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Usha-Aniruddha Vivah Story in hindi

Usha-Aniruddha Vivah Story in hindi

उषा अनिरुद्ध विवाह कहानी/कथा 

 

राजा परीक्षित् ने शुकदेव जी से पूछा – गुरुदेव! मैंने सुना है कि यदुवंशशिरोमणि प्रद्युमन के पुत्र अनिरुद्धजी ने बाणासुर की बेटी उषा से विवाह किया था। और इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण और शंकरजी का बहुत बड़ा घमासान युद्ध हुआ था। आप कृपा करके यह वृतान्त विस्तार से सुनाइये ।

 

श्री शुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा बलि की कथा तो तुम सुन ही चुके हो। उन्होंने वामनरूपधारी भगवान को सारी पृथ्वी का दान कर दिया था। उनके सौ लड़के थे। उनमें सबसे बड़ा था बाणासुर। बाणासुर भगवान शिव की भक्ति में सदा मगन रहता था। समाज में उसका बड़ा आदर था। उसकी उदारता और बुद्धिमत्ता प्रशंसनीय थी। उसकी प्रतिज्ञा अटल होती थी और सचमुच वह बात का धनी था। उन दिनों वह परम रमणीय शोणितपुर में राज्य करता था। उसके हजार भुजाएँ(हाथ) थीं।  एक दिन जब भगवान शंकर ताण्डवनृत्य कर रहे थे, तब उसने अपने हजार हाथों से अनेकों प्रकार के बाजे बजाकर उन्हें प्रसन्न कर लिया। भगवान शिव ने बाणासुर से कहा- ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।’

 

बाणासुर ने कहा—‘भगवन्! आप मेरे नगर की रक्षा करते हुए यहीं रहा करें’। भगवान शिव ने इन्हे ये वरदान दे दिया।

 

एक दिन अपने बल के घमंड में बाणासुर ने  भगवान शंकर के चरणकमलों को सूर्य के समान चमकीले मुकुट से छूकर प्रणाम किया और कहा— ‘देवाधिवदेव!  आपने मुझे एक हजार भुजाएँ दी हैं, परन्तु वे मेरे लिये केवल भाररूप हो रही हैं। क्योंकि त्रिलोकी में आपको छोड़कर मुझे अपनी बराबरी का कोई वीर-योद्धा ही नहीं मिलता, जो मुझसे लड़ सके।

 

मुझसे सब डरते हैं कोई मेरे से युद्ध नही कर सकता और ना ही युद्ध करना चाहता है। सभी मुझसे डर कर भाग गए।

 

बाणासुर की यह प्रार्थना सुनकर भगवान शंकर ने तनिक क्रोध से कहा—‘रे मूढ़! जिस समय तेरी ध्वजा टूटकर गिर जायगी, उस समय मेरे ही समान युद्धा से तेरा युद्ध होगा और वह युद्ध तेरा घमंड चूर-चूर कर देगा’।

 

बाणासुर की बुद्धि इतनी बिगड़ गयी थी कि भगवान शंकर की बात सुनकर उसे बड़ा हर्ष हुआ और वह अपने घर लौट गया। अब वह मूर्ख भगवान शंकर के आदेशानुसार उस युद्ध की प्रतीक्षा करने लगा। वह प्रतिदिन अपनी ध्वजा को जाकर देखता था।

 

 

बाणासुर की एक बेटी थी, जिसका नाम था उषा। एक दिन उसने सपने में अपने को अनिरुद्धजी के साथ देखा। और उसे अनिरुद्ध से प्रेम हो गया। आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसने अनिरुद्धजी को न तो कभी देखा था और न ही सुना ही था ।

 

स्वप्न में ही उन्हें न देखकर वह बोल उठी—‘प्राणप्यारे! तुम कहाँ हो ?’ और उसकी नींद टूट गयी।

 

बाणासुर के एक मन्त्री थे जिनका नाम था कुम्भाण्ड। उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था चित्रलेखा।

उषा और चित्रलेखा एक-दूसरे की सहेलियाँ थीं। चित्रलेखा ने उषा से पूछा— राजकुमारी! मैं देखती हूँ कि अभी तक किसी ने तुम्हारा पाणिग्रहण भी नहीं किया है। फिर तुम किसे ढूँढ रही हो और तुम्हारे मनोरथ का क्या स्वरुप है ?’

 

उषा ने अपने सपने की सारी बात उसे बता दी। चित्रलेखा ने कहा—‘सखी! यदि तुम्हारा चित्त चोर त्रिलोकी में कहीं भी होगा, और उसे तुम पहचान करोगी, तो मैं तुम्हारी विरह-व्यथा वश्य शान्त कर दूँगी। मैं चित्र बनाती हूँ, तुम उन्हें पहचान कर बतला दो। फिर वह चाहे कहीं भी होगा, मैं उसे तुम्हारे पास ले आऊँगी’।

 

ऐसा कहकर चित्रलेखा ने बातों ही बातों में बहुत-से देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पन्नग, दैत्य, विद्याधर, यक्ष और मनुष्यों के चित्र बना दिये। मनुष्यों में उसने वृष्णिवंशी वसुदेवजी के पिता शूर, स्वयं वसुदवजी, बलरामजी और भगवान श्रीकृष्ण आदि के चित्र बनाये।

प्रद्दुम्न का चित्र देखते ही ऊषा लज्जित हो गयी । परीक्षित्! जब उसने अनिरुद्ध का चित्र देखा, तब तो लज्जा के मारे उसका सिर नीचा हो गया। फिर मन्द-मन्द मुसकराते हुए उसने कहा—‘मेरा यह प्राणवल्लभ यही है, यही है’।

 

चित्रलेखा योगिनी थी। वह जान गयी कि ये भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र हैं। अब वह आकाशमार्ग से रात में ही भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित द्वारकापुरी में पहुँची। वहाँ अनिरुद्धजी बहुत ही सुन्दर पलँग पर सो रहे थे। चित्रलेखा योगसिद्धि के प्रभाव से उन्हें उठाकर शोणितपुर ले आयी और अपनी सखी उषा को उसके प्रियतम का दर्शन करा दिया।

 

उषा बहुत खुश हुई और अनिरुद्धजी के साथ अपने महल में विहार करने लगी। उसका अन्तःपुर इतना सुरक्षित था कि उसकी ओर कोई पुरुष झाँकतक नहीं सकता था ।  उषा का प्रेम दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा था। वह अनिरुद्धजी का बड़ा सत्कार करती। उषा ने अपने प्रेम से उनके मन को अपने वश में कर लिया। अनिरुद्धजी उस कन्या के अन्तःपुर में छिपे रहकर अपने-आपको भूल गये। उन्हें इस बात का भी पता न चला कि मुझे यहाँ आये कितने दिन बीत गये ।

 

जब काफी दिन हो गए तो  पहरेदारों ने समझ लिया कि इसका किसी-न-किसी पुरुष से सम्बन्ध अवश्य हो गया है। उन्होंने जाकर बाणासुर से निवेदन किया—‘राजन्! हम आपके यहाँ दिन-रात पहरा दे रहे हैं लेकिन हमें कुछ ठीक नही लग रहा है। हमें उषा की आदतें ठीक नही लग रही है।

 

जब बाणासुर ने सुना तो वह एकदम से उषा के महल में जा धमका और देखा कि अनिरुद्धजी वहाँ बैठे हुए हैं। अनिरुद्धजी स्वयं कामावतार प्रद्दुम्नजी के पुत्र थे। त्रिभुवन में उनके जैसा सुन्दर और कोई न था। अनिरुद्धजी उस समय अपनी सब ओर से सज-धजकर बैठी हुई प्रियतमा उषा के साथ पासे खेल रहे थे।

 

उन्हें उषा के सामने ही बैठा देखकर बाणासुर विस्मित—चकित हो गया। और फिर अनिरुद्ध और बाणासुर का युद्ध हुआ। अंत में बाणासुर ने अनिरुद्ध को नागपाश से बाँध लिया। उषा ने जब देखा कि उसके प्रियतम को बाँध लिया गया है, तब वह अत्यन्त शोक और दुःख से रोने लगी।

 

बरसात के चार महीने बीत गये। परन्तु अनिरुद्धजी का कहीं पता न चला। एक दिन नारदजी ने आकर अनिरुद्ध का शोणितपुर जाना, वहाँ बाणासुर के सैनिकों को हराना और फिर नागपाशमें बाँध जाना—यह सारा समाचार सुनाया।

 

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2 thoughts on “Usha-Aniruddha Vivah Story in hindi

  1. Bhagwan shiv ji Parmatma ka rup hai, krushna bhagwan vishnu bhagwan ke avtar hai, bhagwan shivji NE hi bhavishvani ki thi ki aapka Har ek avtar me samman hoga aur kirti hogi, banasur ka ahankar bad gaya tab unhone hi bhavishvani ki thi ki tumhare sath yudh krne wala koi aayega, krushna bhagwan aur banasur ka yudh chl raha tha to unhone apni raksha hetu shiv bhagwan ka avahan Kiya to shiv NE banasur ko diye vachan ke Karan shiv bhagwan aa Gaye aur bhagwan krushna ko kaha yudh se hat Jaye ya fir aapko muzse yudh krna hoga to krushna bhagwan nahi hate shiv ko aate dekh Kar krushna bhagwan ki sena bhagne lagi aur tab krushna bhagwan NE shivji ko kaha ki agar aap yudh me honge to Mai banasur ko parajit nahi Kar paunga aur banasur ko parajit karna vidhi ka vidhan hai, aur ye shivji ka hi vidhan tha, ye sunkar shiv ji yudh se laut Gaye, tab krushna bhagwan NE Sudarshan chakr se char bhuja chodkar sab bhuja ye Kat di shiv bhagwan ji ko Pata chla to shiv bhagwan vapas apne bhkt ke raksha ke liye vapas aaye, bhujaye katne se banasur ka ahankar nasht Hua tha, aur shiv ji apne bhakt ke raksha krne ke liye krushna bhagwan ko kaha ki aap banasur ko chod do nahi to aapko muzse yudh krna hoga tab krushna bhagwan NE banasur ko chod diya aur Usha aur anirudh ka vivah Kar diya. Shama chahunga aapko Puran ke anusar jo jankari mili hogi vo aapne likhi hogi, ravan ka ahankar bad gaya tab ram bhagwan aaye, banasur ka ahankar bada to krushna bhagwan aaye, jab jab ahankar Badega avtar hote rahenge.. Tq

    • Bhagwan Shiv Or Bhagwan Ram/Krishan me koi bhi bhi bhed nahi hai. Shiv kehte hai krishan meri aatma hai or Krishan kehte hai shiv meri aatma hai. Bhagwan jo bhi karte hai accha hi karte hai. Unhi ki leela hoti hai. Ram ji kehte hai jo Shiv me or Mere me koi bhed karta hai vo muje kabhi bhi prapt nhi kar sakta. Or muje Shiv ke saman koi priye nahi hai. Isliye Bhagwaan ki leelao ka aanand lijiye….

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