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Syamantaka Mani story in hindi

Syamantaka Mani story in hindi

स्यमन्तक मणि की कहानी/कथा 

सत्राजित् भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था। उसकी भक्ति से खुश होकर सूर्यदेव उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान ने प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे स्यमन्तकमणि दी थी ।

 

सत्राजित् उस मणि को गले में धारण ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। वह मणि प्रतिदिन आठ भार(बीस तोले) सोना दिया करती थी। और जहाँ पर ये रहती थी वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीड़ा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक रोग तथा मायावियों का उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था ।

 

एक बार सत्राजित ने इस मणि को अपने गले में डाला और द्वारका में आया। अत्यन्त तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान न सके । इस मणि का बहुत तेज प्रकाश था सभी ने सोचा की सूर्य देव आ गए हैं। उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हें इस बात की सूचना दी। उस समय भगवान श्रीकृष्ण चौसर खेल रहे थे । लोगों ने कहा द्वारिकाधीश जी, साक्षात सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं ।

 

भगवान कृष्ण यह सुनकर हंसने लगे और कहते हैं- ‘अरे, ये सूर्यदेव नहीं है। यह तो सत्राजित् है, जो मणि के कारण इतना चमक रहा है । इसके बाद सत्राजित् अपने समृद्ध घर में चला आया।

 

एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा—‘सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो।’ क्योंकि ऐसी मणि तो जगत के कल्याण में बहुत लाभदायक सिद्ध होगी। सत्राजित ने सोचा की इस मणि को लेने की इच्छा तो खुद श्री कृष्ण की है और नाम उग्रसेन जी का ले रहे हैं।

 

एक बार सत्राजित के भाई प्रसेन ने उस मणि को अपने गले में पहना और घोड़े पर बैठकर जंगल में शिकार करने के लिए चला गया। वहां पर एक शेर ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया। वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि ऋक्षराज जाम्बवान् ने उसे मार डाला । उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर अपनी बेटी जाम्बवती को खेलने के लिये दे दी।

 

इधर जब प्रसेन घर नही लौटा तो उसके भाई सत्राजित् ने उसकी खोज करवाई। पता चला की प्रसेन की घोड़े सहित मौत हो गई है। ये कहने लगा – ‘बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो; क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।’ सत्राजित् की यह बात सुनकर लोग आपस में काना-फूसी करने लगे ।

Krishna Jhutha kalank lagna : कृष्ण पर झूठा कलंक लगना

भगवान श्री कृष्ण को जब इस बात का पता चला तो बोले हमने अच्छा भादो सुदी चौथ का चन्द्रमा देखा की मुझे झूठा कलंक लग गया। ऐसा कहते हैं कि एक बार, इस दिन भगवान श्री कृष्ण को गाय दुहते समय गाय के मूत्र में चांद दिख गया था। परिणामस्वरूप उन पर समयंतक मणि की चोरी का झूठा कलंक लगा। भगवान ने सोचा की जब मुझ पर ये झूठा कलंक लग ही गया है तो इस कलंक को धो डालते हैं।

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अब भगवान श्रीकृष्ण नगर के कुछ सभ्य पुरुषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूँढने के लिये वन में गये । वहां लोगों को और कृष्ण जी को पता चला की एक सिंह(शेर) ने प्रसेन और उसके घोड़े को मारा है। जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते हुए आगे बढे, तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर एक रीछ ने सिंह को भी मार डाला है ।

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