Ramayan : Hanuman ka Lanka dahan baad Ram ke pass jana

Ramayan : Hanuman ka Lanka dahan baad Ram ke pass jana 

रामायण : हनुमान का लंका दहन बाद राम के पास लौटना 

अब तक आपने पढ़ा की हनुमान जी ने लंका को जला दिया है और समुद्र में अपनी पूंछ बुझा दी है। पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा सा रूप धारण कर हनुमान्‌जी श्री जानकीजी के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए॥ और कहते हैं- मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥

हे माता! आप मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिए, जैसे श्री रघुनाथजी ने मुझे दिया था। तब सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्‌जी ने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥

सीता जी हनुमान जी से कहती है – हनुमान! इंद्रपुत्र जयंत की कथा (घटना) सुनाना और प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझाना (स्मरण कराना)। यदि महीने भर में नाथ न आए तो फिर मुझे जीती न पाएँगे॥

हनुमान जी ने कहा की राम जरूर आएंगे और यहाँ से विदा ली है। हनुमान जी समुद्र लांग कर इस पार आये और हनुमान जी सब वानरों आदि से मिले हैं। सबने जान लिया है की हनुमान जी रामचन्द्रजी का काज कर आये हैं।

अब सभी मिल सुग्रीव के पास आये हैं। सबने आकर सुग्रीव के चरणों में सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव सभी से बड़े प्रेम के साथ मिले। तब वानरों ने उत्तर दिया-श्री रामजी की कृपा से कार्य में विशेष सफलता हुई है। हे नाथ! हनुमान ने सब कार्य किया और सब वानरों के प्राण बचा लिए। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमान्‌जी से फिर मिले और सब वानरों समेत श्री रघुनाथजी के पास चले॥

श्री रामजी ने जब वानरों को कार्य किए हुए आते देखा तब उनके मन में विशेष हर्ष हुआ। सब वानर जाकर उनके चरणों पर गिर पड़े॥ रामजी ने सबसे कुशल मंगल पूछा? वानरों ने कहा- हे नाथ! आपके चरण कमलों के दर्शन पाने से अब कुशल है॥

जाम्बवान्‌ ने कहा- हे रघुनाथजी! सुनिए। हे नाथ! प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया॥

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥ पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥

हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्‌ ने जो करनी की, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्‌ ने हनुमान्‌जी के सुंदर चरित्र (कार्य) श्री रघुनाथजी को सुनाए॥ और ये भी बता दिया सीता माता की खोज भी हो गई और रावण की लंका भी जल गई।

Ram Hanuman prem : राम हनुमान प्रेम 

रामचन्द्र जी ने हर्षित होकर हनुमान्‌जी को फिर हृदय से लगा लिया और कहा- हे हनुमान! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणों की रक्षा करती हैं?

हनुमान्‌जी ने कहा- आपका नाम रात-दिन पहरा देने वाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रों को अपने चरणों में लगाए रहती हैं, यही ताला लगा है, फिर प्राण जाएँ तो किस मार्ग से?

चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि (उतारकर) दी। श्री रघुनाथजी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया। हनुमान्‌जी ने फिर कहा- हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकीजी ने मुझसे कुछ वचन कहे- छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना और कहना कि मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। फिर आप ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया? हाँ) एक दोष मैं अपना (अवश्य) मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गए, किंतु हे नाथ! यह तो नेत्रों का अपराध है जो प्राणों के निकलने में हठपूर्वक बाधा देते हैं॥

हनुमान जी कहते हैं- हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिए और अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों के दल को जीतकर सीताजी को ले आइए॥

सीताजी का दुःख सुनकर सुप्रभु के कमल नेत्रों में जल भर आया (और वे बोले-मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति हो सकती है?

हनुमान जी कहते हैं- कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ हे प्रभु! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो।

हे प्रभो! राक्षसों की बात ही कितनी है? आप शत्रु को जीतकर जानकीजी को ले आवेंगे॥

भगवान्‌ कहने लगे-) हे हनुमान्‌! सुन, तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तुम्हारे ऋण से कभी मुक्त नही हो सकता हूँ।

प्रभु के वचन सुनकर हनुमान श्री रामजी के चरणों में गिर पड़े॥

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥ प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥

प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परंतु प्रेम में डूबे हुए हनुमान्‌जी को चरणों से उठना सुहाता नहीं। प्रभु का करकमल हनुमान्‌जी के सिर पर है। उस स्थिति का स्मरण करके शिवजी प्रेममग्न हो गए॥

हनुमान जी उठाकर प्रभु ने हृदय से लगाया और अपने पास बिठा लिया। रामजी अब देखना चाहते है कहीं मेरे भक्त में अहंकार तो नही आ गया ये सब काम अकेले करके आया ?

राम जी पूछते हैं- हनुमान! क्या तुमने अकेले लंका में आग लगाई?

हनुमान जी कहते हैं- मैंने लंका में आग नही लगाई। लंका को जलाया आप के प्रताप ने। लंका को जलाया रावण के पाप ने। लंका को जलाया माँ जानकी के शाप ने और लंका को जलाया मेरे बाप(पवन देव) ने। मैंने तो चिंगारी छोड़ी थी पवन देव ने आग फैला दी।

हनुमान जी कहते हैं- सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥ यह सब तो हे श्री रघुनाथजी! आप ही का प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है॥

हे प्रभु! जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। असंभव भी संभव हो सकता है॥

हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिए। भगवान ने कहा ‘एवमस्तु'(ऐसा ही होगा) कहा।

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ भगवान शिव पार्वती से कहते हैं- हे उमा! जिसने श्री रामजी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती।

सभी वानर भगवान राम की जय-जय कार करने लगे। तब श्री रघुनाथजी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा- चलने(युद्ध) की तैयारी करो॥

वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र ही वानरों को बुलाया, सेनापतियों के समूह आ गए। वानर-भालुओं के अनेक झुंड हैं। वे प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाते हैं। महान्‌ बलवान्‌ रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्री रामजी ने वानरों की सारी सेना देखी। तब कमल नेत्रों से कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली॥ राम कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गए। तब श्री रामजी ने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया।

प्रभु का प्रस्थान जानकीजी ने भी जान लिया। उनके बाएँ अंग फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे (कि श्री रामजी आ रहे हैं)।

इस प्रकार कृपानिधान श्री रामजी समुद्र तट पर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥

 

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