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Man kya hai ? Man ko Control kaise karen?

Man kya hai ? Man ko Control kaise karen? 

मन क्या है? मन को कण्ट्रोल कैसे करें?

मन क्या है? मन को कण्ट्रोल कैसे करें? ये सब प्रश्न हम व्यक्ति के है। किसी एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं है ये। सभी अपने मन को काबू में करना चाहते हैं। लेकिन क्या हम मन को काबू में कर पाए? जितना काबू में करना चाहता उतना ही ये बेकाबू हो गया। यही प्रश्न श्रीमद भगवद गीता में अर्जुन, कृष्ण से पूछते हैं। इसको पढ़ने से आप समझ जायेंगे कि मन क्या है? मन को कैसे काबू में कर सकते हैं?

What is mind in hindi | Shrimad Bhagwat Geeta : मन क्या है | श्रीमद भगवद गीता

भगवान कृष्ण अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए आत्मा और शरीर के बारे में बताते हैं।

Read : आत्मा और शरीर क्या है?

फिर कहते हैं ये सुख दुःख हमारे शरीर को होते हैं जिसका कारण हमारा मन है। ये सब मन की शरारत है। 

अर्जुन पूछता है- मन की शरारत? इसका क्या अर्थ है केशव?

 

श्री कृष्ण कहते हैं- पार्थ! प्राणी के शरीर के एक अदृश्य अंग है मन जो दिखाई नहीं देता। परन्तु वही सबसे शक्तिशाली हिस्सा है शरीर का। ये याद रखो कि मन शरीर का हिस्सा है। उसका आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं।

आत्मा यदि रथ में बैठा हुआ रथ का स्वामी है तो मन शरीर रूपी रथ का सारथि है। ये मन ही इन्द्रियों रूपी घोड़ों को इधर उधर भटकाता है। कभी यौवन के आवेश में यही चंचल मन, मनुष्य को इस भ्रम में डाल है की वो सर्वशक्तिमान है। वो सब कुछ कर सकता है। वो यहाँ का राजा है जिसके आगे हर कोई झुक जाने पर विवश है और जिसे हर कोई प्रणाम करता है। जिस तरह दीपक की बाती को दीपक तले छुपा अँधेरा दिखाई नहीं देता, उसी तरह जवानी को उसके पीछे छुपा और बुढ़ापा, कमजोरी दिखाई नहीं देती। परन्तु जब शरीर के दीपक में यौवन शक्ति का घी जल-जल कर समाप्त होने लगता है और दीपक तले छुपा अँधेरा बढ़ने लगता है तो मनुष्य घबराकर चिल्लाने लगता है। मैं बीमार हूँ। मैं मर रहा हूँ मुझे बचाओ। ये रोने का नाटक भी मन ही करता है।
हे अर्जुन! मनुष्य को मय के घमंड की मदिरा पिलाकर मदहोश करने वाला पाखंडी केवल मन है।

मन से बड़ा बेहरूपी न कोई पल पल रचता स्वांग निराले,
माया ममता में उलझा रहे वो पड़ जाये जो मन के पाले,
मन के बहकावे में न आ, मन राह भुलाये भ्रम में डाले,
तू इस मन का दास न बन, इस मन को अपना दास बना ले।

मन के हाथों में मोह माया का जाल है जिसे वो मनुष्य की कामनाओं पर डालता रहता है और उसे अपने वश में करता रहता है। ये मन शरीर से भी मोह करता है, अपनी खुशियों से भी मोह करता है और अपने दुखों से भी। खुशियों में खुशियों से भरे हुए गीत गाता है तो दुःख में दुःख भरे गीत गुनगुनाता है। अपने दुःख में दूसरों को शामिल करके उसे ख़ुशी होती है। किसी भी प्राणी को उसका मन जीवन के अंत तक अपने जाल से निकलने नहीं देता। रस्सी में बांधकर उससे तरह तरह के नाच नचवाता रहता है। वो जीव को इतनी फुर्सत भी नहीं देता कि वो अपने अंतर् में झांककर अपनी आत्मा को पहचाने और आत्मा के अंदर जिस परमात्मा का प्रकाश है उस परमात्मा का साक्षात्कार करे।

How to control your mind in hindi Shrimad Bhagwat Geeta : मन को काबू में कैसे करें | श्रीमद भगवद गीता

हे पार्थ! प्राणी के लिए आवश्यक है कि प्राणी अपने मन को काबू(man ko kaabu) में करके अपने अंतर् में झांककर अपनी आत्मा में झांके। तब उस आत्मा के अंदर उसे परमात्मा का प्रकाश स्पष्ट दिखाई देगा। उसी को परमात्मा का साक्षात्कार कहते हैं।

अर्जुन पूछता है- तुम तो कहते हो अपने अंतर् में आत्मा को झांककर आत्मा को और उस आत्मा में प्रकाशित परमात्मा को पहचानो अर्थात आत्मा से अलग कोई और है जो आत्मा को पहचानेगा। ये किसको कह रहे हो कि आत्मा को पहचाओं? कौन पहचानेगा अंतर् की आत्मा को?

कृष्ण कहते हैं- तुम्हारा मन

अर्जुन आश्चर्य चकित होकर पूछते हैं – मन? परन्तु तुम तो कहते हो कि मन माया के भ्रम जाल में फंसा कर प्राणी को बहुत नाच नचाता है? फिर तो आत्मा और परमात्मा की ओर क्यों ले जायेगा?

कृष्ण बोले- तुमने ठीक प्रश्न किया अर्जुन। उसका उत्तर ये है जब तक तुम अपने आपको मन और विषयों के आधीन रहने दोगे तब तक वो तुम्हे नाच नचाता रहेगा

हे पार्थ! मनुष्य का शरीर एक रथ की भांति है। उस रथ के जो घोड़े हैं उन्हें मनुष्य की इन्द्रियों समझो। जैसे आँख, नाक, कान, मुख, जिह्वा आदि। उन इन्दिर्यों को, घोड़ों को जो सारथि चलाता है वो सारथि ही मन है और उस रथ में बैठा हुआ जो उस रथ का स्वामी है, वही आत्मा है। मनुष्य की इन्द्रियां अपने विषयों की ओर आकर्षित होती रहती हैं और उसका मन इन्दिर्यों को उसके विषयों की ओर ही दौड़ाता रहता है। ये तभी तक हो सकता है जब तक जीवात्मा अपने मन को काबू में ना लाये। जब तक मन काबू में नहीं आएगा वो इन्दिर्यों को उनके विषयों की ओर ही दौड़ाता रहेगा। विषय उनको बुलाते हैं। इन्द्रियां उनकी तरफ भागती हैं और मन जीवात्मा की परवाह किये बगैर रथ को उस ओर लिए जाता है। परन्तु जब तुम स्वयं मन के आधीन न रहकर, मन को अपने आधीन कर लोगे तो वही मन एक अच्छे सारथि की तरह तुम्हारे शरीर रूपी रथ को सीधे प्रभु के चरणों में ले जायेगा।

मन है शरीर के रथ का सारथि, रथ को चाहे जिधर ले जाये।
इन्द्रियां हैं इस रथ के घोड़े, घोड़ों को विषयों की ओर भगाये।
आत्मा और शरीर के मध्य में, ये मन अपने खेल दिखाए।
मन को वश में करले जो योगी वो इसी रथ से मोक्ष को जाये।

इसलिए मैंने कहा था मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः अर्थात यदि मन तुम्हारा स्वामी है और तुम उसके आधीन हो तो वो तुम्हे माया के बंधन में जकड़ता रहेगा और जब तुम मन पर काबू पा लोगे और उसके स्वामी हो जाओगे तो वो ही मन तुम्हे मोक्ष के द्वार तक ले जायेगा।

अर्जुन पूछता है- हे मधुसूदन! ये कहना तो बहुत आसान है कि तुम मन पर काबू पा लो, मन के स्वामी बन जाओ। परन्तु यही तो सबसे दुष्कर कार्य है। हे केशव! मन तो वायु की तरह चंचल है। जिस तरह बहती हुई वायु पर काबू पाना असंभव है, इसी प्रकार इस चंचल मन को अपने आधीन करना अति दुष्कर काम है।

कृष्ण बोले- हे अर्जुन! तुम्हारा ये कहना सत्य है कि मन अति चंचल है उसे अपने वश में करना बहुत मुश्किल है।

अर्जुन एकदम बोले- मुश्किल ही नहीं जनार्दन, असंभव है।

कृष्ण कहते हैं- नहीं अर्जुन, मुश्किल जरूर है परन्तु असंभव नहीं है।

अर्जुन पूछते हैं- तुम्हारा कहना है मन को वश में करने का कोई तरीका, कोई साधन भी है? यदि है तो क्या तरीका है?

कृष्ण बोले- अवश्य है।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
अर्थात मन को वश में करने के लिए उस पर दो तलवारों से प्रहार करना पड़ता है। एक तलवार अभ्यास की है और दूसरी तलवार है वैराग्य की।

देखो अर्जुन! अभ्यास का अर्थ है निरंतर अभ्यास। मन को एक काम पर लगा दो, वो वहां से भागेगा, उसे पकड़ कर लाओ, वो फिर भागेगा, उसे फिर पकड़ो। ऐसा बार बार करने पड़ेगा। जैसे घोड़े का नवजात शिशु एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहता। क्षण क्षण में इधर उधर फुदकता रहता है।
उसी प्रकार मन भी क्षण क्षण में इधर उधर भटकता रहता है। एक चंचल घोड़े की तरह मन भी बड़ा चंचल होता है और ऐसे चंचल मन को काबू करना उतना ही कठिन है जैसे किसी मुँहजोर घोड़े को काबू करना। ऐसे घोड़े को काबू करने के लिए सवार जितना जोर लगता है, घोडा उतना ही विरोध करता है और बार-बार सवार को ही गिरा देता है। परन्तु यदि सवार दृढ संकल्प हो तो अंत में वो उस घोड़े पर सवार हो जाता है, बस, फिर वही घोडा सवार के के इशारे पर चलता है।

इसी प्रकार मन को भी नियंत्रण की रस्सी में बांधकर बार-बार अपने रास्ते पर लाया जाता है तो अंत में वो अपने स्वामी का कहना मानना शुरू कर देता है। इसी को कहते हैं अभ्यास की तलवार चलाना।

अर्जुन पूछता है- जब अभ्यास की तलवार से ही मन सही रास्ते पर आ जाये फिर वो दूसरी वैराग्य की तलवार की क्या आवश्यकता है?

कृष्ण कहते हैं – उसकी आवश्यकता इसलिए है, एक बार ठीक रास्ते पर आ जाने के बाद मन फिर से उलटे रास्ते पर ना चला जाये क्योंकि उलटे रास्ते पर इन्द्रियों के विषय उसे सदा ही आकर्षित करते रहेंगे। मिथ्या भोग, विलास और काम की तृष्णा उसे फिर अपनी ओर खींच सकती है। इसलिए मन को ये समझना जरुरी है कि वो सारे विषय भोग, मिथ्या हैं, असार हैं। योग माया के द्वारा उत्पन्न होने वाले मोह का भ्रम हैं। मन जब इस सत्य को समझ लेगा तो उसे विषयों से मोह नहीं रहेगा बल्कि उसे वैराग्य हो जायेगा और यही वैराग्य की तलवार का काम है कि वो विषयों को काट के मन को सन्यासी बना देती है।

मोह से विमूहित जब बुद्धि तेरी भली भांति, मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी।
लोक परलोक से संबंधित भोगों के प्रति तब तेरे मन में विरक्ति भर जाएगी।
वासना की वासना रहेगी तेरे पास तनिक, मन स्थिर हो जायेगा कामना मर जाएगी।
हे अर्जुन मन के स्थिर होने पर आत्मा ये परमात्मा रूपी सागर में उतर जाएगी।

अब अर्जुन पूछता है- हे केशव! ये जो तुम वैराग्य की बात करते हो, ये तो तभी आ सकता है जब प्राणी को आपकी इस बात पर विश्वास हो जाये कि ये सारा जगत वास्तव में मिथ्या है, नश्वर है, परन्तु आपकी माया के प्रभाव से वो सत्य जान पड़ता है। इस परम सत्य के ज्ञान पर विश्वास हो जाये तभी तो वैराग्य होगा।

कृष्ण कहते हैं- बिल्कुल! ज्ञान ही मनुष्य के ह्रदय में वैराग्य पैदा कर सकता है और वही सच्चा ज्ञान मैं तुम्हे प्रदान कर रहा हूँ।

इसके बाद अर्जुन पूछता है कि भगवन तुम तो सच्चा ज्ञान मुझे दे रहे हो लेकिन मेरा मन उसे मानता क्यों नहीं? आगे पढ़ें!!

Read : मन हमारी बात क्यों नहीं मानता? 

 

 

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