Ramayan : Bharat charitra in hindi part 4

Ramayan : Bharat charitra in hindi part 4

रामायण : भरत चरित्र पार्ट 4

पिछले पार्ट में आपने राम और भरत मिलाप को पढ़ा। इसके दो दिन बाद श्री रामचन्द्रजी प्रीति के साथ गुरुजी से बोले- हे नाथ! सब लोग यहाँ अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। कंद, मूल, फल और जल का ही आहार करते हैं। भाई शत्रुघ्न सहित भरत को, मंत्रियों को और सब माताओं को देखकर मुझे एक-एक पल युग के समान बीत रहा है। इसलिए  सबके साथ आप अयोध्यापुरी को लौट जाइए।

 

वशिष्ठजी ने कहा- हे राम! लोग दुःखी हैं। ये बात तुम कह रहे हों। लोग इसलिए दुखी नही है की वो यहाँ इस वन में हैं वो इस कारण से दुखी है की आप यहाँ इस वन में हो। वशिष्ठ जी कहते हैं राम! हम जल्दी ही यहाँ से लौट जायेंगे। अभी लोगों को अपने से दूर मत करो।

 

लेकिन भरत जी की दशा तो देखिये- भरतजी को न तो रात को नींद आती है, न दिन में भूख ही लगती है। भरत जी सोच रहे हैं यदि में भगवान से अयोध्या चलने के लिए कहूँगा तो राम जी मना कर सकते हैं लेकिन गुरुजी कहेंगे तो श्री रामजी अवश्य ही अयोध्या को लौट चलेंगे, भरत जी ये भी सोच रहे हैं माता कौसल्याजी के कहने से भी श्री रघुनाथजी लौट सकते हैं, पर भला, श्री रामजी को जन्म देने वाली माता क्या कभी हठ करेगी?

 

Sri Ram-Bharat Sanwad : श्री राम- भरत संवाद

एक भी युक्ति भरतजी के मन में न ठहरी। सोचते ही सोचते रात बीत गई। भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्री रामचन्द्रजी को सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वशिष्ठजी ने उनको बुलवा भेजा॥ भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गए। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मंत्री आदि सभी सभासद आकर जुट गए॥ फिर मुनि कहते हैं –

हे सभासदों! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्री रामचन्द्र धर्मधुरंधर और स्वतंत्र भगवान हैं॥ वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलने वाले हैं। अतएव श्री रामजी की आज्ञा और रुख रखने में ही हम सबका हित होगा। श्री रामजी का राज्याभिषेक सबके लिए सुखदायक है। मंगल और आनंद का मूल यही एक मार्ग है। (अब) श्री रघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाए॥

 

सभी ने मुनि की बातों को सुना पर कोई उत्तर नही दे पाया तब भरत जी हाथ जोड़ कर बोले – सूर्यवंश में एक से एक अधिक बड़े बहुत से राजा हो गए हैं। सभी के जन्म के कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मों को (कर्मों का फल) विधाता देते हैं। भरत जी अब प्रेम में डूबते जा रहे हैं। भरत जी कहते हैं मैं गद्दी पर नही बैठूंगा। बड़े भाई के होते हुए छोटा भाई कैसे बैठ जाये और जबकि भाई भगवान हो। मैं तो जब तक जियूँगा अपने राम की सेवा ही करूँगा। राम विमुख को तो स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती। फिर गुरुदेव कहते हैं की भरत तुम्हारे प्रेम में मैं कहीं खुद को भुला ना बैठूं। कहीं मेरा ज्ञान धरा का धरा ना रह जाये। गुरुदेव कहते हैं अतः तुम दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वन को जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्री रामचन्द्र को लौटा दिया जाए।  सुंदर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गए।

लेकिन रानियां ये बात भी सुनकर रोने लगी क्योंकि राम-लक्ष्मण वन में रहें या भरत-शत्रुघ्न, दो पुत्रों का वियोग तो रहेगा ही।

 

देखिये भरत जी अब कितना सुंदर कहते हैं- मुनि ने जो कहा, वह एकदम उचित है लेकिन चौदह वर्ष की कोई अवधि नहीं मैं जन्मभर वन में वास करूँगा। मेरे लिए इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है॥

 

भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभा सहित मुनि वशिष्ठजी सभी अपनी देह की सुध-बुध खो बैठे। मुनि वशिष्ठजी की अन्तरात्मा को भरतजी बहुत अच्छे लगे। फिर मुनि कहते हैं- राम! आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भाव को जानते हैं, जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइए॥

 

मुनि के वचन सुनकर श्री रघुनाथजी कहने लगे- हे नाथ! उपाय तो आप ही के हाथ है॥ आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से आपकी आज्ञा का पालन करेगा। मुनि कहते है राम! तुम भरत के प्रेम को देखकर कुछ कहो। मुझसे अब कुछ नही कहा जाता।

 

श्री राम जी कहते हैं- हे नाथ! आपकी सौगंध और पिताजी के चरणों की दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ कि) विश्वभर में भरत के समान कोई भाई हुआ ही नहीं॥ छोटा भाई जानकर भरत के मुँह पर उसकी बड़ाई करने में मेरी बुद्धि सकुचाती है। फिर भी मैं तो यही कहूँगा कि भरत जो कुछ कहें, वही करने में भलाई है। ऐसा कहकर श्री रामचन्द्रजी चुप हो रहे।

तब मुनि भरतजी से बोले- भरत! सब संकोच त्यागकर अपने मन की बात कहो।

 

भरत जी हाथ जोड़कर बोले की हे नाथ! मेरा कहना तो मुनिनाथ ने कह दिया। इससे अधिक मैं क्या कहूँ? बचपन में ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मन को कभी नहीं तोड़ा। मेरे हारने पर भी खेल में प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं॥ मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला। प्रेम के प्यासे मेरे नेत्र आज तक प्रभु के दर्शन से तृप्त नहीं हुए॥ लेकिन विधाता ने उस नीच माता के बहाने मेरे और स्वामी के बीच भेद पैदा कर दिया। माताएँ व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं। अवधपुरी के नर-नारी दुःसह ताप से जल रहे हैं॥ मैं ही इन सारे अनर्थों का मूल हूँ, यह सुन और समझकर मैंने सब दुःख सहा है।

 

ये बात सुनकर रामजी बोले–मेरे भाई! तुम अपने हृदय में व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीव की गति को ईश्वर के अधीन जानो। मेरी नजर में तीनों कालों(भूत, भविष्य, वर्तमान) और तीनों लोकों(स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) के सब पुण्यात्मा पुरुष तुम से नीचे हैं। हे भरत! तुम्हारा नाम स्मरण करते ही सब पाप, प्रपंच (अज्ञान) और समस्त अमंगलों के समूह मिट जाएँगे तथा इस लोक में सुंदर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा॥ तुम मन को प्रसन्न कर और संकोच को त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। रामजी का यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया॥

लेकिन देवगणों सहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है।

देवताओं का मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजी ने कहा-  भरतजी के चरणों का प्रेम जगत में समस्त शुभ मंगलों का मूल है॥ तुम्हारे मन में भरतजी की भक्ति आई है, तो अब सोच छोड़ दो। विधाता ने बात बना दी॥

 

तदनन्तर भरतजी दोनों करकमलों को जोड़कर प्रणाम करके बोले-हे स्वामी! हे कृपा के समुद्र! हे अन्तर्यामी! अब मैं (अधिक) क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? मैं मिथ्या डर से ही डर गया था। हे नाथ! आपके लौटने में सभी का स्वार्थ है और आपकी आज्ञा पालन करने में करोड़ों प्रकार से कल्याण है। हे देव! आप मेरी एक विनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिए। राजतिलक की सब सामग्री सजाकर लाई गई है, जो यदि आपका मन माने तो उसे सफल कीजिए। छोटे भाई शत्रुघ्न समेत मुझे वन में भेज दीजिए और आप अयोध्या लौट जाइये। और अगर आप अयोध्या नही जाना चाहते हैं तो लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयों को लौटा दीजिए और मैं आपके साथ चलूँगा। अथवा हम तीनों भाई वन चले जाएँ और हे श्री रघुनाथजी! आप श्री सीताजी सहित (अयोध्या को) लौट जाइए। हे दयासागर! जिस प्रकार से प्रभु का मन प्रसन्न हो, वही कीजिए॥ आप जैसी आज्ञा करेंगे हम सभी वही मानेंगे। क्योंकि आप स्वामी हो और हम आपके दास हैं।

पेज 2 पर जाइये

2 thoughts on “Ramayan : Bharat charitra in hindi part 4

Leave a Reply to Yadram Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.