Ramayan : Bharat charitra in hindi part 4

 

Janak ji ka aana(aagman) : जनक जी का आगमन 

भरत जी की बात सुनकर राम जी चुप हो गए और प्रभु की यह मौन स्थिति देख सारी सभा सोच में पड़ गई। उसी समय जनकजी के दूत आए, मुनि ने पूछा की राजा जनक का कुशल समाचार कहो।

 

दूत हाथ जोड़कर बोले- हे स्वामी! कुशल-क्षेम तो सब कोसलनाथ दशरथजी के साथ ही चली गई। उनके जाने से सारा जगत अनाथ हो गया किन्तु मिथिला और अवध तो विशेष रूप से अनाथ हो गया॥ फिर भरतजी को राज्य और श्री रामचन्द्रजी को वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजी के हृदय में बड़ा दुःख हुआ॥

 

राजा जनक ने विद्वानों और मंत्रियों के समाज से पूछा कि विचारकर कहिए, इस समय क्या करना उचित है? लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा॥ जब किसी ने कोई सम्मति नहीं दी तो चार चतुर गुप्तचर (जासूस) अयोध्या को भेजे। फिर गुप्तचरों ने बताया की भरत जी तो चित्रकूट की ओर जा चुके हैं।फिर जनकजी ने धीरज धरकर सब सहित चित्रकूट चलने को कहा।

जनकजी का आगमन सुनकर अयोध्या का सारा समाज हर्षित हो गया। लेकिन ककई पश्चाताप की अग्नि में जली जा रही है। और सब नर-नारी मन में सोच रहे हैं अच्छा हुआ, जनकजी के आने से कुछ दिन और रहना हो गया॥ इस तरह वह दिन भी बीत गया।

 

अब जनकजी आये हैं  और जनकजी (वशिष्ठ आदि अयोध्यावासी) मुनियों के चरणों की वंदना करने लगे और श्री रामचन्द्रजी ने (शतानंद आदि जनकपुरवासी) ऋषियों को प्रणाम किया। फिर भाइयों समेत श्री रामजी राजा जनकजी से मिलकर उन्हें समाज सहित अपने आश्रम को लिवा चले॥ दोनों राज समाज शोक से व्याकुल हो गए। किसी को न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही रही। राजा दशरथजी के रूप, गुण और शील की सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोक समुद्र में डुबकी लगा रहे हैं॥

 

वशिष्ठजी ने विदेहराज (जनकजी) को बहुत प्रकार से समझाया। तदनंतर सब लोगों ने श्री रामजी के घाट पर स्नान किया॥ श्री रघुनाथजी ने विश्वामित्रजी से कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिए ही रह गए थे। विश्वामित्रजी का रुख देखकर तिरहुत राज जनकजी ने कहा- यहाँ अन्न खाना उचित नहीं है। राजा का सुंदर कथन सबके मन को अच्छा लगा।

 

उसी समय अनेकों प्रकार के बहुत से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहँगियों और बोझों में भर-भरकर वनवासी  लोग ले आए॥ सभी ने फलाहार किया है। इस प्रकार चार दिन बीत गए। श्री रामचन्द्रजी को देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजों के मन में ऐसी इच्छा है कि श्री सीता-रामजी के बिना लौटना अच्छा नहीं है॥

 

फिर सीताजी की माता श्री सुनयनाजी की भेंट  कौसल्याजी आदि रानियों से हुई है – सभी कह रहे हैं की जो भगवान की इच्छा थी वो हो गया है अब शोक करने से क्या होगा।

 

कौसल्याजी ने दुःख भरे हृदय से कहा- श्री राम, लक्ष्मण और सीता वन में जाएँ, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरत की चिन्ता है॥ मैंने कभी श्री राम की सौगंध नहीं की, सो आज श्री राम की शपथ करके सत्य भाव से कहती हूँ-भरत के शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपन का वर्णन करने में सरस्वतीजी की बुद्धि भी हिचकती है। कौसल्याजी की गंगाजी के समान पवित्र करने वाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेह के मारे विकल हो उठीं॥

 

कौसल्याजी ने फिर धीरज धरकर कहा- हे देवी मिथिलेश्वरी! सुनिए, ज्ञान के भंडार श्री जनकजी की प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है?मुझे भरत का अत्यधिक सोच है। भरत के मन में गूढ़ प्रेम है। कौसल्याजी का स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणी को सुनकर सब रानियाँ करुण रस में निमग्न हो गईं।

कौसल्याजी के प्रेम को देखकर और उनके विनम्र वचनों को सुनकर जनकजी की प्रिय पत्नी ने उनके पवित्र चरण पकड़ लिए और कहा- हे देवी! आप राजा दशरथजी की रानी और श्री रामजी की माता हैं। आपका सहायक होने योग्य जगत में कौन है? दीपक सूर्य की सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है? श्री रामचन्द्रजी वन में जाकर देवताओं का कार्य करके अवधपुरी में अचल राज्य करेंगे॥

 

ऐसा कहकर बड़े प्रेम से पैरों पड़कर सीताजी (को साथ भेजने) के लिए विनती करके और सुंदर आज्ञा पाकर तब सीताजी समेत सीताजी की माता डेरे को चलीं॥

जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियों से- जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजी को तपस्विनी के वेष में देखकर सभी शोक से अत्यन्त व्याकुल हो गए॥ अब जनकजी भी वहां आ गए है और जनकजी ने अपने पवित्र प्रेम और प्राणों की पाहुनी जानकीजी को हृदय से लगा लिया॥ आँखों से प्रेम के आंसू टपक रहे हैं। पिता-माता के प्रेम के मारे सीताजी ऐसी विकल हो गईं कि अपने को सँभाल न सकीं।

 

सीताजी को तपस्विनी वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और संतोष हुआ। उन्होंने कहा- बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिए। तेरे निर्मल यश से सारा जगत उज्ज्वल हो रहा है, ऐसा सब कोई कहते हैं। अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोच में समा गईं। पिता-माता ने उन्हें फिर हृदय से लगा लिया और हितभरी सुंदर सीख और आशीष दिया॥

 

सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परन्तु सकुचा रही हैं कि रात में (सासुओं की सेवा छोड़कर) यहाँ रहना अच्छा नहीं है। राजा-रानी ने बार-बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया।

 

अब सुनयनाजी जी जनक जी से अकेले में पूछती है की आप भरत के प्रेम को बता सकते हैं। की भरत रामजी से कितना प्रेम करते हैं। तब जनकजी कहते है ये बात तो स्वयं श्री राम भी नही बता सकते हैं। तो मैं कैसे बता सकता हूँ। फिर भी जनक जी कहते हैं हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो। भरतजी की कथा संसार के बंधन से छुड़ाने वाली है। भरतजी के समान बस, भरतजी ही हैं और दूसरा कोई नही है। हे रानी! सुनो, भरतजी की अपरिमित महिमा को एक श्री रामचन्द्रजी ही जानते हैं, किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते॥ भरतजी और श्री रामचन्द्रजी का प्रेम और एक-दूसरे पर विश्वास, बुद्धि और विचार की सीमा में नहीं आ सकता। यद्यपि श्री रामचन्द्रजी समता की सीमा हैं, तथापि भरतजी प्रेम और ममता की सीमा हैं॥

श्री रामचन्द्रजी के प्रति अनन्य प्रेम को छोड़कर भरतजी ने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखों की ओर स्वप्न में भी मन से भी नहीं ताका है। श्री रामजी के चरणों का प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो भरतजी का बस, यही एक मात्र सिद्धांत जान पड़ता है॥ श्री रामजी और भरतजी के गुणों की प्रेमपूर्वक गणना करते (कहते-सुनते) पति-पत्नी को रात पलक के समान बीत गई। आगे पढ़ें…

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