Radha Krishna Love Story in hindi

Radha Krishna Love Story in hindi

राधा कृष्ण प्रेम कथा 

श्री राधा और कृष्ण जी के बारे में ऐसा कौन होगा जिसने कभी सुना नही होगा। सभी जानते है की राधा और कृष्ण एक दूसरे से प्रेम करते थे। और इतना प्रेम करते थे की कृष्ण जी शरीर हैं राधा रानी आत्मा हैं। जैसे सूर्य और प्रकाश। जैसे चन्द्रमा और चकोर। कृष्ण गीत हैं तो राधा संगीत हैं, कृष्ण वंशी हैं तो राधा स्वर हैं, कृष्ण समुद्र हैं तो राधा तरंग हैं, कृष्ण पुष्प हैं तो राधा उस पुष्प कि सुगंध हैं। राधा जी कृष्ण जी की अल्हादिनी शक्ति हैं। वह दोनों एक दूसरे से अलग हैं ही नहीं। ठीक वैसे जैसे शिव और हरि एक ही हैं।

राधा और कृष्ण जी का नाम आज भी साथ में लिया जाता है। क्योंकि इनका प्रेम संसार की तरह लौकिक नही था बल्कि अलोकिक था। इनका प्रेम दिव्य था। जहाँ कामना और वासना का नामो निशान नही है।

 

सूरदास जी महाराज को राधा कृष्ण जी लीला दिखती थी और वही लीला वो पद के रूप में गाते थे। आपने पढ़ा कि राधा और कृष्ण पहली बार किस तरह से मिले और दोनों एक दूसरे को देखते ही रह गए। फिर भगवान ने कह दिया कि तुम मेरे साथ खेलो।

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दोनों ने एक दूसरे के मन की बात जान ली। दोनों ने आँखों ही आँखों में प्रेम-प्यार की बात कह डाली। राधा कृष्ण का प्रेम आँखों से देखा जा सकता है। फिर कृष्ण ने राधा जी से कहा कभी हमारे घर नन्द बाबा के घर, ब्रजगांव में भी खेलने आओ ना! 

और हाँ तुम दरवाजे पर आकर मुझे बुला लेना, कान्हा मेरा नाम है, और अगर तुम ये कहती हो कि मेरा घर दूर है तो कोई बात नहीं, तुम मन से एक बार पुकारना, मैं बोलते ही तुम्हारी पुकार सुन लूंगा।

 

राधा! तुम्हे वृषभानु(राधा जी के पिताजी) जी की सौगंध है, सुबह या शाम को एक बार चक्कर जरूर लगा लेना। तुम बिल्कुल ही सीधी साधी और भोली भाली हो(कहीं रस्ते में तुम्हे कोई बहला फुसला ना ले। इसलिए मैं तुम्हारा साथ चाहता हूँ। सूरदास जी कहते हैं कृष्ण जी रसिक शिरोमणि और चतुर हैं और उधर राधा जी प्रेम में चतुर हैं, दोनों मिलकर प्रेम लीला करते हैं।

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फिर राधा जी कृष्ण जी से विदा लेकर अपने घर आ रही हैं। रास्ते में ऊपरी मन से अपनी सखियों से कह रही है इसके(कृष्ण) द्वार पर खेलने भला कौन जायेगा? आज तो यमुना आये भी काफी देर हो गई। माँ बैठे-बैठे खीज(क्रोधित और चिंतित) रही होंगी। राधा जी ऊपरी मन से तो ऐसी बात कह रही है लेकिन ह्रदय में कृष्ण जी के लिए प्रेम है। आज पहले ही मिलन में कृष्ण जी ने राधा जी का मन चुरा लिया है।

 

 

घर पहुँचने पर माँ तीर्थी पूछती हैं- राधा! मेरी प्यारी बच्ची! आज इतने देर कहाँ लगा दी?

सूरदास जी कहते हैं कि राधा ने बात बनाते हुए कहा- माँ ! आज पशुओं का नया बड़ा(खरीक- जहाँ गायों को दूहा जाता है) देखने के लिए चली गई थी, इसी में इतनी देर हो गई।

 

(मानो आज राधा जी कहना चाह रही हैं कृष्ण के उस प्रेम बाड़े में मैं भी नई पोषित गऊ की तरह सम्मिलित हो गई हूँ।

 

राधा कृष्ण का अमर प्रेम

सूरदास जी एक सुंदर लीला का वर्णन करते हुए कहते हैं कि एक बार नन्द कृष्ण को लेकर गउओं के बाड़े में गए। उन्होंने वहां पर राधा जी को खड़े देखा; नन्द ने राधा को पहचान कर कहा कि तुम दोनों मिलकर खेलो पर कहीं दूर मत जाना,  मैं गायों की गिनती कर रहा हूँ। तुम आसपास ही रहना। हे वृषभानु की बेटी राधा, तुम अपने साथ कृष्ण को भी खिला लो और जरा श्याम का ध्यान भी रखना, कहीं ऐसा न हो की कोई गाय इसे मारने लगे।

 

अब नन्द बाबा जी चले गए हैं। राधा कृष्ण से कहती हैं- कृष्ण! नन्द बाबा की बात ध्यान से सुन लो, मुझे छोड़कर अगर कहीं जाओगे तो मैं तुमको पकड़कर अपने पास ले आउंगी। यह तो अच्छा हुआ की नंदबाबा तुम्हे मेरे हवाले कर गए हैं, अब चाहे जो हो, मैं तो तुम्हे कहीं भी नहीं जाने दूंगी।

 

तुम्हारी बांह भी नहीं छोडूंगी, अन्यथा महर(नन्द बाबा) हमसे नाराज हो जायेंगे(की मैं कृष्ण को तुम्हे सौंप गया था, तुमने उसे कहीं जाने क्यों दिया?)

 

 

राधा की इन प्रेम अधिकार बातों परिहास भरी बातों से ऊपरी क्रोध दिखाते हुए कृष्ण कहने लगे- राधा! तू मेरी बांह छोड़ दे, ये बेकार की अनाप शनाप बात ना कर। सूरदास जी कहते हैं इस प्रकार राधा कृष्ण अद्भुत प्रेम लीला कर रहे हैं।

 

 

 

तुम पै कौन दुहावै गैया।

 

सूरदास जी बता रहे हैं, राधा रानी भगवान श्री कृष्ण से कहती है- मनमोहन ! तुमसे कौन अपनी गाय को दुहावेगा? तुम सोने की दोहनी लिए रहते हो, और आधे पैरों से पृथ्वी पर बैठते हो। तुम मेरी प्रीति को अत्यंत रसमयी जानकर ही गोष्ठ में गायों को दुहने के लिए आते हो तो पर तुम्हे तो दूध दुहना आता ही नही है।

 

तुम इधर मेरी और देखते ही रहते हो, और उधर दूध की धार निकलते रहते हो, क्या तुम्हे तुम्हारी माँ ने यही सिखाया है?

हे मोहन! तुम उसी युवती से गुप्त प्रीति करो, जो तुम्हारी प्रिया हो।

सूरदास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु श्री कृष्ण से राधा ने इस प्रकार झगड़ा करना सीख लिया है, जैसे कोई झगड़ालू स्त्री घर के स्वामी अपने खसम से झगड़ती है।

 

 

दुहि दीन्ही राधा की गाइ।

 

गो दोहन लीला का सूरदास जी वर्णन करते हैं- श्री कृष्ण जी ने राधा जी की गाय का दूध तो निकल दिया, लेकिन वे अपने हाथ से दूध की दोहनी राधा जी को नही दे रहे हैं। जिसे वे हा-हा करती हुई उनके चरणों पर गिर रही हैं। ज्यों-ज्यों राधा प्रिया हा-हा करती हैं, त्यों-त्यों कन्हैया और अधिक हँसते हैं।

 

भगवान श्री कृष्ण राधा जी से कहते हैं- हे प्यारी ! तुम फिर हा-हा करो। मैं अपने पिता नंदजी की सौगंध खाकर कहता हूँ की तब मैं अपनी दोहनी तुम्हे दे दूंगा।’ तब राधा जी से पुनः पुनः हा-हा करवाकर श्रीकृष्णजी ने दोहनी प्रिया जी के हाथों में दे दी।

सूरदास जी कहते हैं इस प्रकार श्यामसुंदर ने रसमय हाव-भाव करके कुमारी राधा जी को उनके घर भेज दिया।

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