Ramayan : Bharat charitra in hindi part 1

Ramayan : Bharat charitra in hindi part 1

रामायण :  भरत चरित्र पार्ट 1

अब तक आपने पढ़ा की दशरथ जी महाराज देह त्याग चुके हैं। हर जगह शोक की लहर व्याप्त है। उस समय गुरुदेव वशिष्ठ जी आये हैं और सबको समझाया है। शिष्ठजी ने नाव में तेल भरवाकर राजा के शरीर को उसमें रखवा दिया। फिर दूतों को बुलवाकर उनसे ऐसा कहा- तुम लोग जल्दी दौड़कर भरत के पास जाओ। राजा की मृत्यु का समाचार कहीं किसी से न कहना। जाकर भरत से इतना ही कहना कि दोनों भाइयों को गुरुजी ने बुलवा भेजा है। मुनि की आज्ञा सुनकर धावन (दूत) दौड़े।

Bharat Shatrughan ka ayodhya aana : भरत शत्रुघ्न जी का अयोध्या आना 

इधर जबसे अयोध्या में अनर्थ हुआ है तबसे भरत जी को अपशकुन दिखाई दे रहे हैं। वे रात को भयंकर स्वप्न देखते थे। अनिष्टशान्ति के लिए) वे प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियों से रुद्राभिषेक करते थे। महादेवजी को हृदय में मनाकर उनसे माता-पिता, कुटुम्बी और भाइयों का कुशल-क्षेम माँगते थे॥

भरतजी इस प्रकार मन में चिंता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरुजी की आज्ञा कानों से सुनते ही वे हवा के समान वेग वाले घोड़ों को लेकर चले हैं। एक-एक पल वर्ष के समान बीत रहा था। नगर में प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरह से काँव-काँव कर रहे हैं। गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरत के मन में बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है। नगर के लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं हैं। श्री रामजी के वियोग में पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी सब रो रहे हैं। नगर के स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। भरत जी समझ गए बहुत बड़ी आफत आ गई है।

Bharat Kakai Sanwad : भरत ककई संवाद 

जब भरत आये हैं तो सबसे पहले ककई के महल में गए हैं। जबकि मर्यादा तो ये कहती हैं की पहले माँ कौसल्या के पास जाना चाहिए। इसका कारण है -क्योंकि राम हमेशा केकई के महल में रहते थे क्योंकि ककई से बहुत प्रेम था और जब राम ककई के महल में हैं तो राजा दशरथ भी वहीँ रहते थे। फिर तीनों माताएं भी वहीं रहती थी। और जब सब यहीं है तो लक्ष्मण भी यहीं रहते थे। आज भरत ने सोचा की मैं माता के महल में जाता हूँ तो मुझे सब वहीँ मिल जायेंगे। ये सोचकर केकई के महल में आये हैं।

ककई को महाराज के जाने का दुःख नही है बल्कि पुत्र के आने की ख़ुशी हो रही है। आरती की थाली लेकर खड़ी हैं। जैसे ही भरत ने माता का वेश देखा है तो मानो झकजोर दिया है भरत को। समझ गए है अब पिताजी स्वर्ग सिधार गए हैं। फिर भी पूछते हैं-

कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥

भरतजी ने कहा- कहो, पिताजी कहाँ हैं? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं?

ककई कहती है- बेटा, इनमे से तुम्हे कोई नही दिखेगा। मैंने बिगड़ती बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधाता ने बीच में जरा सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोक को पधार गए॥

भरत यह सुनते ही विषाद के मारे बेहाल हो गए। और जमीं पर तात! तात! करते हुए गिर पड़े। अपने आप को धिक्कारते हैं की अंतिम समय में पिताजी में आपकी सेवा नही कर पाया। मैं आपको स्वर्ग के लिए चलते समय देख भी न सका। फिर धीरज धरकर बोलते हैं – माता! पिता के मरने का कारण तो बताओ?

कुटिल और कठोर कैकेयी ने अपनी सब करनी शुरू से आखिर तक खुश होकर सुना दी।

श्री रामचन्द्रजी का वन जाना सुनकर भरतजी को पिता का मरण भूल गया और हृदय में इस सारे अनर्थ का कारण अपने को ही जानकर वे मौन होकर ज़िंदा लाश की तरह हो गए। भरत सोच रहे हैं की ये सब मेरे कारण हुआ है।

पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही हो। ककई कहती है भरत तुम चिंता छोड़ दो और राज्य भोगो।

उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लम्बी साँस लेते हुए कहा- पापिनी! तूने सभी तरह से कुल का नाश कर दिया। यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी  इच्छा थी, तो तूने जन्म देते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला? तूने पेड़ को काटकर पत्ते को सींचा है और मछली के जीने के लिए पानी को उलीच डाला! मुझे इनता अच्छा सूर्य वंश मिला, दशरथ जैसे पिताजी और राम लक्ष्मण जैसे भाई मिले लेकिन मेरा दुर्भाग्य तो देख मुझे तेरे जैसी माँ मिली।

जब तेरे ह्रदय में बुरा विचार आया तो तेरे ह्रदय के टुकड़े-टुकड़े क्यों नही हो गए? वरदान माँगते समय तेरे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई? तेरी जीभ गल नहीं गई? तेरे मुँह में कीड़े नहीं पड़ गए? राजा ने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? तू कौन है? मुझे सच-सच कह! तू जो है, सो है, अब मुँह में स्याही पोतकर (मुँह काला करके) उठकर मेरी आँखों की ओट में जा बैठ॥ भरत जी महाराज ने यहाँ तक कह दिया। तूने जग में ऐसा काम कर दिया है की आज के बाद कोई भी पिता अपनी बेटी का नाम ककई नही रखेगा। विधाता ने मुझे श्री रामजी से विरोध करने वाले तेरे हृदय से उत्पन्न किया। मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ॥

माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अंग क्रोध से जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय वो कुबरी (मंथरा) वहाँ आई। उसे देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध में भर गए। मानो जलती हुई आग को घी की आहुति मिल गई हो। उन्होंने जोर से तककर कूबड़ पर एक लात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ी। उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गए और मुँह से खून बहने लगा।

वह कराहती हुई बोली-हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा? जो भला करते बुरा फल पाया।

उसकी यह बात सुनकर शत्रुघ्नजी उसे पकड़-पकड़कर घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजी ने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई (तुरंत) कौसल्याजी के पास गए॥

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