X Karma Akarma Vikarma

Mithyachari kaun hote hai : Who is Self-Styled in hindi

Mithyachari kaun hote hai : Who is Self-Styled in hindi

मिथ्याचारी कौन होते हैं?

श्रीमद भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि मिथ्याचारी कौन है?(Mithyachari kon hai)

 

हे अर्जुन! जो भोग विलास का भक्त होता है, वो परमात्मा का भक्त कैसे हो सकता है? ऐसे मनुष्य जो बाहर से भक्ति का प्रदर्शन करते हैं परन्तु मन से विषयों के चिंतन और उनकी आशक्ति में लीन रहते हैं, वो केवल भक्ति का ढोंग करते हैं।
वो योगी नहीं ढोंगी होते हैं। इन्हें मिथ्याचारी(Mithyachari) कहते हैं।

 

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।
जो लोग विषयोपभोग नहीं करते, उनके (तो केवल) विषय निवृत्त हो जाते हैं (अर्थात् विषयों की आसक्ति निवृत्त नहीं होती), पर परमात्मा का साक्षात्कार करके इसकी (स्थितप्रज्ञकी) विषय-रस रुप वासना भी निवृत्त हो जाती है ।

 

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
जो महामूढ मनुष्य कर्मेन्द्रियोंको संयमित करता है, लेकिन मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है ।

 

भोजन को तो छोड़ दे, पर नहीं भूले स्वाद,
अर्जुन ऐसा त्याग है केवल मिथ्यावाद।

 

इन्द्रियों को हठपूर्वक रोके, विषयों को मन से ना हटाए,
रखे व्रत उपवास परन्तु न लालसा छूटे न लोभ ही जाये,
मन में कुछ आचरण में कुछ है, दोनों का नहीं मेल मिलाये,
ऐसा मूढ़मति अज्ञानी मिथ्याचारी दम्भी कहाये।

Read : इन्द्रियों पर काबू कैसे करें

Read : सुख दुःख क्या है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.