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What is Yagya in hindi : यज्ञ क्या है?

What is Yagya in hindi : यज्ञ क्या है?

 

श्रीमद भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि जब प्राणी कर्म करने पर विवश है तो उसे चाहिए कि कर्म इस प्रकार करे जैसे कोई यज्ञ किया जाता है।

यज्ञ क्या होता है? : Yagya Kya hota hai 

अर्जुन पूछते हैं – यज्ञ(Yagya)?
कृष्ण कहते हैं – हाँ पार्थ! यज्ञ(yagya) लोक कल्याण के लिए भी किया जाता है और भगवान की आराधना के लिए भी। इसलिए जब कर्म करना ही है तो अपने सारे या तो लोक कल्याण के लिए कर या मेरे निमित्त कर। इससे तेरे कर्म एक यज्ञ के समान पवित्र, कल्याणजनक और दिव्य हो जायेंगे। इसलिए कर्म को यज्ञ समझकर करता जा तो कर्म बंधन से मुक्त रहेगा। क्योंकि हे पार्थ! यज्ञात जो कर्म किया जाता है उसको छोड़कर बाकि सब प्रकार के कर्म का बंधन मनुष्य को बाँध लेता है।

 

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।।
अर्थ : – यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।

 

कर्मभूमि पर कर्म का, है विधान अनिवार्य,
कर्म यज्ञ की भांति कर हे अर्जुन हे आर्य।

 

तन मन प्राण पवित्र बनाये कर्म के यज्ञ की पावन ज्योति,
यज्ञ के मूल में हो बलिदान तो सोइ आत्मा जाग्रत होती,
यज्ञ वृत्ति को त्यागने पड़ते अभिलाषाओं की झूठे मोती,
ममता मोह की आहुतियों से, पूर्णाहुति इस यज्ञ की होती,
कर्म का यज्ञ करो निष्काम तो पुराणहुति इस यज्ञ की होती।

 

कृष्ण कहते हैं – हे अर्जुन! शास्त्रों में कई प्रकार के यज्ञों का वर्णन है, जिनके द्वारा प्राणी देवताओं की आराधना करके उनको प्रसन्न करते हैं। हे अर्जुन! समस्त देवता मेरा ही स्वरूप हैं। इसलिए इन यज्ञों के द्वारा प्राणी मेरी ही आराधना करते हैं।

Types of Yagya in hindi : यज्ञ के प्रकार

अर्जुन पूछते हैं – हे मधुसूदन! तुम्हारे कहने का अर्थ है कि यज्ञ कई प्रकार के होते हैं। कृपा करके मुझे उन सबका विवरण बताओ।
कृष्ण कहते हैं – पार्थ! पहले ये समझ लो यज्ञ क्या है(Yagya Kya hai) । अपनी किसी श्रेष्ठ वस्तु को, अपने धन-दौलत को, अपनी किसी विशिष्ट भावना को, बल्कि अपनी किसी तीव्र कामना को भी मुझ परमात्मा के चरणों में समर्पण कर देना इसी को यज्ञ कहते हैं। अपनी प्रिय वस्तु की कुर्बानी यही यज्ञ की मूल भावना है। इसलिए शास्त्र कहते हैं कि यज्ञ में आहुतियां देने के पश्चात् जो अन्न बच जाता है उसे खाने वाला मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और जो लोग केवल अपना ही पेट भरने की ही भावना से अन्न पकाते हैं वो तो पाप का ही भोजन करते हैं।

 

अर्जुन पूछते हैं – हे केशव! यज्ञ के बारे में तो आम धारणा तो यही है कि अग्नि जलाकर अग्नि कुंड में आहुतियां देने का नाम यज्ञ है? परन्तु हे माधव! तुम तो कहते हो जन कल्याण का कोई भी कर्म यज्ञ है। अपनी किसी प्रिय वस्तु का बलिदान अथवा त्याग ही यज्ञ है। इसका अर्थ क्या है?
कृष्ण बोलते हैं- ये ठीक है कि प्राणी अपनी-अपनी निष्ठा के द्वारा ही अलग-अलग प्रकार से अलग-अलग देवताओं की पूजा करने के लिए हवन आदि करते हैं, उसे भी यज्ञ कहते हैं।
कुछ लोग परम दानी होते हैं। वो अपने धन आदि का दान करते हैं। वो भी यज्ञ है। उसे कहते हैं।
कई लोग निस्वार्थ भाव से विद्या दान करते हैं उसे  कहा जाता है।

 

(यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि – सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ) भगवान के नाम का जप करना भी एक यज्ञ है उसे जपयज्ञ(Jap Yagya) कहते हैं।

 

इसके अतिरिक्त अष्टांग योग साधन की कुछ योगिक क्रियाएं भी ऐसी है जिनके द्वारा कई योगी पुरुष आध्यात्मिक सिद्धियों के लिए प्राणायाम की क्रियाओं पर आधारित प्राणयज्ञ(Pran Gyayga) करते हैं।

 

अर्जुन पूछते हैं – ये प्राणायाम की क्रिया पर आधारित कैसे होता है केशव!

कृष्ण बोलते हैं – योगीजन मंत्र और तंत्र दोनों प्रकार की साधन पद्धतियों के द्वारा कभी अपानवायु(भीतर आने वाला श्वास) में प्राणवायु(बाहर जाने वाली वायु ) का हरण करते हैं और कभी प्राणवायु में अपानवायु का हरण करते हैं और कुछ योगी गूढ़ योग विद्या के द्वारा प्राणवायु और अपानवायु दोनों की गति को रोककर अपने प्राणों का प्राणों में ही हवन करते हैं।

हे अर्जुन! इस प्रकार की साधना का प्रयोग करने से पहले किसी सिद्ध गुरु से उसकी पूर्ण शिक्षा प्राप्त करनी आवश्यक है। उसके लिए प्राणी को चाहिए कि बहुत विनम्र होकर गुरु से बार-बार प्रार्थना करे तो गुरु प्रसन्न होकर उसे इन सबका ज्ञान प्रदान करेंगे। गुरु के मार्गदर्शन के बिना उस पथ पर चलने में बहुत खतरा हो सकता है।

अर्जुन कहते है – हे मदुसूदन! तुमने अति उत्तम यज्ञों का वर्णन किया है। परन्तु इनमें से कुछ यज्ञ ऐसे हैं जो सारे मनुष्य नहीं कर सकते। जैसे द्रव्य यज्ञ, कोई निर्धन व्यक्ति नहीं कर सकता। इसलिए हे कृष्ण! जन कल्याण के लिए ये बताओ कि सबसे श्रेष्ठ यज्ञ कौनसा है(best Yagya in hindi)?

कृष्ण बोले- हे पार्थ! द्रव्य यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है क्योंकि मानव का सर्वोच्च कल्याण केवल ज्ञान की शक्ति से ही हो सकता है। ज्ञान ही मानव को अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म की पहचान करवाता है। यहाँ तक कि ज्ञान के द्वारा ही प्राणी को भगवान के सही रूप का ज्ञान होता है।
हे पार्थ! ज्ञान ही वो अग्नि है जिसमें मानव के सारे दोष, दम्भ, अहंकार आदि, अवगुण भस्म हो जाते हैं। यहाँ तक की भक्ति का मूल भी ज्ञान ही है।
अर्जुन चौंक कर पूछते हैं – क्या कहा, भक्ति का उद्गम भी ज्ञान से ही होता है?

कृष्ण कहते हैं – हाँ अर्जुन! ज्ञान के पर्वत की चोटी पर पहुंचकर ही मनुष्य को ये ज्ञान प्राप्त होता है कि ज्ञान पर्वत की चोटी से बहुत ऊपर वो निर्बल आकाश है जहाँ भक्ति का राज्य है और जब प्राणी उस भक्ति के आकाश में पहुँचता है वही प्रभु उसका हाथ पकड़कर अपने श्री चरणों में ले जाते हैं। हे अर्जुन ये समझ लो कि ज्ञान की अंतिम सीढ़ी पर चढ़कर ही प्राणी को श्रद्धा के पंख प्राप्त होते हैं और उन श्रद्धा के पंखों की सहायता से प्राणी भक्ति के आकाश में उड़ने लगता है। इसलिए मैंने ज्ञान यज्ञ(Gyan Yagya) को ही सर्वश्रेष्ठ कहा है।

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