Narad ji Ka Kans ke Pass jana

Narad ji Ka Kans ke Pass jana 

नारद जी का कंस के पास जाना 

भगवान श्री कृष्ण ने अरिष्टासुर का वध किया है। अब भगवान यहाँ से मथुरा लीला प्रारम्भ करना चाहते है। भगवान के मन है नारद जी। भगवान नारद जी को संकेत करते है।

 

नारद जी मथुरा में कंस के पास जाते हैं और पूछते हैं- कंस, देवकी के पुत्रों का क्या हुआ?

 

कंस कहता है – देवकी के 6 बालकों का मैंने वध कर दिया। और सातवां देवकी का गर्भ नष्ट हो गया। आठवीं वसुदेव को कन्या हुई थी वो भी परलोक चली गई थी।

 

नारद जी कहते हैं – ‘कंस! जो कन्या तुम्हारे हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी, वह तो यशोदा की पुत्री थी। और व्रज में जो श्रीकृष्ण हैं, वे देवकी के पुत्र हैं। वहाँ जो बलरामजी हैं, वे रोहिणी के पुत्र हैं। वसुदेव ने तुमसे डरकर अपने मित्र नन्द के पास उन दोनों को रख दिया है। उन्होंने ही तुम्हारे अनुचर दैत्यों का वध किया है।’

 
यह बात सुनते ही कंस क्रोध से भड़क गया। और वसुदेव को मरने के लिए अपनी तलवार निकाल ली। लेकिन नारद जी ने रोक दिया।

नारद जी कहते है- कंस! वसुदेव ने तेरा कुछ नही बिगाड़ा है अगर तुझे मारना ही है तो कृष्ण और बलराम को मार। और नारद जी ये कहकर यहाँ से चले गए।

 

जब कंस को यह मालूम हो गया कि वसुदेव के लड़के ही हमारी मृत्यु के कारण हैं, तब उसने देवकी और वसुदेव दोनों ही पति-पत्नी को हथकड़ी और बेड़ी से जकड़कर फिर जेल में डाल दिया।

 

कंस ने अब कंस ने केशी को बुलाया और कहा—‘तुम व्रज में जाकर बलराम और कृष्ण को मार डालो।’ वह चला गया।

 

इसके बाद कंस ने मुष्टिक, चाणूर, शल, तोशल आदि पहलवानों, मन्त्रियों और महावतों को बुलाकर कहा—‘वीरवर चाणूर और मुष्टिक! तुम लोग ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनो । वसुदेव के दो पुत्र बलराम और कृष्ण नन्द के व्रज में रहते हैं। उन्हीं के हाथ से मेरी मृत्यु बतलायी जाती है। इसलिए जब वे यहाँ आवें, तब तुमलोग उन्हें कुश्ती लड़ने-लड़ाने के बहाने मार डालना।

 

अब तुम लोग भाँति-भाँति के मंच बनाओ और उन्हें अखाड़े के चारों ओर गोल-गोल सजा दो। उन पर बैठकर नगरवासी और देश की दूसरी प्रजा इस स्वच्छंद दंगल को देखें । महावत्! तुम बड़े चतुर हो। देखो भाई! तुम दंगल के घेरे के फाटक पर ही अपने कुवलयापीड हाथी को रखना और जब मेरे शत्रु उधर से निकलें, तब उसी के द्वारा उन्हें मरवा डालना । इसी चतुर्दशी को विधिपूर्वक धनुषयज्ञ प्रारम्भ कर दो और उसकी सफलता के लिये वरदानी भूतनाथ भैरव को बहुत-से पवित्र पशुओं की बलि चढाओ ।

 

Kans ka Akrur ko Braj Jane ke liye kehna : कंस का अक्रूर को ब्रज जाने के लिए कहना 

 

इसके बाद कंस ने अक्रूर को बुलाया और कहा- अक्रूरजी! आप तो बड़े उदार दानी हैं। सब तरह से मेरे आदरणीय हैं। आज आप मित्र होने के नाते मेरा एक काम कर दीजिये; क्योंकि भोजवंशी और वृष्णिवंशी यादवों में आपसे बढ़कर मेरी भलाई करने वाला दूसरा को नहीं है । यह काम बहुत बड़ा है, इसलिये मेरे मित्र! मैंने आपका आश्रय लिया है। ठीक वैसे हो, जैसे इन्द्र समर्थ होने पर भी विष्णु का आश्रय लेकर अपना स्वार्थ साधता रहता है ।
आप नन्दराय के व्रज में जाइये। वहाँ वसुदेवजी की दो पुत्र हैं। कृष्ण और बलराम। आप उन्हें इसी रथ पर चढ़ाकर यहाँ ले आइये। बस, अब इस काम में देर नहीं होनी चाहिये । सुनते हैं, विष्णु के भरोसे जीने वाले देवताओं ने उन दोनों को मेरी मृत्यु का कारण निश्चित किया है। इसलिये आप उन दोनों को तो ले ही आइये, साथ ही नन्द आदि गोपों को भी बड़ी-बड़ी भेंटों के साथ ले आइये । यहाँ आने पर मैं उन्हें अपने काल समान कुवलयापीड हाथी से मरवा डालूँगा। यदि वे कदाचित् उस हाथी से बच गये, तो मैं अपने वज्र के समान मजबूत और फुर्तीले पहलवान मुष्टिक-चाणूर आदि से उन्हें मरवा डालूँगा । उनके मारे जाने पर वसुदेव आदि वृष्णि, भोज और दशार्हवंशी उनके भाई-बन्धु शोकाकुल हो जायँगे। फिर उन्हें मैं अपने हाथों मार डालूँगा ।

 

 

मेरा पिता उग्रसेन यों तो बूढ़ा हो गया है, परन्तु अभी उसको राज्य का लोभ बना हुआ है। यह सब कर चुकने के बाद मैं उसको, उसके भाई देवक को और दूसरे भी जो-जो मुझसे द्वेष करने वाले हैं—उन सबको तलवार के घाट उतार दूँगा । मेरे मित्र अक्रूरजी! फिर तो मैं होऊँगा और आप होंगे तथा होगा होगा इस पृथ्वी का अकण्टक राज्य। जरासन्ध हमारे बड़े-बूढ़े ससुर हैं और वानरराज द्विविद मेरे प्यारे सखा हैं । शम्बरासुर, नरकासुर और बाणासुर—ये तो मुझसे मित्रता करते ही हैं, मेरा मुँह देखते रहते हैं; इन सबकी सहायता से मैं देवताओं के पक्षपाती नरपतियों को मारकर पृथ्वी का अकण्टक राज्य भोगूँगा । यह सब अपनी गुप्त बातें मैंने आपको बतला दीं। अब आप जल्दी-से-जल्दी बलराम और कृष्ण को यहाँ ले आइये। अभी तो वे बच्चे ही हैं। उनको मार डालने में क्या लगता है ? उनसे केवल इतनी ही बात कहियेगा कि वे लोग धनुषयज्ञ के दर्शन और यदुवंशियों की राजधानी मथुरा की शोभा देखने के लिये यहाँ आ जायँ’ ।

 

 

अक्रूरजीने कहा—महाराज! आप अपनी मृत्यु, अपना अरिष्ट दूर करना चाहते हैं, इसलिये आपका ऐसा सोंचना ठीक ही है। मनुष्य को चाहिये कि चाहे सफलता हो या असफलता, दोनों के प्रति समभाव रखकर अपना काम करता जाय। फल तो प्रयत्न से नहीं, दैवी प्रेरणा से मिलते हैं ।

 

मनुष्य बड़े-बड़े मनोरथों के पुल बाँधता रहता है, परन्तु वह यह नहीं जानता कि दैव ने, प्रारब्ध ने इसे पहले से ही नष्ट कर रखा है। यही कारण है कि कभी प्रारब्ध के अनुकूल होने पर प्रयत्न सफल हो जाता है तो वह हर्ष से फूल उठता है और प्रतिकूल होने पर विफल हो जाता है तो शोकग्रस्त हो जाता है। फिर भी मैं आपकी आज्ञा का पालन तो कर ही रहा हूँ।

 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—कंस ने मन्त्रियों और अक्रूरजी को इस प्रकार की आज्ञा देकर सबको विदा कर दिया। तदनन्तर वह अपने महल में चला गया और अक्रूरजी अपने घर लौट आये।

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