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Pondrak-Vasudev Shri krishna story in hindi

Pondrak-Vasudev Shri Krishna story in hindi

पौण्ड्रक-वासुदेव श्री कृष्ण की कहानी/कथा

जब बलरामजी व्रज गए हुए थे तब पीछे से करुष देश के अज्ञानी राजा पौण्ड्रक ने भगवान श्रीकृष्ण के पास एक दूत भेजकर यह कहलाया कि ‘भगवान वासुदेव मैं हूँ’। मूर्ख लोग उसे बहकाया करते थे कि ‘आप ही भगवान वासुदेव हैं और जगत् की रक्षा के लिये पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं।’ इसका फल यह हुआ कि वह मूर्ख अपने को ही भगवान मान बैठा ।

 

पौण्ड्रक का दूत द्वारका आया और राजसभा में बैठे हुए कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण को उसने अपने राजा का यह सन्देश कह सुनाया – ‘एकमात्र मैं ही वासुदेव हूँ। दूसरा कोई नहीं है। प्राणियों पर कृपा करने के लिये मैंने ही अवतार ग्रहण किया है। तुमने झूठ-मूठ अपना नाम वासुदेव रख लिया है, अब उसे छोड़ दो । यदुवंशी! तुमने मुर्खता वश मेरे चिन्ह धारण कर रखे हैं। उन्हें छोड़कर मेरी शरण में आओ और यदि मेरी बात तुम्हें स्वीकार न हो, तो मुझसे युद्ध करो’।

 
पौण्ड्रक की यह बात सुनकर उग्रसेन आदि सभासद् जोर-जोर से हँसने लगे। उनकी हंसी समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने दूत से कहा—‘तुम जाकर अपने राजा से कह देना कि ‘रे मूढ़! मैं अपने चक्र आदि चिन्ह यों नहीं छोडूँगा। इन्हें मैं तुझ पर छोडूँगा और केवल तुझ पर ही नहीं, तेरे उन सब साथियों पर भी, जिनके बहकाने से तू इस प्रकार बहक रहा है। उस समय मूर्ख! तू अपना मुँह छिपाकर—औंधें मुँह गिरकर चील, गीध, बटेर आदि मांसभोजी पक्षियों से घिरकर सो जायगा और तू मेरा शरणदाता नहीं, उन कुत्तों की शरण होगा, जो तेरा मांस चींथ-चींथ खा जायँगे’।

 

भगवान का यह तिरस्कार पूर्ण संवाद लेकर पौण्ड्रक का दूत अपने स्वामी के पास आया और उसे कह सुनाया। इधर भगवान श्रीकृष्ण ने भी रथ पर सवार होकर काशी पर चढ़ाई कर दी। (क्योंकि वह करुष का राजा उन दिनों वहीँ अपने मित्र काशिराज के पास रहता था) ।

 
भगवान श्रीकृष्ण के आक्रमण का समाचार पाकर महारथी पौण्ड्रक भी दो अक्षौहिणी सेना के साथ शीघ्र ही नगर से बाहर निकल आया । काशी का राजा पौण्ड्रक का मित्र था। इसलिए वह भी उसकी सहायता करने के लिये तीन अक्षौहिणी सेना के साथ उसके पीछे-पीछे आया। अब भगवान श्रीकृष्ण ने पौण्ड्रक को देखा। पौण्ड्रक ने भी शंख, चक्र, तलवार, गदा, शारंग धनुष और श्रीवत्सं चिन्ह आदि धारण कर रखे थे। उसके वक्षःस्थल पर बनावटी कौस्तुभमणि और वनमाला लटक रही थी । बिलकुल भगवान श्री कृष्ण के जैसा रूप पौण्ड्रक ने बनाया हुआ था। उसका यह सारा-का-सारा वेष बनावटी था, मानो कोई अभिनेता रंगमंच पर अभिनय करने के लिये आया हो। उसका रूप देखकर भगवान श्री कृष्ण हंसने लगे।

पौण्ड्रक वध कथा : Pondrak Vadh Story  

फिर भगवान श्री कृष्ण और शत्रु सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अब भगवान श्रीकृष्ण ने पौण्ड्रक से कहा—‘रे पौण्ड्रक! तूने दूत के द्वारा कहलाया था कि मेरे चिन्ह अस्त्र-शास्त्रादि छोड़ दो। सो अब मैं उन्हें तुझ पर छोड़ रहा हूँ । तूने झूठ-मुठ मेरा नाम रख लिया है। अतः मूर्ख! अब मैं तुझसे उन नामों को भी छुड़ाकर रहूँगा। रही तेरे शरण में आने की बात; सो यदि मैं तुझसे युद्ध न कर सकूँगा तो तेरी शरण ग्रहण करूँगा’। भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार पौण्ड्रक का तिरस्कार करके अपने तीखे बाणों से उसके रथ को तोड़-फोड़ डाला और चक्र से उसका सिर वैसे ही उतार लिया, जैसे इन्द्र ने अपने वज्र से पहाड़ की चोटियों को उड़ा दिया था ।

 

इसी प्रकार भगवान ने अपने बाणों से काशिनरेश का सिर भी धड़ से ऊपर उड़ाकर काशीपुरी में गिरा दिया, जैसे वायु कमल का पुष्प गिरा देती है । इस प्रकार अपने साथ डाह रखने वाले पौण्ड्रक को और उसके सखा काशिनरेश को मारकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी राजधानी द्वारका में लौट आये। लेकिन भगवान ने इस पौण्ड्रक हो भी सारुप्य भक्ति प्रदान की।
इधर काशी में राजमहल के दरवाजे पर एक कुण्डल-मण्डित मुण्ड गिरा देखकर लोग तरह-तरह का सन्देह करने लगे और सोचने लगे कि ‘यह क्या है, यह किसका सिर है ?’
जब यह मालूम हुआ कि वह तो काशिनरेश का ही सिर है, तब रानियाँ, राजकुमार, राजपरिवार के लोग तथा नागरिक रोने धोने लगे और कहते हैं – हाय-हाय! हमारा तो सर्वनाश हो गया’।

 

काशिनरेश का पुत्र था सुदक्षिण। उसने अपने पिता का अंतिम संस्कार करके मन-ही-मन यह निश्चय किया कि अपने पितृघाती को मारकर ही मैं पिता के ऋण से उऋण हो सकूँगा। और उसने विद्वानों से सलाह करके भगवान शंकर की पूजा अर्चना करनी शुरू कर दी। काशी नगरी में उसकी आराधना से खुश होकर भगवान शंकर ने वर देने को कहा।

 

सुदक्षिण ने यह वर माँगा कि मुझे मेरे पितृघाती के वध का उपाय बतलाइये।
भगवान शंकर ने कहा—‘तुम ब्राम्हणों के साथ मिलकर यज्ञ के देवता ऋत्विग्भूत दक्षिणाग्नि की अभिचार विधि से आराधना करो। इससे वह अग्नि प्रमथगणों के साथ प्रकट होकर यदि ब्राम्हणों के अभक्तपर प्रयोग करोगे तो वह तुम्हारा संकल्प सिद्ध करेगा।’ भगवान शंकर की ऐसी आज्ञा प्राप्त करके सुदक्षिण ने अनुष्ठान के उपयुक्त नियम ग्रहण किये और वह भगवान श्रीकृष्ण के लिये अभिचार (मारण का पुरश्चरण) करने लगा । अभिचार पूर्ण होते ही यज्ञकुण्ड से अति भीषण अग्नि मुर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसके केश और दाढ़ी-मूँछें तपे हुए ताँबे के समान लाल-लाल थे। आँखों से अंगारे बरस रहे थे। उसका बहुत ही भीषण रूप था और हाथों में त्रिशूल लिये हुए था, जिसे वह बार-बार घुमाता जाता था और उसमें से अग्नि की लपटें निकल रही थीं। वह द्वारिका के पास जा पहुंचा। उसके साथ बहुत-से भूत भी थे । उस अभिचार की आग को बिलकुल पास आयी हुई देख द्वारकावासी डर गए और भगवान श्री कृष्ण के पास पहुंचे। भगवान उस समय सभा में चौसर खेल रहे थे। उन सभी लोगों ने भगवान से रक्षा करने की प्रार्थना की। उनकी करुण पुकार सुनकर भगवान ने कहा- डरो मत, मैं तुम लोगों की रक्षा करूँगा’।

 

भगवान जान गए की यह काशी से चली हुई माहेश्वरी कृत्या है। और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र को आज्ञा दी। सुदर्शनचक्र कोटि-कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी और प्रलयकालीन अग्नि के समान जाज्वल्यमान है। उसने अभिचार-अग्नि को कुचल डाला । भगवान श्रीकृष्ण के अस्त्र सुदर्शनचक्र की शक्ति से कृत्यारूप आग का मुँह टूट-फूट गया, उसका तेज नष्ट हो गया, शक्ति कुण्ठित हो गयी और वह वहाँ से लौटकर काशी आ गयी तथा उसने ऋत्विज् आचार्यों के साथ सुदक्षिण को जलाकर भस्म कर दिया। इस प्रकार उसका अभिचार उसी के विनाश का कारण हुआ । कृत्या के पीछे-पीछे सुदर्शनचक्र भी काशी पहुँचा। काशी बड़ी विशाल नगरी थी। वह बड़ी-बड़ी अटारियों, सभा भवन, बाजार, नगरद्वार, द्वारों के शिखर, चहारदीवारियों, खजाने, हाथी, घोड़े, रथ और अन्नों के गोदाम से सुसज्जित थी। भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शनचक्र ने सारी काशी को जलाकर भस्म कर दिया और फिर वह परमानन्दमयी लीला करने वाले भगवान श्रीकृष्ण के पास लौट आया ।

 

जो मनुष्य भगवान श्रीकृष्ण के इस चरित्र को एकाग्रता के साथ सुनता या सुनाता है, वह सारे पापों से छूट जाता है ।

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