Ramayan : Ram-Hanuman Milan Story(katha) in hindi

Ramayan : Ram-Hanuman Milan Story(katha) in hindi

रामायण : राम-हनुमान मिलन कहानी(कथा)

आपने पढ़ा की नारद और राम जी के बीच सुंदर संवाद हुआ है और तुलसीदास जी  ने अरण्यकाण्ड के बाद किष्किंधाकाण्ड(kishkindha kand) प्रारम्भ किया है। भगवान की सुंदर स्तुति की है। श्री रघुनाथजी फिर आगे चले। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। यहाँ मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। राम और लक्ष्मण को देखकर सुग्रीव अत्यंत भयभीत होकर बोले- हे हनुमान्‌! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। आप जाकर पता लगाओ की ये कौन हैं। और अगर किसी तरह की समस्या हो तो मुझे इशारा कर देना। अगर वे बालि के भेजे हुए हों तो मैं तुरंत ही इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊंगा।

यह सुनकर हनुमान्‌जी ब्राह्मण का रूप बनाकर  वहाँ गए और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे- हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश- इन तीन देवताओं में से कोई हैं या आप दोनों नर और नारायण हैं॥ आप कृपा करके बताइये की आप दोनों कौन हैं?

 

श्री रामचंद्रजी ने कहा- कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥ नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई॥

इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥ आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥

अर्थ : हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुंदर सुकुमारी स्त्री थी॥ यहाँ (वन में) राक्षस ने (मेरी पत्नी) जानकी को हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए ॥

 

प्रभु को पहचानकर हनुमान्‌जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े (उन्होंने साष्टांग दंडवत्‌ प्रणाम किया)। शिवजी कहते हैं-) हे पार्वती! वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। उनके मुख से कुछ बोल नही निकलता है। वे प्रभु के सुंदर वेष की रचना देख रहे हैं!

 

फिर हनुमान्‌जी ने कहा- मैंने आपसे आपका परिचय पूछा। वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी के वेष में और मेरी वानरी बुद्धि इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थिति के अनुसार मैंने आपसे पूछा। मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूँ इसी से मैंने अपने स्वामी (आप) को नहीं पहचाना। एक तो मैं यों ही मंद हूँ, दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे हृदय का कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर हे दीनबंधु भगवान्‌! प्रभु (आप) ने भी मुझे भुला दिया!

लेकिन आप तो अंतर्यामी हैं सब जानते हैं फिर भी आपने मुझे नही पहचाना। परंतु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं?

ऐसा कहकर हनुमान्‌जी अकुलाकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े, उन्होंने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया।

 

तब श्री रघुनाथजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया॥ फिर कहा- हे प्यारे हनुमान! सुनो ! मन छोटा न करना। तुम जिस प्रकार भेष बदलकर मेरे सामने आकर मुझसे पूछ रहे थे बस वही कारण है। जब तुम्हे पता है की मैं अंतर्यामी हूँ तो तुमने मुझसे पूछा ही क्यों की मैं कौन हूँ? सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति  है मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता)॥ और हे हनुमान्‌! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड़-चेतन) जगत्‌ मेरे स्वामी भगवान्‌ का रूप है॥

 

स्वामी को अनुकूल (प्रसन्न) देखकर पवन कुमार हनुमान्‌जी के हृदय में हर्ष छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे। और हनुमान जी महाराज कहते हैं-  हे नाथ! इस पर्वत पर वानरराज सुग्रीव रहते हैं, वह आपका दास है॥ मैं आपको उससे मिलवा देता हूँ। हे नाथ! उससे मित्रता कीजिए और उसे दीन जानकर निर्भय कर दीजिए। वह सीताजी की खोज करवाएगा और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानरों को भेजेगा॥

 

इस तरह भगवान को सब बताकर हनुमान्‌जी ने श्री राम-लक्ष्मण दोनों जनों को पीठ पर चढ़ा लिया।  लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥

भगवान बोले की पीठ पर लेकर चलोगे तो कहीं गिरा मत देना। तुम तो पवन पुत्र तो तुम्हे कोई दिक्कत नही होगी तुम्हे हवा में उड़ने की आदत है लेकिन हमें नही है भैया!

 

हनुमान जी बोले- प्रभु बैठो तो एक बार। एक ओर राम जी बैठ गए और एक ओर लखन जी बैठ गए हैं। भगवान ने हनुमान जी का सर पकड़ लिया है। कहीं हनुमान जी तेज ना उड़ें।

हनुमान जी कहते हैं प्रभु किसी तरह की डरने की जरुरत नही है अब । जिसके सर पर आपका हाथ आ जाये तो दुनिया की कोई ताकत बाल भी बांका नही कर सकती है। इस तरह से हनुमान जी राम-लक्ष्मण को लेकर सुग्रीव के पास पहुंचे हैं। आगे पढ़ें…

 

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