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Yudhisthira Rajasuya yajna(Yagy) story in hindi

Yudhisthira Rajasuya yajna(Yagy) story in hindi : 

युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ की कथा/कहानी 

राजा परीक्षित् ने शुकदेव जी पूछा की युधिष्ठिर जी के राजसूय यज्ञ को देखकर सभी खुश हुए लेकिन दुर्योधन को बड़ा दुःख, बड़ी पीड़ा हुई; यह बात मैंने आपके मुख से सुनी है। भगवन्! आप कृपा करके इसका कारण बतलाइये।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम्हरे दादा युधिष्ठिर बड़े महात्मा थे। उनके प्रेमबन्धन से बँधकर सभी बन्धु-बन्धावों ने राजसूय यज्ञ में विभिन्न सेवाकार्य स्वीकार किया था।

भीम भोजनालय की देख-रेख करते थे। सहदेव अभ्यागतों के स्वागत-सत्कार में नियुक्त थे और नकुल विविध प्रकार की सामग्री एकत्र करने का काम देखते थे। अर्जुन गुरुजनों की सेवा-शुश्रूषा करते थे और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आये हुए अतिथियों के पाँव पखारने का काम करते थे। देवी द्रौपदी भोजन परसने का काम करतीं और उदारशिरोमणि कर्ण खुले हाथों दान दिया करते थे।  इसी प्रकार सात्यिक, विकर्ण, हार्दिक्य, विदुर, भूरिश्रवा आदि बाह्लीक के पुत्र और सन्तर्दन आदि राजसूय यज्ञ में विभिन्न कर्मों में नियुक्त थे। वे सब-के-सब वैसा ही काम करते थे, जिससे महाराज युधिष्ठिर का प्रिय और हित हो ।

सभी अपने अपने सिंहासन पर बैठे थे। उसी समय ये प्रश्न आया कि सबसे पहले पूजा किनकी की जाये? सभी ने सहमति जताती कि भगवान श्री कृष्ण की पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। जैसे ही भगवान श्री कृष्ण की पूजा और सत्कार करने लगे तभी वहां पर चेदिराज शिशुपाल आ गया। और अकारण भगवान को गाली देने लगा। तब भगवान ने अपना सुदर्शन चक्र निकला और इसका वध कर दिया।

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सुदर्शन चक्र को हाथ में लेने के कारण भगवान की ऊँगली से रक्त बहने लगा। वहीँ पर द्रौपदी भी खड़ी थी। जैसे ही उन्होंने देखा कि मेरे कृष्ण के हाथ की ऊँगली से खूब बह रहा है उसी समय द्रौपदी जी ने अपनी साडी का एक छोर फाड़ के भगवान के हाथ से बाँध दिया। भगवान श्री कृष्ण ने कहा द्रौपदी आज मैं तुम्हारा ऋणी हो गया हूँ। इसका कर्ज में एक दिन जरूर उतारूंगा।

उस समय हर जगह मंगल ही मंगल और आनंद ही आनंद था। चक्रवर्ती राजा युधिष्ठिर द्रौपदी आदि रानियों के साथ सुन्दर-सुन्दर घोड़ों से युक्त एवं सोने के हारों से सुसज्जित रथ पर सवार होकर ऐसे शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वयं राजसूय यज्ञ प्रयाज आदि क्रियाओं के साथ मूर्तिमान् होकर प्रकट हो गया हो ।

 
ऋत्विजनों ने पत्नी-संयाज (एक प्रकार का यज्ञकर्म) तथा यज्ञान्त-स्नान सम्बन्धी कर्म करवाकर द्रौपदी के साथ सम्राट् युधिष्ठिर को आचमन करवाया और इसके बाद गंगास्नान। उस समय मनुष्यों की दुन्दुभियों के साथ ही देवताओं की दुन्दभियाँ भी बजने लगीं। बड़े-बड़े देवता, ऋषि-मुनि, पितर और मनुष्य पुष्पों की वर्षा करने लगे । महाराज युधिष्ठिर के स्नान कर लेने के बाद सभी वर्णों एवं आश्रमों के लोगों नी गंगाजी में स्नान किया; क्योंकि इस स्नान से बड़े-से-बड़ा महापापी भी अपनी पाप-राशि से तत्काल मुक्त हो जाता है। राजसूय यज्ञ में जितने लोग आये थे—परम शीलवान् ऋत्विज्, ब्रम्हवादी सदस्य, ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, राजा, देवता, ऋषि, मुनि पितर तथा अन्य प्राणी और अपने अनुयायियों के साथ लोकपाल—इन सबकी पूजा महाराज युधिष्ठिर ने की।

इसके बाद वे सभी लोग धर्मराज युधिष्ठिर से अनुमति लेकर अपने-अपने निवासस्थान को चले गये। सब लोग राजर्षि युधिष्ठिर के राजसूय महायज्ञ की प्रशंसा करते-करते तृप्त न होते थे। इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने बड़े प्रेम से अपने हितैषी सुहृद्-सम्बन्धियों, भाई-बन्धुओं और भगवान श्रीकृष्ण को भी रोक लिया, क्योंकि उन्हें उसके विछोह की कल्पना से ही बड़ा दुःख होता था।

भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंशी वीर साम्ब आदि को द्वारकापुरी भेज दिया और स्वयं राजा युधिष्ठिर की अभिलाषा पूर्ण करने के लिये, उन्हें आनन्द देने के लिये वहीं रह गये । इस प्रकार धर्मनन्दन महाराज युधिष्ठिर मनोरथों के महान् समुद्र को जिसे पार करना अत्यन्त कठिन है, भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अनायास ही पार कर गये और उनकी सारी चिन्ता मिट गयी ।

कुछ समय के बाद भगवान श्री कृष्ण, कर्ण, कौरव आदि सभी ने यहाँ से विदा ली। सिर्फ दुर्योधन और शकुनि रुक गए।

Duryodhan ka Apmaan(Insult) by Draupadi : दुर्योधन का  द्रोपदी द्वारा अपमान 

एक दिन की बात है, महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ द्वारा प्राप्त महत्व को देखकर दुर्योधन को बहुत ईर्ष्या हुई। पाण्डवों के लिये मय दानव ने जो महल बना दिये थे, उसमें नरपति, दैत्यपति और सुरपतियों की विविध विभूतियाँ तथा श्रेष्ठ सौन्दर्य स्थान-स्थान पर शोभायमान था। उनके द्वारा राजरानी द्रौपदी अपने पतियों की सेवा करती थीं। इन सबको देखकर दुर्योधन के मन में जलन होती थी क्योंकि महाराज युधिष्ठिर को ऐसा महल मिला जिसमे जल में थल और थल में जल प्रतीत होता था।

एक दिन अभिमानी दुर्योधन मय दानव द्वारा बनाये महल में गया। दुर्योधन यहाँ की सोभा देखकर आश्चर्यचकित था। एक जगह पर उसने सोचा कि अग्नि है। लेकिन वहां केवल भरम था। एक जगह दुर्योधन ने सोचा कि पानी है लेकिन वहां पर जमीं थी। दुर्योधन क्रोधवश द्वारपालों और सेवकों को झिड़क रहा था। उस सभा में मय दानव ने ऐसी माया फैला रखी थी कि दुर्योधन ने उससे मोहित हो स्थल को जल समझकर अपने वस्त्र समेट लिये और जल को स्थल समझकर वह उसमें गिर पड़ा।

जैसे ही दुर्योधन गिरा तो राजरानियाँ तथा दास दासियाँ हँसने लगे। द्रौपदी ने हंसी में कह दिया- “अंधे का पुत्र अँधा”। ये दो शब्द महाभारत युद्ध का कारण बने।

यद्यपि युधिष्ठिर उन्हें ऐसा करने से रोक रहे थे, परन्तु प्यारे परीक्षित्! उन्हें इशारे से श्रीकृष्ण का अनुमोदन प्राप्त हो चुका था।

दुर्योधन का अपमान हुआ जिससे दुर्योधन लज्जित हो गया, उसका रोम-रोम क्रोध से जलने लगा। अब वह मुँह लटकाकर चुपचाप सभा भवन से निकलकर हस्तिनापुर चला गया। इस घटना को देखकर सत्पुरुषों में हाहाकार मच गया और धर्मराज युधिष्ठिर का मन भी कुछ खिन्न-सा हो गया। दुर्योधन ने कर्ण को सारी बात बताई औरअपने अपमान बदला लेने की सोची।

यह सब होने पर भी भगवान श्रीकृष्ण चुप थे। उनकी इच्छा थी कि किसी प्रकार पृथ्वी का भार उतर जाय; और सच पूछो तो उन्हीं की दृष्टि से दुर्योधन को वह भ्रम हुआ था। तुमने मुझसे यह पूछा था कि उस महान् राजसूय-यज्ञ में दुर्योधन को डाह क्यों हुआ ? जलन क्यों हुई ? सो वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया।

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