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Sthitpragya | Shrimad Bhagavad Gita

Sthitpragya | Shrimad Bhagavad Gita

स्थितप्रज्ञ | श्रीमद भगवद गीता

 

श्रीमद भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण जी अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि

 

पार्थ, तुम भी आत्मिक योगबल के द्वारा अपनी अंतरात्मा में झांककर परमात्मा को देखने के प्रयास करो। समबुद्धि कर्मयोग का आचरण करो और स्थितप्रज्ञ(Sthitpragya) बन जाओ।

अर्जुन पूछते है – हे मधुसूदन! ये स्थितप्रज्ञ क्या होता है(Sthitpragya kya hota hai) ? इसे समझाओ!
कृष्ण कहते हैं – पार्थ! दुःख भोगते हुए भी जिसके मन में उद्वेग नहीं होता और ना ही जो सुख की लालसा रखता है तथा जिसके ह्रदय में क्रोध, मोह, भय आदमी विकारों के लिए कोई स्थान नहीं होता। वो मनुष्य स्थित प्रज्ञ है।

 

दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: । वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
अर्थ :- दु:खों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है।

अर्जुन बोला – समझाकर मुझको कहो, हे केशव सर्वज्ञ
भाषण आसन चलन में, कैसा है स्थितप्रज्ञ

 

कृष्ण बोले-

पूर्ण मनोकाममायें मन से जो तज डालें, रहे संतुष्ट सदा आत्म विलास में,
दुःख के आने पर जो विचलित न हो कदापि, नहीं कोई स्पृहा सुख सुमन सुवास में,
राग है न द्वेष जहाँ, मोह, नेह शेष नहीं, लेश मात्र अस्थिरता जिसके आभास में,
शुभ से प्रसन्न हो, न अशुभ से जो भय माने, ऐसा स्थितप्रज्ञरा में योग रसरास में।

 

हे पार्थ! स्थितप्रज्ञ(Sthitpragya) महापुरुष सुख दुःख, प्रत्येक अवस्था में आत्मिक शांति प्राप्त कर लेता है। परम आनंद में लीन होने से ऐसे मनुष्य को सुख-दुःख कभी विचलित नहीं करते। ऐसे स्थित प्रज्ञ मनुष्य का मन उस दीये की भांति होता है जिसकी लौ स्थिर होती है, कभी डोलती नहीं।

अर्जुन पूछते हैं – हे कृष्ण! तुम कहते हो स्थितप्रज्ञ(Sthitpragya) बनने के लिए मन के दीये की ज्योत को स्थिर रखो अर्थात मन को इधर-उधर डोलने न दो, इसका अर्थ ये हुआ कि कर्म करते समय बुद्धि की बात मानो, मन को बुद्धि के अधीन रखो, यही ना?

कृष्ण कहते हैं- नहीं अर्जुन! केवल बुद्धि पर भरोसा करने में भी खतरा है इसलिए कि विनाशकाल आने पर तो मनुष्य की बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है। अर्थात जब विपरीत समय आता है तो मनुष्य की अपनी बुद्धि ही उसे गलत रास्ते पर ले जाती है।
अर्जुन पूछता है- हे मधुसूदन! मनुष्य न तो अपने मन की इच्छानुसार कर्म करे, न ही बुद्धि की सलाह माने! तो फिर मनुष्य बिचारा करे तो क्या करे? ऐसी स्थिति में अपनी प्रवृति के विरुद्ध कोई कैसे जीवन व्यतीत करेगा?

 

हे मदुसूदन! मुक्ति और मोक्ष का रास्ता अपनाने के लिए कोई मनुष्य अपनी प्रवृति कैसे बदल सकता है? इसका कोई तरीका मुझे बताओ?

 

कहते जवाब देते हैं- प्रवृति को बदलने से पहले ये जान लेना आवश्यक है कि प्रवृति कैसे बनती है? हे अर्जुन! मनुष्य जन्म से ही अपने साथ सत्व, रज और तम, तीन गुणों को लेकर पैदा होता है। इस सृष्टि की रचना इन्हीं तीन गुणों के आधार पर की गई है। इस त्रिगुणात्मक सृष्टि में, रहने वाले समस्त प्राणियों में तीनों गुण विद्यमान होते हैं परन्तु हर प्राणी के अंदर इन तीनों में से कोई न कोई एक गुण अधिक प्रधान होता है और जिस गुण की प्रधानता अधिक होती है उस प्राणी का चरित्र वैसा ही बन जाता है।

रजोगुण प्रधान पुरुष को ऐश्वर्य, ठाठ-बाठ और राज-पाठ की लालसा होती है।

तमोगुण वाला आलसी और प्रमादी होती है। द्वेष और क्रोध जैसी नकारात्मक भावनाएं उसमें कूट-कूट कर भरी हुई होती हैं।

सतोगुण ही उत्तम गुण है। सात्विक मनुष्य सीधा और सच्चा होता है। वैसे तो हर मनुष्य के स्वभाव में तीनों गुण कुछ न कुछ मात्रा में होते हैं परन्तु जिस मनुष्य में जो गुण प्रधान होता है वो वैसा ही हो जाता है। उसकी जैसी प्रवृति होती है वैसी ही रूचि हो जाती है। सो हर मनुष्य अपनी प्रवृति और रूचि के अनुसार ही कामना करता है।

सर्व कामनाओं को सर्वधा जो तज डाले, जगत में रहे मुख जगत से मोड़ के,
शांति करे प्राप्त, विचरण करें शांति से, ममता से, स्नेह से, नेह से नाता तोड़ के।
अर्जुन ऐसा योगी मोहित ना होता कभी, नैया ना डुबोता पतवार कहीं छोड़ के,
अंतकाल आने पर ऐसा स्थितप्रज्ञ(Sthitpragya) योगी होता ब्रह्म लीन नाता ईश्वर से जोड़ के।

अर्जुन पूछता है – हे केशव! तुम कहते हो हर प्राणी अपनी-अपनी प्रवृति के अनुसार अलग-अलग कामना करता है। परन्तु मेरे विचार में प्राणी ने चाहे कोई भी गुण प्रधान हो, उसकी कैसी भी प्रवृति हो, फिर भी हर प्राणी एक ही तरह की कामना करता है।
अर्थात हर प्राणी सुख की कामना करता है! दुःख की कामना कोई नहीं करता। वो कभी दुखी नहीं होता चाहता। इसलिए सुख की कामना करता रहता है। चाहे वो मनुष्य राजा हो या रंक हो। स्त्री हो या पुरुष हो।

 

कृष्ण कहते हैं – तुम ठीक कहते हो अर्जुन! कि सब सुख की कामना करते हैं। परन्तु सुख की परिभाषा हर एक व्यक्ति की प्रवृति और रूचि के अनुसार बदल जाती है।

एक साधु पुरुष को दूसरे को सुख देकर सुख मिलता है। दूसरे की सहायता करके वो खुश होता है।

और एक नीच प्रवृति वाला मनुष्य किसी को दुःख देकर सुखी होता है। दूसरा सुखी हो तो उसे दुःख होता है। इसके लिए सुख और दुःख की परिभाषा अपनी-अपनी प्रवृति और रूचि के अनुसार हर प्राणी के लिए अलग-अलग है। वैसे भी क्या किसी को स्थाई सुख प्राप्त होता है?
नहीं होता।

ना सुख स्थाई है और ना दुःख स्थाई है।

अर्जुन पूछता है – हे केशव! क्या सुख स्थाई नहीं हो सकता?

कृष्ण कहते हैं – सुख स्थाई कैसे हो सकता है पार्थ! ये संसार तो परिवर्तनशील है। यहाँ हर क्षण परिवर्तन होता रहता है पार्थ। परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। यहाँ कोई भी वस्तु स्थाई नहीं होती। तुम्हे याद होगा, मैंने तुम्हे पहले ही बताया था कि हमारे शरीर की अवस्थाएं भी स्थिर नहीं है। फिर सुख और दुःख कैसे स्थाई हो सकता है।

अर्जुन बोला – इसका अर्थ है कि सुख के साथ-साथ मनुष्य को दुःख भी भोगना पड़ता है?

कृष्ण कहते हैं – हाँ पार्थ! सुख और दुःख एक ही चक्र के दो अर्धभागों की भांति है। ये चक्र चलता रहता है, चलता रहता है। कभी प्राणी सुख में हँसता है, वही प्राणी दुःख में रोता और बिलखता है परन्तु काल चक्र कभी नहीं रुकता। सुख-दुःख का ये चक्र चलता ही रहता है और मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख लगातार आते-जाते रहते हैं। न चक्र ठहरता है, न ही सुख या दुःख मनुष्य के जीवन में ठहर पाते हैं। यदि सुख आया तो वो सदा नहीं रहेगा और यदि दुःख आया तो वो भी सदा नहीं रह पायेगा। इसलिए हे पार्थ! अनाशक्ति योग के द्वारा कामनाओं पर विजय पाना अति आवश्यक है। क्योंकि कामनाओं की पूर्ति होकर भी कभी नहीं होती। मनुष्य बूढ़ा हो जाता है परन्तु आशक्ति जनित कामनाएं कभी बूढी नहीं होती, कभी बूढी नहीं होती।

पार्थ! एक कामना अनेक कामनाओं को जन्म देती है। हर कामना के साथ मनुष्य की तृष्णा भी बढ़ जाती है और तृष्णा के साथ असंतोष भी बढ़ता जाता है। फिर ऐसे असंतुष्ट मनुष्य को, जो कामनाओं से ग्रस्त है उसे उचित-अनुचित का विवेक नहीं रहता। पार्थ! इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम अपनी कामनों का त्याग करके स्थित प्रज्ञ बनो। स्थितप्रज्ञ कर्मयोग की चरम अवस्था है।

 

अर्जुन कहता है – हे मधुसूदन! तुम तो कहते हो कामनाओं का त्याग करके स्थितप्रज्ञ बन जाओ। परन्तु स्थितप्रज्ञ बनने के लिए सबसे आवश्यक क्या है?
कृष्ण कहते हैं – स्थिर बुद्धि।

 

अर्जुन पूछता है – परन्तु मनुष्य अपनी बुद्धि को स्थिर कैसे रख सकता है?
कृष्ण बोले – आशा और निराशा दोनों से मुक्त होकर ही बुद्धि को स्थिर किया जा सकता है। बुद्धि स्थिर होगी तो इन्द्रियों के विषयों का बल टूट जायेगा।

 

अर्जुन पूछता है – यदि कोई किसी इन्द्रिय को ही काटकर फेंक दें तो क्या उस इन्द्रिय का विषय नष्ट हो जायेगा?
कृष्ण कहते हैं – नहीं अर्जुन! यदि किसी दुर्घटनावश किसी की आँखे अंधी हो जाएँ तो ये आवश्यक नहीं कि उसकी आँखें रूप की कल्पना करना ही छोड़ दें। आँखें ना होने पर भी उसका मन ऐसे दृश्यों की कल्पना कर सकता है जो उसे विषयों के मोह में फसाये चले जाये। पार्थ! एक अँधा मनुष्य भगवान के स्वरूप की भी कल्पना कर सकता है और एक नारी के शरीर की भी कल्पना कर सकता है। सो किसी इन्द्रिय के होने, न होने से मन की वासना और आशक्ति पर फर्क नहीं पड़ता।

हे अर्जुन! तुम यूँ समझो कि जैसे कोई मनुष्य आँखें बंद करके ये प्रदर्शन कर रहा है कि वो भगवान का ध्यान लगाए बैठा है परन्तु वो वास्तव में उसके मन की आँखों में भगवान की मूरत नहीं, अपनी प्रेमिका का शरीर घूम रहा है। इसका अर्थ है कि उसकी आँखें तो बंद है परन्तु आँखों के विषय उसे फिर भी भ्रमित कर रहे हैं।

हे अर्जुन कई लोग अपनी इन्द्रियों पर बड़ी कठोरता से निग्रह करने के लिए बड़े कठिन व्रत, उपवास रखते हैं। कई-कई दिनों तक खाना पीना छोड़ देते हैं। फिर भी यदि उनका मन भांति-भांति के स्वादिष्ट भोजनों की वासना में ही अटका रहे तो हट के द्वारा किये हुए इस व्रत उपवास का क्या लाभ है?
ऐसे लोग हठ के द्वारा अपनी इन्दिर्यों को सुखाकर निर्बल तो कर देते हैं परन्तु इससे विषयों की आशक्ति का त्याग नहीं हो सकता।

याद रखो! विषयों से अधिक खतरनाक है विषयों की आशक्ति और विषयों की आशक्ति का त्याग केवल इन्द्रियों के निग्रह से नहीं हो सकता। आशक्ति का त्याग केवल मन के निग्रह से होता है। जब मन निराशक्त हो जाये तो इन्द्रियां अपने-अपने विषयों को भोगती हुई भी इन विषयों से निराशक्त रहती है। जैसे कमल का फूल पानी के अंदर रहते हुए भी सूखा ही रहता है। जल की एक बून्द भी उसके पत्ते पर नहीं ठहर सकती। इसलिए मैंने कहा है कि पहले ज्ञान के द्वारा बुद्धि को स्थिर करो। बुद्धि मन को स्थिरता देगी, फिर मन इन्दिर्यों को इस प्रकार विषयों से खींच लेगा जिस प्रकार एक कछुआ खतरे की जरा सी आहट पाते ही अपने अंगों को अपने भीतर समेट लेता है।

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