Ramayan : Bharat charitra in hindi part 3

Ramayan : Bharat charitra in hindi part 3

रामायण : भरत चरित्र पार्ट 3

पार्ट 2 में आपने पढ़ा की भरत जी महाराज ने भरद्वाज मुनि के दर्शन किये हैं और फिर वनवासियों पर कृपा की है। भरत जी महाराज रामजी की और बढे चले आ रहे हैं।

 

Ram Bharat milap(milan)  : राम भरत मिलाप(मिलन)

इधर जानकी जी को रात्रि में एक स्वप्न आया है जिसे वो रामजी को बता रही हैं साथ में लक्ष्मण भी हैं- जानकी जी कहती हैं मैंने देखा की भरत जी सब समाज सहित यहाँ आये हैं। सभी लोग मन में उदास, दीन और दुःखी हैं। सासुओं को दूसरी ही सूरत में देखा। सीताजी का स्वप्न सुनकर श्री रामचंद्रजी के नेत्रों में जल भर गया और बोले- लक्ष्मण! यह स्वप्न अच्छा नहीं है। मुझे लगता है बहुत बुरी खबर मिलने वाली है। ऐसा कहकर उन्होंने भाई सहित स्नान किया और त्रिपुरारी महादेवजी का पूजन करके साधुओं का सम्मान किया॥

 

सीतापति श्री रामचंद्रजी पुनः सोच के वश हो गए कि भरत के आने का क्या कारण है? फिर एक ने आकर ऐसा कहा कि उनके साथ में बड़ी भारी चतुरंगिणी सेना भी है॥

यह सुनकर श्री रामचंद्रजी को अत्यंत सोच हुआ। इधर तो पिता के वचन और उधर भाई भरतजी का संकोच!

फिर राम मन में विचार करते हैं – भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहने में (आज्ञाकारी) हैं।

 

Ram-Laxman Sanwad : राम-लक्ष्मण संवाद

लक्ष्मणजी ने देखा कि प्रभु श्री रामजी के हृदय में चिंता है तो वे समय के अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे- भरतजी आज श्री रामजी (आप) का पद (सिंहासन या अधिकार) पाकर धर्म की मर्यादा को मिटाकर चले हैं। कुटिल खोटे भाई भरत यह जानकर कि रामजी  वनवास में अकेले और असहाय हैं, चतुरंगिणी सेना लेकर आपसे युद्ध करने आया है। राजपद पा जाने पर सारा जगत्‌ ही पागल हो जाता है॥ भरत ने ये ठीक नही किया। भरत ने हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है।

यों कहकर लक्ष्मणजी ने उठकर, हाथ जोड़कर राम जी से  आज्ञा माँगी। मानो वीर रस सोते से जाग उठा हो। सिर पर जटा बाँधकर कमर में तरकस कस लिया और धनुष को सजाकर तथा बाण को हाथ में लेकर कहा- आज मैं श्री राम (आप) का सेवक होने का यश लूँ और भरत को संग्राम में शिक्षा दूँ। अच्छा हुआ जो सारा समाज आकर एकत्र हो गया। आज में उनसे हर बात का बदला लूंगा और यदि शंकरजी भी आकर उनकी सहायता करें, तो भी, मुझे रामजी की सौगंध है, मैं उन्हें युद्ध में अवश्य मार डालूँगा, छोड़ूँगा नहीं।

लक्ष्मणजी को अत्यंत क्रोध से तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक (सत्य) सौगंध सुनकर सब लोग भयभीत हो जाते हैं और आकाशवाणी होती है-  हे तात! तुम्हारे प्रताप और प्रभाव को कौन कह सकता है और कौन जान सकता है?

परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाए तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दी में किसी काम को करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान्‌ नहीं हैं॥

 

देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गए। अब रामचन्द्रजी बोले हैं – हे भाई! राज्य का मद सबसे कठिन मद है॥ जिन्होंने साधुओं की सभा का सेवन (सत्संग) नहीं किया, वे ही राजा राजमद रूपी मदिरा का आचमन करते ही (पीते ही) मतवाले हो जाते हैं।

हे लक्ष्मण! सुनो, भरत सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्मा की सृष्टि में न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है॥ अयोध्या के राज्य की तो बात ही क्या है) ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का पद पाकर भी भरत को राज्य का मद नहीं होने का! क्या कभी काँजी की बूँदों से क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता (फट सकता) है?॥ मैंने अपने भरत जो अच्छे से जनता हूँ-मच्छर की फूँक से चाहे सुमेरु उड़ जाए, परन्तु हे भाई! भरत को राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजी की सौगंध खाकर कहता हूँ, भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई संसार में नहीं है॥

 

अब भरत जी राम जी की और बढे आ रहे हैं। भरतजी अपनी माता कैकेयी की करनी को याद करके सकुचाते हैं और सोचते हैं श्री राम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जाएँ॥

 

तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजी से कहने लगा- हे नाथ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमाल के विशाल वृक्ष दिखाई देते हैं। ये वृक्ष नदी के समीप हैं, जहाँ श्री राम की पर्णकुटी छाई है॥  इसी बड़ की छाया में सीताजी ने अपने करकमलों से सुंदर वेदी बनाई है।

 

सखा के वचन सुनकर और वृक्षों को देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ आया। और दौड़े जा रहे हैं राम जी की ओर। जैसे ही आश्रम में प्रवेश किया तो  भरतजी का दुःख और दाह (जलन) मिट गया। भरतजी ने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभु के आगे खड़े हैं। श्री रामजी के वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किए हैं, श्याम शरीर है। सुंदर मुनि मंडली के बीच में सीताजी और रघुकुलचंद्र श्री रामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञान की सभा में साक्षात्‌ भक्ति और सच्चिदानंद शरीर धारण करके विराजमान हैं॥

 

जैसे ही भरत जी ने ये दर्शय देखा है तो आँखों से आंसू बहने लगे है और भरत जी कहते हैं-

पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥ हे नाथ! रक्षा कीजिए, हे गुसाईं! रक्षा कीजिए’ ऐसा कहकर वे पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर पड़े॥

 

अब भरत की आवाज लक्ष्मण ने पहले सुनी और लक्ष्मण भूमि में हाथ रख कर श्री राम से कह रहे हैं – भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥ हे रघुनाथजी! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। आप देखो इनकी ओर! मुझे क्षमा कर दो। मैं ही गलती कर रहा था भरत तो साक्षात प्रेम की मूर्ति है। जैसे ही राम जी ने सुना है –  उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥ यह सुनते ही श्री रघुनाथजी प्रेम में अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण॥

कृपा निधान श्री रामचन्द्रजी ने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया! जिस प्रकार कृष्ण जी ने सुदामा को लगाया था।

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