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Sukh Dukh kya hai : Shrimad Bhagwat Geeta

Sukh Dukh kya hai : Shrimad Bhagwat Geeta 

सुख दुःख क्या है? : श्रीमद भागवत गीता

 

अर्जुन कृष्ण से पूछता है कि हे केशव! हर प्राणी सुख की कामना करता है! दुःख की कामना कोई नहीं करता। वो कभी दुखी नहीं होता चाहता। इसलिए सुख की कामना करता रहता है। चाहे वो मनुष्य राजा हो या रंक हो। स्त्री हो या पुरुष हो।

कृष्ण कहते हैं – तुम ठीक कहते हो अर्जुन! कि सब सुख की कामना करते हैं। परन्तु सुख की परिभाषा हर एक व्यक्ति की प्रवृति और रूचि के अनुसार बदल जाती है।

एक साधु पुरुष को दूसरे को सुख देकर सुख मिलता है। दूसरे की सहायता करके वो खुश होता है।

और एक नीच प्रवृति वाला मनुष्य किसी को दुःख देकर सुखी होता है। दूसरा सुखी हो तो उसे दुःख होता है। इसके लिए सुख और दुःख की परिभाषा अपनी-अपनी प्रवृति और रूचि के अनुसार हर प्राणी के लिए अलग-अलग है। 

क्या किसी को स्थाई सुख प्राप्त होता है? : permanent Happiness Kaise milegi?

नहीं होता। ना सुख स्थाई है और ना दुःख स्थाई है।

अर्जुन पूछता है – हे केशव! क्या सुख स्थाई नहीं हो सकता?

कृष्ण कहते हैं – सुख स्थाई कैसे हो सकता है पार्थ! ये संसार तो परिवर्तनशील है। यहाँ हर क्षण परिवर्तन होता रहता है पार्थ। परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। यहाँ कोई भी वस्तु स्थाई नहीं होती। तुम्हे याद होगा, मैंने तुम्हे पहले ही बताया था कि हमारे शरीर की अवस्थाएं भी स्थिर नहीं है। फिर सुख और दुःख कैसे स्थाई हो सकता है।
अर्जुन बोला – इसका अर्थ है कि सुख के साथ-साथ मनुष्य को दुःख भी भोगना पड़ता है? Jeevan me Dukh Kyo aata hai 

कृष्ण कहते हैं – हाँ पार्थ! सुख और दुःख एक ही चक्र के दो अर्धभागों की भांति है। ये चक्र चलता रहता है, चलता रहता है। कभी प्राणी सुख में हँसता है, वही प्राणी दुःख में रोता और बिलखता है परन्तु काल चक्र कभी नहीं रुकता। सुख-दुःख का ये चक्र चलता ही रहता है और मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख लगातार आते-जाते रहते हैं। न चक्र ठहरता है, न ही सुख या दुःख मनुष्य के जीवन में ठहर पाते हैं। यदि सुख आया तो वो सदा नहीं रहेगा और यदि दुःख आया तो वो भी सदा नहीं रह पायेगा। इसलिए हे पार्थ! अनाशक्ति योग के द्वारा कामनाओं पर विजय पाना अति आवश्यक है। क्योंकि कामनाओं की पूर्ति होकर भी कभी नहीं होती। मनुष्य बूढ़ा हो जाता है परन्तु आशक्ति जनित कामनाएं कभी बूढी नहीं होती, कभी बूढी नहीं होती।
पार्थ! एक कामना अनेक कामनाओं को जन्म देती है। हर कामना के साथ मनुष्य की तृष्णा भी बढ़ जाती है और तृष्णा के साथ असंतोष भी बढ़ता जाता है। फिर ऐसे असंतुष्ट मनुष्य को, जो कामनाओं से ग्रस्त है उसे उचित-अनुचित का विवेक नहीं रहता। पार्थ! इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम अपनी कामनों का त्याग करके स्थित प्रज्ञ बनो। स्थित प्रज्ञ कर्मयोग की चरम अवस्था है।

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