Ramayan : Bharadwaj muni aur Vanvasiyon par kripa

Ramayan : Bharadwaj muni aur Vanvasiyon par kripa

रामायण : भारद्वाज मुनि और वनवासियों पर कृपा

अब तक आपने पढ़ा की भगवन ने केवट पर कृपा की है और भगवान गंगा पार उतरे हैं। भगवान के साथ में जानकी जी है , लक्ष्मण जी है और निषादराज गुह भी है। फिर रघुकुल के स्वामी श्री रामचन्द्रजी ने स्नान करके पार्थिव पूजा की और शिवजी को सिर नवाया। सीताजी ने हाथ जोड़कर गंगाजी से कहा- हे माता! मेरा मनोरथ पूरा कीजिएगा॥ जिससे मैं पति और देवर के साथ कुशलतापूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ।

सीता जी की ये विनती सुनकर तब गंगा मैया ने भी कह दिया- हे रघुवीर की प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे (कृपा दृष्टि से) देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं॥ तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी।

प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने निषादराज गुह से कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ! गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला- हे रघुकुल शिरोमणि! मेरी विनती सुनिए। मैं नाथ (आप) के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार (कुछ) दिन चरणों की सेवा करके लौट जाऊंगा। हे रघुराज! आप जहाँ जायेंगे में आपकी कुटिया बना दूंगा। उसके बाद आप मुझे जैसी आज्ञा देंगे में वैसा ही करूँगा।

इस पर लक्ष्मण जी भगवान को कहते हैं- रामजी! कैसे निराले हैं तुम्हारे भक्त? एक केवट था  , जो नाव लेके आ ही नही रहा था और एक ये निषादराज गुह है जो जा ही नही रहा है।

भगवान राम बोले मेरी कोई मानता ही नही है। जब महल से वन की और मैं चला तो जानकी जी आ गई। मैं भी चलूंगी। जब उनको साथ लिया तो तुम भी दौड़े दौड़े आये की मैं भी चलूँगा। तुम दोनों को चलने से रोक तो तुम भी साथ हो लिए। फिर सुमन्त्र जी को मुस्किल से वापिस लौटाया। फिर गुह को साथ चलने से मन किया। वो भी साथ हो लिया। केवट को कहा की आओ नाव लेके, लेकिन कहता है पहले चरण धोऊंगा फिर नाव में बिठाऊंगा। अरे भैया लक्ष्मण! ये भक्तो का प्रेम है मेरे प्रति नही तो मुझसे काल भी डरता है। बस भक्त ही नही डरते हैं मुझसे। क्योंकि मैं भक्त के आधीन हूँ लक्ष्मण।

अब रामचन्द्र जी ने गुह को अपने साथ लिया और वन की ओर चल दिए हैं। और भगवान ने प्रयाग(गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम) का दर्शन किया है। फिर भगवान ने अपने श्रीमुख से सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुह को तीर्थराज प्रयाग की महिमा कहकर सुनाई।

Ram aur Bharadwaj muni milan : राम और भारद्वाज मुनि मिलन  

भगवान त्रिवेणी में स्नान, पूजन आदि सब करके भरद्वाजजी के पास आए। उन्हें दण्डवत करते हुए ही मुनि ने हृदय से लगा लिया। ऋषि ने सब कुशल-मंगल पूछ कर भगवान को अमृत समान अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिए॥ सभी ने फलों को खाया है और थकावट दूर होने से श्री रामचन्द्रजी सुखी हो गए।

तब भरद्वाजजी ने उनसे कोमल वचन कहे-हे राम! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थ सेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनों का समुदाय भी सफल हो गया॥ आपके दर्शन से मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गईं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिए कि आपके चरण कमलों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो। जब तक कर्म, वचन और मन से छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तब तक करोड़ों उपाय करने से भी, स्वप्न में भी वह सुख नहीं पाता॥

मुनि के वचन सुनकर आनंद से तृप्त हुए भगवान श्री रामचन्द्रजी (लीला की दृष्टि से) सकुचा गए। तब (अपने ऐश्वर्य को छिपाते हुए) श्री रामचन्द्रजी ने भरद्वाज मुनि का सुंदर सुयश करोड़ों (अनेकों) प्रकार से कहकर सबको सुनाया॥ और राम जी कहते हैं- हे मुनीश्वर! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुण समूहों का घर है।

श्री राम, लक्ष्मण और सीताजी के आने की) खबर पाकर प्रयाग निवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब श्री दशरथजी के सुंदर पुत्रों को देखने के लिए भरद्वाजजी के आश्रम पर आए॥ श्री रामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। नेत्रों का लाभ पाकर सब आनंदित हो गए।

श्री रामजी ने रात को वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल प्रयागराज का स्नान करके मुनि को सर नवाकर कहते हैं- हे नाथ! बताइए हम किस मार्ग से जाएँ।
अब सोचिये थोड़ा जो सब को रास्ता दिखाते हैं ऐसे राम किसी से रास्ता पूछे तो हंसी तो आएगी ना ?
मुनि मन में हँसकर श्री रामजी से कहते हैं कि आपके लिए सभी मार्ग सुगम हैं॥ फिर भी मुनि ने चार ब्रह्मचारियों को भगवान के साथ भेज दिया। जब भगवान किसी गाँव के पास होकर निकलते हैं, तब स्त्री-पुरुष दौड़कर उनके रूप को देखने लगते हैं। फिर श्री रामजी ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया, वे मनचाही वस्तु (अनन्य भक्ति) पाकर लौटे।

अब भगवान ने यमुना जी में स्नान किया है। यमुना का रंग भी भगवान श्री रामचन्द्रजी के शरीर के समान ही श्याम रंग का था॥ यमुनाजी के किनारे पर रहने वाले स्त्री-पुरुष सभी भगवान की सोभा को, रूप को देख रहे हैं और अपने भाग्य की बड़ाई कर रहे हैं। वे भगवान से उनका नाम और गाम पूछते हैं। उन लोगों में जो वयोवृद्ध और चतुर थे, उन्होंने युक्ति से श्री रामचन्द्रजी को पहचान लिया॥ फिर सबको पता चल की भगवान को वनवास हुआ है। सभी कहते हैं विधाता ने और राजा-रानी ने वनवास देकर अच्छा नही किया।

पेज 2 पर जाइये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.