Ramayan: Ram-Laxman and Parshuram story(katha)

Ramayan: Ram-Laxman and Parshuram story(katha) 

रामायण : राम-लक्ष्मण और परशुराम कहानी(कथा)

जब भगवान श्री राम(ram) ने शिव धनुष(shiv dhanush) तोडा तो परशुराम(Parshuram) जी को खबर लग गई। उसी समय शिव धनुष के टूटने की आवाज सुनकर परशुराम जी आ गए। और बहुत क्रोध में है। परशुराम जी जिसकी ओर देख रहे हैं वो सोच रहा हैं की अब मैं नही बचूंगा।

परशुरामजी का भयानक वेष देखकर सब राजा भय से व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पिता सहित अपना नाम कह-कहकर सब दंडवत प्रणाम करने लगे। फिर जनकजी ने आकर सिर नवाया और सीताजी को बुलाकर प्रणाम कराया। परशुरामजी ने सीताजी को आशीर्वाद दिया। फिर सब सखियाँ सीताजी को लेकर वहां से चली गई हैं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयों को उनके चरण कमलों पर गिराया। विश्वामित्रजी ने कहा- ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र हैं। उनकी सुंदर जोड़ी देखकर परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया।

परशुराम ने देखा की धनुष के टुकड़े पृथ्वी पर पड़े हुए हैं। अत्यन्त क्रोध में भरकर वे कठोर वचन बोले- रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक की पृथ्वी उलट दूँगा।

राजा जनक कोई उत्तर नही दे पा रहे हैं। सीताजी की माता मन में पछता रही हैं कि हाय! विधाता ने अब बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। सीताजी भी घबराई हुई हैं।

तब श्री रामचन्द्रजी सब लोगों को भयभीत देखकर और सीताजी को डरी हुई जानकर बोले- हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई एक दास ही होगा। आपकी जो आज्ञा हो आप मुझे बता दीजिये।

यह सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर बोले-सेवक वह है जो सेवा का काम करे। शत्रु का काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिए। हे राम! सुनो, जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह इस समाज को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे।

Parshuram aur Laxman Sanwad : परशुराम और लक्ष्मण संवाद 

अब तक लक्ष्मण चुप थे लेकिन अब लक्ष्मणजी मुस्कुराए और परशुरामजी का अपमान करते हुए बोले- हे गोसाईं! लड़कपन में हमने बहुत सी धनुहियाँ तोड़ डालीं, किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण से है?

परशुरामजी कहते हैं- अरे राजपुत्र! ये कोई साधारण धनुष नही हैं ये शिव जी का धनुष हैं।

लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा- हे देव! सुनिए, हमारे लिए तो सभी धनुष एक से ही हैं। पुराने धनुष के तोड़ने में क्या हानि-लाभ! फिर यह तो छूते ही टूट गया, इसमें रघुनाथजी का भी कोई दोष नहीं है। हे मुनि! आप अकारण ही क्रोध कर रहे हैं।

परशुरामजी अपने फरसे की ओर देखकर बोले- अरे दुष्ट! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना। मैं तुझे बालक समझकर नही मार रहा हूँ। मैं बालब्रह्मचारी और अत्यन्त क्रोधी हूँ। क्षत्रियकुल का शत्रु तो विश्वभर में विख्यात हूँ। अपनी भुजाओं के बल से मैंने पृथ्वी को राजाओं से रहित कर दिया और बहुत बार उसे ब्राह्मणों को दे डाला। हे राजकुमार! सहस्रबाहु की भुजाओं को काटने वाले मेरे इस फरसे को देख! मेरा फरसा बड़ा भयानक है।

लक्ष्मणजी हँसकर कोमल वाणी से बोले- अहो, मुनीश्वर तो अपने को बड़ा भारी योद्धा समझते हैं। बार-बार मुझे कुल्हाड़ी दिखाते हैं। फूँक से पहाड़ उड़ाना चाहते हैं। हमारे कुल में देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गो इन पर वीरता नही दिखाई जाती हैं। क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और इनसे हार जाने पर अपकीर्ति होती है, इसलिए आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिए। आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रों के समान है। धनुष-बाण और कुठार तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं।

यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोध के साथ गंभीर वाणी बोले- हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, काल के वश होकर यह अपने कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवंश रूपी पूर्ण चन्द्र का कलंक है। यह बिल्कुल उद्दण्ड, मूर्ख और निडर है। अभी क्षण भर में यह काल का ग्रास हो जाएगा। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो।

लक्ष्मणजी ने कहा- हे मुनि! आपके यश का वर्णन आपके अलावा ओर कौन कर सकते हैं? आपने अपने ही मुँह से अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकार से वर्णन की है। शूरवीर तो युद्ध करते हैं लेकिन आप तो केवल बातें कर रहे हैं और अपने प्रताप की डींग मार रहे हैं।

लक्ष्मणजी के कठोर वचन सुनते ही परशुरामजी ने अपने भयानक फरसे को सुधारकर हाथ में ले लिया और बोले- इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरने को ही आ गया है।

विश्वामित्रजी ने कहा- अपराध क्षमा कीजिए। बालकों के दोष और गुण को साधु लोग नहीं गिनते।

लक्ष्मणजी ने कहा- हे मुनि! आपके शील को कौन नहीं जानता? वह संसार भर में प्रसिद्ध है। आप माता-पिता से तो अच्छी तरह उऋण हो ही गए, अब गुरु का ऋण रहा, जिसका जी में बड़ा सोच लगा है।

लक्ष्मणजी ने कहा- हे भृगुश्रेष्ठ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं? पर हे राजाओं के शत्रु! मैं ब्राह्मण समझकर तरह दे रहा हूँ।

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