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Shishupal and Krishna story in hindi

Shishupal and Krishna story in hindi

शिशुपाल और कृष्ण की कहानी/कथा 

भगवान श्रीकृष्ण भीम के द्वाराजरासन्ध का वध करवाकर भीमसेन और अर्जुन के साथ जरासन्धनन्दन सहदेव से सम्मानित होकर इन्द्रप्रस्थ के लिये चले। उन विजयी वीरों ने इन्द्रप्रस्थ के पास पहुँचकर अपने-अपने शंख बजाये, जिससे उनके इष्टिमित्रों को सुख और शत्रुओं को बड़ा दुःख हुआ । इन्द्रप्रस्थनिवासियों का मन उस शंखध्वनि को सुनकर खिल उठा। उन्होंने समझ लिया कि जरासन्ध मर गया और अब राजा युद्धिष्ठिर का राजसूय-यज्ञ करने का संकल्प एक प्रकार से पूरा हो गया। भीम, अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर की वन्दना की और वह सब कह सुनाया, जो उन्हें जरासन्ध के वध के लिये करना पड़ा था।

 

धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण के इस परम अनुग्रह की बात सुनकर प्रेम से भर गये, उनके नेत्रों से आनन्द के आँसुओं की बूँदें टपकने लगीं और वे उनसे कुछ भी कह न सके।

 

धर्मराज युधिष्ठिर जरासन्ध का वध और सर्वशक्तिमान् भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत महिमा सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और उनसे बोले- अनन्त! हम लोग हैं तो अत्यन्त दीन, परन्तु मानते हैं हैं अपने को भूपति और नरपति। ऐसी स्थिति में हैं तो हम दण्ड के पात्र, परन्तु आप हमारी आज्ञा स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं। सर्वशक्तिमान् कमलनयन भगवान के लिये यह मनुष्य-लीला का अभिनयमात्र है । जैसे उदय अथवा अस्त के कारण सूर्य के तेज में घटती या बढ़ती नहीं होती, वैसे ही किसी भी प्रकार के कर्मों से न तो आपका उल्लास होता है और न हो ह्रास ही।

किसी से पराजित न होने वाले माधव! ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है तथा यह तू है और यह तेरा’—इस प्रकार की विकारयुक्त भेदबुद्धि तो पशुओं की होती है। जो आपके अनन्य भक्त हैं, उनके चित्त में ऐसे पागलपन के विचार कभी नहीं आते। फिर आपमें तो होंगे ही कहाँ से ? (इसलिये आप जो कुछ कर रहे हैं, वह लीला-ही-लीला है) ।

 

इस प्रकार कहकर धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण की अनुमति से यज्ञ के योग्य समय आने पर यज्ञ के कर्मों में निपुण वेदवादी ब्राम्हणों को ऋत्विज्, आचार्य आदि के रूप में वरण किया ।

 

उनके नाम ये हैं—श्रीकृष्णाद्वैपायन व्यासदेव, भरद्वाज, सुमन्तु, गौतम, असित, वसिष्ठ, च्यवन, कण्व, मैत्रेय, कवष, त्रित, विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिनी, क्रतु, पैल, पराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, परशुराम, शुक्राचार्य, आसुरी, वीतिहोत्र, मधुच्छन्दा, वीरसेन और अकृतव्रण ।

 

इसके अतिरिक्त धर्मराज ने द्रोणाचार्य, भीष्मपितामह, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र और उनके दुर्योधन आदि पुत्रों और महामति विदुर आदि को भी बुलवाया। राजसूय-यज्ञ का दर्शन करने के लिये देश के सब राजा, उनके मन्त्री तथा कर्मचारी, ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सब-के-सब वहाँ आये ।

 

इसके बाद ऋत्विज् ब्राम्हणों ने सोने के हलों से यज्ञभूमि को जुतवाकर राजा युद्धिष्ठिर को शास्त्रानुसार यज्ञ की दीक्षा दी। पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ में निमन्त्रण पाकर ब्रम्हाजी, शंकरजी, इन्द्रादि लोकपाल, अपने गणों के साथ सिद्ध और गन्धर्व, विद्याधर, नाग, मुनि, यक्ष, राक्षस, पक्षी, किन्नर, चारण, बड़े-बड़े राजा और रानियाँ—ये सभी उपस्थित हुए ।

 

सबने बिना किसी प्रकार के कौतूहल के यह बात मान ली कि राजसूय-यज्ञ करना युधिष्ठिर के योग्य ही है।

 

अब सभी सभासदो के मन में प्रश्न आया की सबसे पहले पूजा किनकी की जाये? लेकिन जितनी मति, उतने मत। इसलिये सर्वसम्मति से कोई निर्णय न हो सका।

 

ऐसी स्थिति में सहदेव ने कहा— यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ही सदस्यों में सर्वश्रेष्ठ और अग्रपूजा के पात्र हैं; क्योंकि यही समस्त देवताओं के रूप में हैं; और देश, काल, धन आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सबके रूप में भी ये ही हैं । यह सारा विश्व श्रीकृष्ण का ही रूप है। समस्त यज्ञ भी श्रीकृष्णस्वरुप ही हैं। सहदेव भगवान की महिमा और उनके प्रभाव को जानते थे। इतना कहकर वे चुप हो गये।उस समय धर्मराज युधिष्ठिर की यज्ञसभा में जितने सत्पुरुष उपस्थित थे, सबने एक स्वर से ‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ कहकर सहदेव की बात का समर्थन किया ।

 

 

धर्मराज युधिष्ठिर ने ब्राम्हणों की यह आज्ञा सुनकर तथा सभासदों का अभिप्राय जानकर बड़े आनन्द से प्रेमोद्रेक से विह्वल होकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की। अपनी पत्नी, भाई, मन्त्री और कुटुम्बियों के साथ धर्मराज युधिष्ठिर ने बड़े प्रेम और आनन्द से भगवान के पाँव पखारे तथा उनके चरणकमलों का लोकपावन जल अपने सिर पर धारण किया । उन्होंने भगवान को पीले-पीले रेशमी वस्त्र और बहुमूल्य आभूषण समर्पित किये। उस समय उनके नेत्र प्रेम और आनन्द के आँसुओं से इस प्रकार भर गये कि वे भगवान को भलीभाँति देख भी नहीं सकते थे । यज्ञसभा में उपस्थित सभी लोग भगवान श्रीकृष्ण को इस प्रकार पूजित, सत्कृत देखकर हाथ जोड़े हुए ‘नमो नमः ! जय जय !’ इस प्रकार के नारे लगाकर उन्हें नमस्कार करने लगे। उस समय आकाश से स्वयं ही पुष्पों की वर्षा होने लगी।

 
लेकिन शिशुपाल से ये सब देखा नही गया। कहता है की आप लोग बालक सहदेव की यह बात ठीक न मानें कि ‘कृष्ण ही अग्रपूजा के योग्य हैं । यहाँ बड़े-बड़े तपस्वी, विद्वान, व्रतधारी, ज्ञान के द्वारा अपने समस्त पाप-तापों को शान्त करने वाले, परम ज्ञानी परमर्षि, ब्रम्हनिष्ठ आदि उपस्थित हैं—जिनकी पूजा बड़े-बड़े लोकपाल भी करते हैं । यज्ञ की भूल-चूक बतलाने वाले उन सदसस्पतियों को छोड़कर यह कुलकलंक ग्वाला भला, अग्रपूजा का अधिकारी कैसे हो सकता है ? क्या कौआ कभी यज्ञ के पुरोडाश का अधिकारी हो सकता है ?।

 

 

न इसका कोई वर्ण है और न तो आश्रम। कुल भी इसका ऊँचा नहीं है। सारे धर्मों से यह बाहर है। वेद और लोकमर्यादाओं का उल्लंघन करके मनमाना आचरण करता है। इसमें कोई गुण भी नहीं है। ऐसी स्थिति में यह अग्रपूजा पात्र कैसे हो सकता है ?। आप लोग जानते हैं कि राजा ययाति ने इसके वंश को शाप दे रखा है। इसलिये सत्पुरुषों ने इस वंश का ही बहिष्कार कर दिया है। ये सर्वदा व्यर्थ मधुपान में आसक्त रहते हैं। फिर ये अग्रपूजा के योग्य कैसे हो सकते हैं ? इन सबने ब्रम्हर्षियों के द्वारा सेवित मथुरा आदि देशों का परित्याग कर दिया और ब्रम्हवर्चस् के विरोधी (वेदचर्चा रहित) समुद्र में किला बनाकर रहने लगे। वहाँ से जब ये बाहर निकलते हैं तो डाकुओं की तरह सारी प्रजा को सताते हैं’ परीक्षित्! सच पूछो तो शिशुपाल का सारा शुभ नष्ट हो चुका था। इसी से उसने और भी बहुत-सी कड़ी-कड़ी बातें भगवान श्रीकृष्ण को सुनायीं। परन्तु जैसे सिंह कभी सियार की ‘हुआँ-हुआँ’ पर ध्यान नहीं देता, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण चुप रहे, उन्होंने उसकी बातों का कुछ भी उत्तर न दिया। परन्तु सभासदों के लिये भगवान की निन्दा सुनना असह्य था। उसमें से कई अपने-अपने कान बंद करके क्रोध से शिशुपाल को गाली देते हुए बाहर चले गये।

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