे और जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाएगा॥

श्री रामजी के वचन सबके मन को अच्छे लगे। तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमों को लौट आए। शिवजी कहते हैं-) हे पार्वती! श्री रघुनाथजी की यह रीति है कि वे शरणागत पर सदा प्रीति करते हैं॥

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