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What is vairagya in hindi | Shrimad Bhagavad Gita

What is vairagya in hindi | Shrimad Bhagavad Gita

वैराग्य क्या है? | श्रीमद भगवद गीता 

वैराग्य क्या है?(vairagya kya hai) वैराग्य शब्द बड़ा ही सुन्दर है। देखने में, कहने में, बोलने में अच्छा भी लगता है लेकिन जब वैर्ग्य धारण करने की बात आती है तब हमारा वैराग्य शमशान वैराग्य हो जाता है। जैसे किसी के अंतिम संस्कार पर जाये तो उस समय लोग ऐसी ऐसी बातें करते हैं कि ये दुनिया नश्वर है, एक दिन सबको मरना है, कुछ नहीं रखा इस दुनिया में। कोई अगर उनकी बात सुन ले तो ऐसा लगेगा जैसे अभी ये शमशान भूमि से निकल कर सीधा हिमालय की ओर जायेगा। लेकिन जैसे ही वो शमशान भूमि से निकला तो वही जीवन की झिक झिक और कीच कीच। कभी ऑफिस के लिए लेट, तो कभी कोई प्रोजेक्ट पूरा करना है। जिसका जो भी क्षेत्र है, अपने काम में busy हो जाता है। यही बात अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को कहते हैं अर्जुन अगर तू इस मन को काबू में करना चाहता है तो तुझे अभ्यास और वैराग्य , दो तलवारों से प्रहार करना पड़ेगा।

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अब अर्जुन पूछता है- हे केशव! ये जो तुम वैराग्य की बात करते हो, ये तो तभी आ सकता है जब प्राणी को आपकी इस बात पर विश्वास हो जाये कि ये सारा जगत वास्तव में मिथ्या है, नश्वर है, परन्तु आपकी माया के प्रभाव से वो सत्य जान पड़ता है। इस परम सत्य के ज्ञान पर विश्वास हो जाये तभी तो वैराग्य होगा।

 

कृष्ण कहते हैं- बिल्कुल! ज्ञान ही मनुष्य के ह्रदय में वैराग्य पैदा कर सकता है और वही सच्चा ज्ञान मैं तुम्हे प्रदान कर रहा हूँ। 

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अर्जुन कहता है- तुम तो प्रदान कर रहे हो केशव, परन्तु मेरा मन उसको ग्रहण क्यों नहीं कर रहा है?

 

कृष्ण बोले – क्योंकि अभी तक तुम मोह और भ्रम के अंधकार से बाहर नहीं निकले। इसलिए तुम उस ज्ञान को ग्रहण करने में असमर्थ हो। इसलिए मैं तुम्हे समझा रहा हूँ कि केवल शरीर मरते हैं।  आत्मा नहीं मरती।  इसलिए तुम शरीर का मोह त्याग दो। उनकी मृत्यु का शोक त्याग दो। परन्तु तुम्हारा मन उस सत्य को मानना नहीं चाहता है। 

 

अर्जुन बोला-  तुम ठीक कहते हो केशव! मैं तुम्हारी बात समझता तो हूँ परन्तु मेरा मन उसे ग्रहण क्यों नहीं कर रहा, इसका कारण क्या है?

 

कृष्ण कहते हैं- इसका कारण है ये जंजीर, जो तुम्हारे मन ने अपने ही गिर्द लपेट रखी है।

 

अर्जुन पूछता है- कौनसी जंजीर?

 

कृष्ण बोले – रिश्तेदारी की ज़ंजीर, ये नातेदारी का मोह, कि ये मेरा भाई है, ये मेरा मामा है, ये मेरा ससुर है, ये पितामह है।

 

अर्जुन कहते हैं- तुम ठीक कहते हो। कि रिश्ते नातों की ज़ंजीरों ने मुझे चारों तरफ से जकड रखा है। परन्तु मैं इस ज़ंज़ीर को कैसे तोड़ दूँ? मैंने मान लिया कि ये सारे शरीर नाशवान हैं परन्तु इनके साथ जो मेरे रिश्ते हैं वो तो नाशवान नहीं है। वो तो सच्चे हैं। भीष्म मेरे पितामह हैं। अभिमन्यु मेरा पुत्र है। महाबली भीम मेरा सहोदर भाई है। ये रिश्ते तो सच्चे हैं। भले ही इन सबके शरीर मर जायेंगे पर इनके साथ मेरे जो रिश्ते हैं वो तो नहीं मारेंगें?

जैसे आज मेरे पिता महाराज पाण्डु का शरीर नहीं है, परन्तु मेरे पिता आज भी महाराज पाण्डु हैं। पिता, पुत्र का तो वो पवित्र रिश्ता समाप्त नहीं हुआ। इन रिश्तों की पवित्रता पर मैं कैसे प्रहार करूँ?

शरीर को भूल जाऊँ, परन्तु अपने दादा की रिश्ते पर तीर कैसे चलाऊँ?

अपने भाई के नाते पर तलवार कैसे उठाऊं?

कृष्ण कहते हैं- अर्जुन! ये रिश्ते, ये नाते सब इस जन्म के हैं। इस जन्म से पहले या इस जन्म के पश्चात् इन रिश्तों का कोई अस्तित्व नहीं रहता। ये काका, मामा, भाई, पुत्र, पितामह, पिछले जन्म में कहाँ थे? तुम्हारे क्या लगते है? और अगले जन्म में ये क्या होंगे, कहाँ होंगे? इसका उत्तर है तुम्हारे पास?

अर्जुन कहता हैं- नहीं केशव।

 

कृष्ण बोले- इसलिए कहता हूँ कि जब शरीर नाशवान है तो ये रिश्ते भी नाशवान हैं। क्योंकि ये सब नाते शरीर के हैं और ये जो तुमने अपने पिता का उदाहरण दिया कि उनका तुम्हारा पिता-पुत्र का नाता तो समाप्त नहीं हुआ तो ये भी तुम्हारा भ्रम है, अज्ञान है। केवल तुम्हारे मन में वो रिश्ता अभी तक जीवित है। क्योंकि तुम अभी तक उसी जन्म में हो परन्तु तुम्हारे पिताश्री इस समय जिस योनि में भी होंगे, उनके लिए वो रिश्ता समाप्त हो चुका है। पिता की बात छोड़ो, अपनी बात करो।

Rishton ka moh kaise chode |  Bhagwat Geeta : रिश्तों का मोह कैसे छोड़ें | श्रीमद भगवद गीता

पिछले जन्म में जब तुम्हारी मृत्यु हुई होगी उस समय तुम्हारे सब सम्बन्धी रोये होंगे। तुम्हारी पत्नी ने, तुम्हारे पुत्रों ने बहुत विलाप किया होगा। परन्तु आज इस जन्म में तुम्हे याद भी नहीं कि किस किस ने तुम्हारी मृत्यु पर विलाप किया था। आज तुम्हारे लिए उनका या उनके रोने धोने का कोई मोल नहीं। इसलिए समझा रहा हूँ कि ना किसी के मरने का शोक करो, ना किसी के साथ नाता टूटने का दुःख मानो। वैसे भी मेरी माया इतनी प्रबल है अर्जुन, कि जिन्हें तू समझता है कि तेरी मृत्यु के बाद शोक करेंगे, सारा जीवन रोते रहेंगे वो भी असत्य है। मेरी माया के प्रभाव से थोड़े ही दिनों के बाद उन रोने वालों को तू हँसता, खेलता देखेगा।

मित्र चार दिन रोता है, भाई दस दिन रोता है, पत्नी उससे अधिक रोती है, माता सबसे अधिक समय तक रोती है परन्तु सबके आंसू धीरे-धीरे सुख जाते हैं और उन आँखों में फिर से नए नए सपनों की रौशनी चमकने लगती है।

 

हे अर्जुन! क्या तुम बता सकते हो, कि पिछले जन्म में तुम्हारे किस रिश्तेदार ने तुम्हारे लिए कितना विलाप किया था?

 

अर्जुन बोले- नहीं केशव! ये मैं कैसे बता सकता हूँ। मुझे तो ये तक याद नहीं कि वो कौन थे?

 

कृष्ण कहते हैं- बस, जिस तरह तुम अपने पिछले जन्म को भूल गए हो उसी तरह तुम अपने इस जन्म को भी भूल जाओगे। इस जन्म के रिश्तों का अर्थ तुम्हारे आने वाले जन्म में कुछ भी नहीं रह जायेगा। आज अभिमन्यु को तुम अपना पुत्र समझ रहे हो। हो सकता है पिछले जन्म में वो तुम्हारा पिता रहा हो। या आने वाले जन्म में तुम्हारा महाशत्रु बन जाये। आज तुम जिनको अपना रिश्तेदार समझ रहे हो। अपना आदरणीय समझ रहे हो और इसी कारण उनकी हत्या करने से संकोच कर रहे हो, हो सकता उनमें से किसी ने तुम्हारे पिछले जन्म में तुम्हारी हत्या की हो। या तुम ही अगले जन्म उनकी हत्या करदो।

 

हे अर्जुन! ये रिश्ते शरीर के जन्म के साथ पैदा होते हैं और शरीर की मृत्यु के साथ मर जाते हैं। इसलिए इन रिश्ते नातों के चक्रव्यूह से बाहर आ जाओ। आत्मा अमर है। इस अमर सत्य को पहचानो। रिश्ते तो बदलते रहते हैं।

 

हे अर्जुन! इसलिए तुम्हे न रिश्तों से मोह करना चाहिए, न रिश्तों के टूटने का शोक करना चाहिए। यही सांख्य योग का ज्ञान है। कि मनुष्य को एक सन्यासी की भांति सोचना चाहिए कि ये सब रिश्ते, नाते, मोह को उत्पन्न करते हैं और मोह इन रिश्तों को इतनी जोर से पकड़ लेता है जैसे एक लोभी पुरुष नदी में डूबते हुए भी धन की गठरी को नहीं छोड़ता और आखिर में उसी गठरी के बोझ से खुद भी डूब जाता है। इसलिए अपने मन को सन्यासी बनाओ और इस मोह के बंधनों को छोड़ो और इस बात पर ध्यान दो कि इस समय तुम्हारा कर्तव्य क्या है? तुम्हारा धर्म क्या है और उसी के अनुसार कर्म करो।

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4 thoughts on “What is vairagya in hindi | Shrimad Bhagavad Gita

  1. i want to know from where u got this content which u published above like how we can get rid from the attachment of family or other.

  2. apne ye website kab banayi kis sun me bhanai…

    Ramanand sagar ne wahi dikhaya hai jo grantho me likha hai likin thoda apni bhasa me….unke dwara banaya gaya serial shri krishna

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