Complete Shrimad Bhagavad Gita in hindi

Lord Krishna Virat Roop in hindi | Shrimad Bhagavad Gita

Lord Krishna Virat Roop in hindi  | Shrimad Bhagavad Gita

भगवान श्री कृष्ण का विराट रूप | श्रीमद भगवद गीता

 

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं। भगवान अर्जुन को ज्ञान योग, कर्म योग, आदि का वर्णन करते हैं। अर्जुन ऐसा सुंदर ज्ञान सुनकर रोने लगता है।  फिर अर्जुन से पूछते हैं तुम्हारे मन में अभी और कोई भी कामना शेष है क्या? देखो इन आंसुओं को, इन आंसुओं की गंगा में तुमने अपनी हर भूल, हर पाप को धो डाला है। अब तुम निष्पाप हो गए हो। तुम्हारे विवेक ने तुम्हारी आत्मा से पापों का बोझ उतार दिया है।

अर्जुन कहता है – हाँ प्रभु! आपके ज्ञान की अग्नि में मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा अज्ञान तथा मेरा अहंकार सबकुछ जलकर राख हो गया है। मेरी आत्मा से सारा बोझ उतर गया है। मुझे ऐसे लग रहा है जैसे एक चींटी किसी पत्ते पर बैठकर किसी तूफानी नदी को पार कर लेती है। उसी प्रकार मैं आपके कर्मानुरूपी कमलपत्र पर बैठकर इस विशाल भवसागर के ऊपर तैर रहा हूँ। जिस प्रकार अंत समय एक मृतक शरीर आत्मा से दूर हो जाता है, उसी प्रकार इस समय मेरी सब आसक्तियां, सब आशाएं, समस्त कामनाएं मुझसे दूर चली गई हैं और मैं प्रकाश की एक किरण की भांति हल्का हो गया हूँ। अब जैसे मेरे सारे अस्तित्व पर कोई बोझ नहीं रहा। चारों ओर केवल प्रकाश ही प्रकाश है।

कृष्ण कहते हैं – तुम धन्य हो अर्जुन! तुम धन्य हो। जिस क्षण, जिस परम अवस्था में तुम पहुँच गए हो, उस अवस्था में युगों-युगों में कोई महात्मा मेरी विशेष कृपा से पहुँच पाता है। मैं देख रहा हूँ कि इस क्षण, इस क्षण में तुम केवल प्रकाश पुंज हो। जिसे मैंने अपनी दिव्य ज्योति से प्रकाशित कर दिया है। कोई लालसा, कोई कामना तुम्हारे अंदर नहीं रही।

अर्जुन कहते हैं – अभी मैं पूरी तरह कामना विहीन नहीं हुआ हूँ।
कृष्ण कहते हैं – क्या कह रहे हो अर्जुन?

अर्जुन बोलते हैं – हाँ भगवन! आपने अपनी ज्योति से मेरे अंतर् को प्रकाशित कर दिया है। परन्तु आपकी ज्योति का तेज, मेरी समस्त कामनाओं को भस्म नहीं कर सका। अब भी मेरे अंदर एक कामना रह गई है जो मरी नहीं है।
कृष्ण पूछते हैं – हे अर्जुन! ऐसी कौनसी कामना है जिसे मेरी ज्योति का तेज भी भस्म नहीं कर सका?

अर्जुन बोले – आपके दर्शन की।
कृष्ण मुस्कुरा कर कहते हैं – मेरे साक्षात् दर्शन तो तुम कर रहे हो।

अर्जुन कहता है- नहीं भगवन! इस समय मैं आपके सम्पूर्ण रूप के दर्शन करना चाहता हूँ। मैं आपके भिन्न-भिन्न गुणों की, आपके भिन्न-भिन्न रूपों की व्याख्या सुन चुका हूँ। भिन्न-भिन्न अवतारों में भी आपके भिन्न-भिन्न रूप हुए हैं। मैं सब रूपों को, उन समस्त गुणों को एकसाथ, एक ही समय में देखना चाहता हूँ।
हे समस्त चराचर के स्वामी! यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो मेरी अंतिम इच्छा पूरी कर दीजिये।

कृष्ण कहते हैं – हे पार्थ! मैंने तुम्हें सर्वदा, अपना सखा कहा है। मैं तुम्हारी ये इच्छा भी अवश्य पूरी कर सकता हूँ। परन्तु मेरे इस विराट स्वरूप के दर्शनों का तेज तुम्हारी आँखें नहीं सह सकेंगीं।

हे अर्जुन! तुम्हारी दृष्टि की झोली इतनी बड़ी नहीं कि जिसमें मेरा सम्पूर्ण दिव्य स्वरूप समा सके।

अर्जुन पूछते हैं – मेरे नेत्रों की झोली छोटी है परन्तु आपकी करुणा, आपका दया तो छोटी नहीं है। सच्चा दाता एक याचक की छोटी झोली को देखकर अपना दान कम नहीं करता। उसी प्रकार हे अपरम्पार मुझे तो नेत्र प्रदान करो जिनसे मैं आपके विराट रूप के दर्शन कर सकूँ।

कृष्ण बोले – हे अर्जुन! एक सच्चे भक्त की भांति आज तुमने भगवान को हरा दिया। अच्छी बात है। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा। आज तुम्हारे कारण समस्त देवी-देवता भी मेरे इस दुर्लभ रूप को देखकर निहाल हो जायेंगे। पहले मैं तुम्हें वो नेत्र प्रदान करता हूँ जो इस विराट रूप के दर्शन कर सकें। ऐसा कहकर भगवान ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की है।
दिव्य दृष्टि मिलने के बाद अर्जुन को भगवान के विराट रूप का दर्शन होता है।
अर्जुन इस रूप को देखकर बहुत ज्यादा डर जाता है और कहता है – हे महाविराटस्वरूप, हे महाविकरालरूप, हे परमदेव, आपकी इस विशाल आकृति को देखकर मैं आश्चर्यचकित हूँ और भयग्रस्त हो रहा हूँ। स्वर्गलोक से लेकर पाताललोक तक केवल आपका ही विशाल और विकराल रूप दिखाई दे रहा है।

मेरी दिव्यदृष्टि की सीमाओं से परे आप हैं। आपका अस्तित्व कहाँ से आरम्भ होता है और कहाँ समाप्त होता है, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है। कृपया मुझको समझाइये। आप कौन हैं? आप कौन हैं? आप कौन हैं?
हे महाबाहु! आपका उग्र प्रकाश अपने तेज द्वारा समस्त जगत को तपा रहा है। मुझपर कृपा कीजिए, मुझे बतलाइये कि उग्र रूप वाले आप कौन हैं?

 

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – हे अर्जुन! तुम पर अनुग्रह करके मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से मेरे इस परम तेजोमय, अनादि और अनंत रूप का दर्शन तुझे करा दिया है। ये जो सीमा रहित विराटरुप तुम देख रहे हो, आज से पहले मैंने किसी को नहीं दिखाया। तुम पर केवल स्नेह के कारण मैंने तुझे इस रूप के दर्शन कराये हैं। तुझे व्याकुलता नहीं होनी चाहिए।

हे पांडव पुत्र! मेरी ओर देखो। मैं समस्त लोकों का नाश करने वाला महाकाल, मेरे मुँह में प्रतिक्षण हजारों सृष्टियाँ विलीन होती रहती हैं और मेरे मुख से लाखों ब्रह्माण्ड प्रकट होते रहते हैं।

हे अर्जुन तू बारह आदित्यों को? आठ वसुओंको? ग्यारह रुद्रों को और दो अश्विनीकुमारों को तथा उनचास मरुद्गणोंको देख। जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं? ऐसे बहुत से आश्चर्यजनक रूपोंको भी तू देख।

भगवान के विराट रूप के जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं। अनेक तरह के अद्भुत दर्शन हैं। अनेक दिव्य आभूषण हैं और हाथों में उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं, जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं। जिनके ललाट तथा शरीर पर दिव्य चन्दन आदि लगा हुआ है। ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय, अनन्तरूप वाले तथा चारों तरफ मुख वाले देव(अपने दिव्य स्वरूप) को भगवान ने दिखाया।

उस समय अर्जुन ने देवों के देव भगवान के शरीर में एक जगह स्थित अनेक प्रकारके विभागों में विभक्त सम्पूर्ण जगत को देखा।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – ये सारी सृष्टियाँ केवल मेरी मर्जी का खेल है। जब चाहता हूँ इन्हें बना देता हूँ, जब चाहता हूँ इन्हें मिटा देता हूँ। मैं ही जीवन हूँ, मैं ही मृत्यु हूँ। हे भक्त! इस समय मैं तुम्हारी भक्ति के कारण तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करके जो विराट रूप धारण किया है वो रूप केवल तुम्हारे समझने के लिए सम्पूर्ण है। तुम मेरे अस्तित्व को न अपनी बुद्धि से समझ सकते हो, न दिव्यदृष्टि से मेरे सम्पूर्ण रूप के पूर्ण दर्शन कर सकते हो। तुम्हारी सारी कल्पनाएं मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को देखने में असफल हो जाएँगी।

हाँ! केवल भक्ति से तुम मेरी असीम विशालता का आभास कर सकते हो, केवल आभास। इसलिए केवल श्रद्धा और भक्ति से मेरे इस रूप को अपने रूप को ह्रदय में धारण करो और इस भय और व्याकुलता का त्याग करके केवल मेरे नाम का स्मरण करो।

अर्जुन भगवान के नाम का स्मरण करने लगता है- जय श्री कृष्ण! जय श्री कृष्ण ! जय श्री कृष्ण!
भगवान श्री कृष्ण के इस विराट रूप की स्तुति त्रिलोकी में सभी ने की, जिनमें सभी देवी-देवताओं, ऋषि मुनियों, नारद जी, माँ पार्वती-भगवान भोले नाथ और ब्रह्मा जी ने की।

अर्जुन कहता है – आपने विराट रूप के लिए मुझे दिव्य दृष्टि को प्रदान कर दी मगर इन आँखों में इतनी सहन शक्ति, इतनी क्षमता भी नहीं है कि आपके इस परम तेजस्वी रूप को और अधिक ग्रहण करें। इसलिए हे विश्वनाथ! हे प्रभु! मैं आपसे फिर प्रार्थना करता हूँ कि मेरी घबराहट और व्याकुलता को दूर करने के लिए प्रभु मुझे अपना शीतल रूप दिखाए। मैं आपके दिव्य चतुर्भुज रूप के दर्शन से अपना मन शांत करना चाहता हूँ। आप फिर से शंख, चक्र, गदा, पदम् धारण करके अपने सौम्य चतुर्भुज में अपने दर्शन देने की कृपा करें।

कृष्ण कहते हैं – हे भक्त! मैंने तुम्हे पहले ही जता दिया था कि तुम मेरे विराट स्वरूप के तेज को सहन नहीं कर सकोगे। फिर भी केवल तुम्हारा मान रखने के लिए मैंने ये विराट रूप धारण किया और अब तुम्हारी दूसरी प्रार्थना को भी स्वीकार करता हूँ और तुम्हारी इच्छानुसार मैं चतुर्भुज रूप धारण करता हूँ।
ऐसा कहकर भगवान श्री कृष्ण चतुर्भुज रूप धारण कर लेते हैं।

अर्जुन कहता है – जय श्री कृष्ण! हे जनार्दन! आपका विराटरुप देखकर मेरा मन भयग्रस्त हो गया था। परन्तु आपके इस चतुर्भुज रूप के दर्शनों से मेरा चित्त शांत और मन स्थिर हो गया है। ऐसा कहकर अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के चरणों में बारम्बार प्रणाम करता है।

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