Ramayan : Bharat charitra in hindi part 2

Ramayan : Bharat charitra in hindi part 2

रामायण : भरत चरित्र पार्ट 2 

पहले पार्ट में आपने पढ़ा की भरत जी राजसभा में कहते हैं की हमारा हित तो श्री रामजी की सेवा में हैं। ये बात जानकार सभी हर्षित हुए और सभी राम जी को लेने के लिए वन में जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। 

रात हो गई है और सब सुबह का इंतजार कर रहे हैं कब सुबह हो और हम राम जी से मिलने चलें। घर-घर लोग अनेकों प्रकार की सवारियाँ सजा रहे हैं। अयोध्या में रहने के लिए कोई तैयार नही है। लेकिन भरत जी ने कहा की नहीं, कुछ यहाँ भी रहो। सब नहीं चलेंगे। यदि सब चले गए और पीछे से किसी दुष्ट राजा ने आक्रमण कर दिया तो अयोध्या लूट जाएगी। और फिर मेरे राम राज्य कहाँ करेंगे? इसलिए कुछ लोग सुरक्षा में यहाँ रहो।

सारी रात जागते-जागते सबेरा हो गया। तब भरतजी ने चतुर मंत्रियों को बुलवाया और कहा- तिलक का सब सामान ले चलो। वन में ही मुनि वशिष्ठजी श्री रामचन्द्रजी को राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मंत्रियों ने वंदना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिए॥

सब माताएं, गुरुमाता, गुरुदेव और नगर के सब लोग रथों को सजा-सजाकर चित्रकूट को चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुंदर पालकियों पर चढ़-चढ़कर सब रानियाँ चलीं॥ श्री सीताजी-रामजी (सब सुखों को छोड़कर) वन में हैं, मन में ऐसा विचार करके छोटे भाई शत्रुघ्नजी सहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं॥

सबने कहा की भरत आप पैदल कैसे चल पाओगे? बहुत लम्बा रास्ता है।

भरत जी महाराज कहते हैं जब स्वामी इस मार्ग से पैदल जा सकते है तो क्या सेवक नहीं जा सकते? जब रघुनन्दन पैदल जा सकते है तो मैं भी पैदल ही जाऊंगा।

लेकिन माताओं ने कहा की भरत यदि तुम पैदल चलोगे तो सारा परिवार दुःखी हो जाएगा। तुम्हारे पैदल चलने से सभी लोग पैदल चलेंगे। माता की आज्ञा को सिर चढ़ाकर और उनके चरणों में सिर नवाकर दोनों भाई रथ पर खड़े हो गए हैं।

Bharat or Nishadraj Guh milan : भरत और निषादराज गुह मिलन

सब श्रृंगवेरपुर के समीप जा पहुँचे। निषादराज ने सब समाचार सुने, तो वह दुःखी होकर हृदय में विचार करने लगा- क्या कारण है जो भरत वन को जा रहे हैं? कहीं वो श्री राम से युद्ध करने तो नहीं जा रहे हैं? फिर मन में विचार करते हैं की भरत जी चाहते होंगे कि छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्री राम को मारकर सुख से निष्कण्टक राज्य करूँगा। ऐसा विचारकर गुह (निषादराज) ने अपनी जाति वालों से कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ। भरत से युद्ध में लड़कर मरने के लिए तैयार हो जाओ। युद्ध में मरण, फिर गंगाजी का तट, श्री रामजी का काम और क्षणभंगुर शरीर (जो चाहे जब नाश हो जाए), भरत श्री रामजी के भाई और राजा (उनके हाथ से मरना) और मैं नीच सेवक- बड़े भाग्य से ऐसी मृत्यु मिलती है॥

एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा- एक बार भरत से मिल लीजिए, क्या पता युद्ध की नौबत ही ना आये।

यह सुनकर निषादराज गुहने कहा- बूढ़ा ठीक कह रहा है।

निषादराज ने मुनिराज वशिष्ठजी को देखकर अपना नाम बतलाकर दूर ही से दण्डवत प्रणाम किया। मुनीश्वर वशिष्ठजी ने उसको राम का प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजी को समझाकर कहा (कि यह श्री रामजी का मित्र है)॥

यह श्री राम का मित्र है, इतना सुनते ही भरतजी ने रथ त्याग दिया। वे रथ से उतरकर प्रेम में उमँगते हुए चले। निषादराज गुह ने भरत जी को दंडवत प्रणाम किया। दण्डवत करते देखकर भरतजी ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया।

तुलसीदास जी कहते हैं – राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥

जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं (अर्थात आलस्य से भी जिनके मुँह से राम-नाम का उच्चारण हो जाता है), पापों के समूह (कोई भी पाप) उनके सामने नहीं आते।

फिर इस गुह को तो स्वयं श्री रामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन (जगत को पवित्र करने वाला) बना दिया॥

राम सखा निषादराज से प्रेम के साथ मिलकर भरतजी ने कुशल, मंगल और क्षेम पूछी।

भरतजी का शील और प्रेम देखकर निषाद प्रेममुग्ध होकर देह की सुध भूल गया॥ फिर धीरज धरकर भरतजी के चरणों की वंदना करके प्रेम के साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा- हे प्रभो! कुशल के मूल आपके चरण कमलों के दर्शन कर मैंने तीनों कालों में अपना कुशल जान लिया। मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनों से सब प्रकार से बाहर हूँ। पर जब से श्री रामचन्द्रजी ने मुझे अपनाया है, तभी से मैं विश्व का भूषण हो गया॥

अब भरत जी महाराज पूछते हैं की आप मुझे उस जगह लेके जाओ जहाँ पर मेरे राम सोये थे।  जहाँ पर मेरे प्रभु ने एक रात गुजारी थी। अब निषादराज भरत जी को उस जगह पर ले गए हैं। तो क्या देखते हैं की जिन पत्तों पर, जिन तिनकों पर राम सोये थे वहां तो मंदिर बन गया था। चारों और से उस स्थान को संरक्षित कर दिया था। कोई छुए ना, कोई छेड़े ना वो स्थान वैसा का वैसा था। लोग वहां पर मस्तक टेक रहे थे। जब भरत जी ने उस स्थान को देखा तो साष्टांग प्रणाम है और वे उस स्थान की परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं।  कहते हैं यहाँ मेरे राम सोये हैं तो ये स्थान मेरे लिए एक अयोध्या से कम नही है।

इस प्रकार रातभर सब लोग जागते रहे। सवेरा होते है यहाँ से फिर चले हैं। निषादराज को आगे करके पीछे सब माताओं की पालकियाँ चलाईं। छोटे भाई शत्रुघ्नजी को बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्राह्मणों सहित गुरुजी ने गमन किया॥ प्रेम में उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजी ने तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश किया। उनके चरणों में छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आए हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया। सब लोगों ने यहाँ पर स्नान किया है।

भरत जी ने यहाँ अपने आप को कोसा है। भरत जी के मन में केवल यही बात है की राम मेरे कारण वन में गए हैं। भरत जी कहते हैं -मुझे न अर्थ की रुचि (इच्छा) है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्म में मेरा श्री रामजी के चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं॥

भरतजी के वचन सुनकर बीच त्रिवेणी में से सुंदर मंगल देने वाली कोमल वाणी हुई। हे तात भरत! तुम सब प्रकार से साधु हो। श्री रामचंद्रजी के चरणों में तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हो। श्री रामचंद्रजी को तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है॥

त्रिवेणीजी के अनुकूल वचन सुनकर भरतजी का शरीर पुलकित हो गया, हृदय में हर्ष छा गया। भरतजी धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे॥

पेज 2 पर जाइये

One thought on “Ramayan : Bharat charitra in hindi part 2

  1. पुरुषोत्तम राम जी के विछोह ने भरत जी को झकझोर दिया जिसका परिणाम रहा भरत जी ने नाना उपायों का प्रयोग करने के उपरान्त गुरु की आज्ञा का पालन कर खडाऊं सिंहासन पर रख तपसी जीवन यापन किया और कहा –
    बिधि ण सकेउ सहि मोर दुलारा |
    नीच बीच जननी मिस पारा ||

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.