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Uddhav Charitra Story in hindi

Uddhav Charitra Story in hindi

उद्धव चरित्र कथा/कहानी

 

संदीपनी ऋषि के आश्रम से आने के बाद भगवान के मित्र बने हैं उद्धव जी। ये बड़े ज्ञानी हैं।

वृष्णीनां प्रवरो मंत्री कृष्णस्य दयितः सखा ।

शिष्यो बृहस्पतेः साक्षाद् उद्धवो बुद्धिसत्तमः ॥

vrishninam pravaro mantra krishnasya dayitah sakha 

shishyo brihaspateh sakshad uddhavo buddhi-sattamah

 

उद्धवजी वृष्णिवंशियों में एक प्रधान पुरुष थे। वे साक्षात् ब्रहस्पतिजी के शिष्य और परम बुद्धिमान थे। उनकी महिमा के सम्बन्ध में इससे पढ़कर और कौन-सी बात कही जा सकती है कि वे भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे सखा तथा मन्त्री भी थे।

 

उद्धव चरित्र श्रीमद भागवत का बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है। प्रेम का दर्शन करवाता है उद्धव चरित्र। सूरदास जी महाराज ने भी उद्धव चरित्र का बहुत वर्णन किया है। आप दर्शन कीजिये।

 

भगवान ने सोचा की ये उद्धव परम ज्ञानी है लेकिन अगर इस पर भक्ति रूपी रंग चढ़ जाये तो ज्ञान रूपी चादर बहुत अच्छी सुशोभित होगी। भगवान सोचते हैं की तो क्या मैं इस उद्धव को भक्ति का उपदेश दूँ?

फिर भगवान सोचते हैं की नहीं-नहीं, भक्ति उपदेश देने से नहीं बल्कि भक्ति का क्रियात्मक(practical) रूप होना चाहिए। क्योंकि ज्ञान पुरुषार्थ(मेहनत) का फल है और भक्ति कृपासाध्य है। बिना भगवान की कृपा के भक्ति नहीं मिलती है।

भगवान ने सोचा की अगर कहीं भक्ति का दर्शन हो सकता है तो वह स्थान है वृन्दावन। मैं इस उद्धव को वृन्दावन भेजूंगा।

 

भगवान प्रतिदिन सुबह उठकर यमुना का स्नान करने के लिए जाते थे।  आज भगवान जब यमुना का स्नान करने के लिए गए तो यमुना जी, वृन्दावन से मथुरा बहती हुई आ रही है। भगवान ने यमुना में स्नान कर रहे थे तो एक कमल का फूल बहता हुआ आ रहा है । ये राधा रानी की प्रशादी थी। राधा रानी प्रतिदिन यमुना में भगवान के लिए फूल बहाती थी और फूल बहाते समय राधा जी के मन में ये बात आती थी की मेरे गोविन्द यमुना का स्नान करने के लिए आते होंगे और इस फूल को वो देखने तो उन्हें मेरी याद अवश्य आएगी।

आज भगवान ने उस फूल को सुंघा और यमुना में मूर्छित होने लगे। पास में खड़े थे उद्धव जी।  उद्धव जी ने जब ये देखा तो तुरंत दौड़कर गए और अपने हाथ का सहारा दिया भगवान को।  भगवान को महलों में लेकर आये हैं। भगवान जी की आँखों में आज आंसू हैं।  क्योंकि उद्धव जी ने भगवान को कभी रोते हुए नहीं देखा था।

उद्धव जी ने पूछा कृष्ण, आप भी किसी को याद करते हुए रोते हो क्या? भगवान उद्धव से कहते हैं-  उद्धव मोहे ब्रज बिसरत नाही। मैं अपने ब्रज को भूल नही पा रहा हूँ।

मैं एक क्षण के लिए भी ब्रज को भूल नहीं पा रहा हूँ। मैं अपनी माँ और पिता से कहकर आया था की मैं शीघ्र ही ब्रज आऊंगा।  लेकिन मैं जा नहीं सका।  मेरी गौएँ, मेरी गोपियाँ और मेरे ग्वाल बाल कितना स्मरण करते हैं।  ऐसा कहते हुए भगवान के आंसू गिर रहे हैं।  उद्धव ने भगवान ने आंसू पोंछे और कहा – ” मैं जानता हूँ आप बहुत राज-काज में फंसे हैं और आपके ऊपर बहुत राज भर है। आपका कोई सन्देश हो तो आप मुझे दीजिये। भगवान कहते हैं उद्धव, तू आज ही ब्रज जा।  और मेरे माता पिता से मेरा सन्देश देना-

 

उधो मैया ते जा कहियो, उधो मेरी मैया ते सुनइयो, Udho Maiya Te Jaa Kahiyo tero shyam dukh pave

तेरो श्याम दुःख पावे , उधो मैया ते जा कहियो ।।

उद्धव तू मेरी माँ से कहना की तेरा कृष्ण बहुत दुखी है तेरे बिना।

 

कोई ना ख्वावे मोहे माखन रोटी,
जल अचरान करावे।

माखन मिश्री नाम ना जानू,
कनुवा कही मोहे कोई ना पुकारे॥

उद्धव मेरी माँ से कहना की मुझे यहाँ खाने के लिए सब चीज मिल जाती है पर माखन रोटी कोई नही देता। और माँ जैसे तू मुझे कनुवा कहकर बुलाती थी ऐसे मुझे कोई नही बुलाता। कोई कृष्ण कहता है, कोई गोविन्द कहता है। पर मेरे कान तो कनुवा सुनने के लिए तरस रहे हैं माँ।

 

बाबा नन्द अंगुरिया गहि गहि,
पायन चलिबो सिखायो।

थको जान कन्हिया मेरो,
गोद उठावो और हिये सो लगावे॥

उद्धव जब मैं ब्रज में था तो मेरी माँ, मेरे नन्द बाबा मेरी ऊँगली पकड़कर चलना सीखते थे और जब में चलते-चलते थक जाता था, तो मेरे पिता मुझे उठाकर
छाती से लगा लेते थे।

 

आवे गोपिन देन उल्हानो नेक ना चित पे लावे,

और नहातउ बाल खसे जो मेरो बार बार कुल देवी मनावे।

मैं उन गोपियों के यहाँ माखन चोरी करने जाता तो गोपियाँ मेरी माँ से शिकायत करने आती थी। और कहती थी की ब्रजरानी यशोदा तेरा लाला चोर है। ये माखन चुरावे है और माखन का माखन खावे है और हमारी मटकी भी फोड़ देती देता है। लेकिन मेरी माँ उन पर यकीं नही करती थी।

स्नान करते वक्त मेरे सिर से एक बाल भी टूट जाता था तो मेरी माँ कहती थी हे देवी माँ! मेरे बालक की रक्षा करना। क्योंकि मेरे लाला का आज एक बाल टूट गया है।

उधो मेरी मैया ते जा कहियो, तेरो स्याम दुःख पावे।

 

गहर जन लाव उधो, आज ही जावो ब्रज,
आवत है याद गोप और गईया की।

उठती उर पीर, मन आवे नही धीर
होस करत अधीर, वासु वंसिवट छईया की।

उन्हें समझाइयो, आवेंगे दोउ भईया।
और जईयो नन्द रईया,

मेरो ले नाम उधो, कहिओ प्रणाम मेरी,
मईया के पायन में उधमी कन्हिया की॥

उद्धव मेरी माँ के चरणों में प्रणाम करके कहना की मैया, तेरे लाला ने तेरे चरणों में प्रणाम भेजी है।

 

और अंत में एक प्रार्थना मेरी राधा रानी से भी करना – 

हे वृषभानु सुते ललिते, मम कौन कियो अपराध तिहारो,
काढ दियो ब्रज मंडल ते, अब औरहु दंड दियो अति भारो।

सो कर ल्यो अपनों कर ल्यो, निकुंज कुटी यमुना तट प्यारो,
आप सों जान दया कि निधान, भई सो भई अब बेगी सम्हारो।

हे वृषभानु सुता, श्री राधा रानी! मुझसे ऐसा क्या अपराध हो गया की आपने मुझे इस ब्रज से ही निकाल दिया। हे मेरी किशोरी जी कुछ ऐसी कृपा करो की मेरा ब्रज में फिर से आना हो जाये।

 

उद्धव गोपियों मुझसे निष्काम प्रेम करती हैं। मैं उन गोपियों का परम प्रियतम हूँ। मेरे यहाँ चले आने से वे मुझे दूरस्थ मानती हैं और मेरा स्मरण करके अत्यन्त मोहित हो रही हैं, बार-बार मूर्छित हो जाती हैं। वे मेरे विरह की व्यथा से विह्वल हो रही हैं, प्रतिक्षण मेरे लिये उत्कण्ठित रहती हैं ।

 

मेरी गोपियाँ, मेरी प्रेयसियाँ इस समय बड़े ही कष्ट और यत्न से अपने प्राणों को किसी प्रकार रख रही हैं। मैंने उनसे कहा था कि ‘मैं आऊँगा।’ वही उनके जीवन का आधार है। उद्धव! और तो क्या कहूँ, मैं ही उनकी आत्मा हूँ। वे नित्य-निरन्तर मुझमें ही तन्मय रहती हैं’ ।

 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान श्रीकृष्ण ने यह बात कही, तब उद्धवजी बड़े आदर से अपने स्वामी का सन्देश लेकर रथ पर सवार हुए और नन्द गाँव के लिये चल पड़े ।

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8 thoughts on “Uddhav Charitra Story in hindi

  1. thanks for giving me this valuable information about love. ….sach me pyar sab kuch hai. ..agar pyar nahi. .to iss zindgi me aane ka koi matlab hi nahi. ..

    • Pyar karna hai to pyar radha shyam jesa, heer ranjhe jesa, gopi Krishna jesa, ho. Pyar esa ho ki ” jis pyare sang neh tis aage mar chaliye, dhrig jivan sansar ta ke pache jiwna” esa pyar to kewal apne guru se apne isht se ji ho sakta hai. Dhanya hai gopion ki bhakti

      • aapne bilkul thik baat kahi.. gopiyon ne, santon ne, bhakto ne sirf or sirf bhagwan se prem kiya hai… Jai Shri Krishna 🙏

  2. उद्धव चरित्र हृदय को पवित्र करने वाला है। उद्धव जी वृजगोपियों से प्रेंमाभक्ति में दीक्षित होकर मथुरा लौटे तभी श्रीकृष्ण को एक सहृदय मित्र मिला।श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा उद्धव मैने तुम्हें उसी पाठशाला में भेजा था जहाँ मैंने स्वयं प्रेम की शिक्षा ली थी। मैं स्वयं भी तुम्हें प्रेंमाभक्ति की ऐसी शिक्षा नहीं दे पाता।
    जै श्रीकृष्ण।

    • आपने बिल्कुल ठीक बात कही है। जिसे अपने जीवन में प्रेम को प्रकट करना है वो उद्धव चरित्र पढ़ ले एक बार। जय श्री कृष्णा।

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