krishna shanti doot virat roop

Lord Krishna Married life in hindi

Lord Krishna Married life in hindi

श्री कृष्ण का गृहस्थ जीवन

 

भगवान श्री कृष्ण का गृहस्थ जीवन बड़ा ही सुंदर था। भगवान अपनी सभी पत्नियों के साथ द्वारिका में रहते थे। भगवान जब द्वारिका में जाते तो अपने सोलह हजार एक सौ आठ रूप बना लेते थे और अपनी पत्नियों के साथ अद्भुत रूप धारण करके विहार करते थे। भगवान श्रीकृष्ण सोलह हजार से अधिक पत्नियों के एकमात्र प्राण-वल्लभ थे। भगवान इसी प्रकार उनके साथ विहार करते रहते। उनकी चाल-ढाल, बातचीत, चितवन-मुसकान, हास-विलास और आलिंगन आदि से रानियों की चित्तवृत्ति उन्हीं की ओर खिंची रहती। उन्हें और किसी बात का स्मरण ही न होता।

 

Krishna Vanshavali : कृष्ण की वंशावली

जिन श्री कृष्ण की वंशी इतनी मधुर बजती है तो उनकी वंशावली भी मधुर ही होगी। क्योंकि भगवान की हर लीला मधुर है।  भगवान ग्राहस्थोचित श्रेष्ठ धर्म का आश्रय लेकर व्यवहार कर रहे थे। भगवान की रानियों की संख्या सोलह हजार एक सौ आठ थी। शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं की परीक्षित! उन श्रेष्ठ स्त्रियों में से रुक्मिणी आदि आठ पटरानियों और उनके पुत्रों का तो मैं पहले ही क्रम से वर्णन कर चुका हूँ । उनेक अतिरिक्त भगवान श्रीकृष्ण की और जितनी पत्नियाँ थीं, उनके भी प्रत्येक के दस-दस पुत्र उत्पन्न किये। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि भगवान सर्वशक्तिमान् और सत्यसंकल्प हैं।

 

भगवान के परम पराक्रमी पुत्रों में अठारह तो महारथी थे, जिनका यश सारे जगत् में फैला हुआ था। उनके नाम मुझसे सुनो । प्रद्दुम्न, अनिरुद्ध, दीप्तिमान्, मानु, साम्ब, मधु, बृहद्भानु, चित्रभानु, वृक, अरुण, पुष्कर, वेदबाहु, श्रुतदेव, सुनन्दन, चित्रबाहु, विरूप, कवि और न्यग्रोध।

 

इनमे सबसे श्रेष्ठ रुक्मिणीनन्दन प्रद्दुम्नजी थे। वे सभी गुणों में अपने पिता के समान ही थे । महारथी प्रद्दुम्न ने रुक्मी की कन्या से अपना विवाह किया था। उसी के गर्भ से अनिरुद्धजी का जन्म हुआ। उसमें दस हजार हाथियों का बल था । रुक्मी के दौहित्र अनिरुद्धजी ने अपने नाना की पोती से विवाह किया। उसके गर्भ से वज्र का जन्म हुआ। ब्राह्मणों के शाप से पैदा हुए मूसल के द्वारा यदुवंश का नाश हो जाने पर एकमात्र वे ही बच रहे थे।

 

वज्र के पुत्र हैं प्रतिबाहु, प्रतिबाहु के सुबाहु, सुबाहु के शान्तसेन और शान्तसेन के शतसेन । इस वंश में कोई भी पुरुष ऐसा न हुआ जो बहुत-सी सन्तान वाला न हो तथा जो निर्धन, अल्पायु और अल्पशक्ति हो। वे सभी ब्राह्मण के भक्त थे। यदुवंश में ऐसे-ऐसे यशस्वी और पराक्रमी पुरुष हुए हैं, जिनकी गिनती भी हजारों वर्षों में पूरी नहीं हो सकती। मैंने ऐसा सुना है कि यदुवंश के बालकों को शिक्षा देने के लिये तीन करोड़ अट्ठासी लाख आचार्य थे । ऐसी स्थिति में महात्मा यदुवंशियों की संख्या तो बतायी ही कैसे जा सकती है! स्वयं महाराज उग्रसेन के साथ एक नील (१०००००००००००००) के लगभग सैनिक रहते थे ।

 

प्राचीन काल में देवासुरसंग्राम के समय बहुत-से भयंकर असुर मारे गये थे। वे ही मनुष्यों में उत्पन्न हुए और बाद घमंड से जनता को सताने लगे । उनका दमन करने के लिये भगवान की आज्ञा से देवताओं ने ही यदुवंश में अवतार लिया था। उनके कुलों की संख्या एक सौ एक थी । वे सब भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना स्वामी एवं आदर्श मानते थे। जो यदुवंशी उनके अनुयायी थे, उनकी सब प्रकार से उन्नति हुई । यदुवंशियों का चित्त इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण में लगा रहता था कि उन्हें सोने-बैठने, घूमने-फिरने, बोलने-खेलने और नहाने-धोने आदि कामों में अपने शरीर की भी सुधि न रहती थी। वे जानते ही न थे कि हमारा शरीर क्या कर रहा है। उनकी समस्त शारीरिक क्रियाएँ यन्त्र की भाँति अपने-आप होती रहती थीं।

 
जिस लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये बड़े-बड़े देवता यत्न करते रहते हैं, वे ही भगवान की सेवा में नित्य-निरन्तर लगी रहती हैं। भगवान का नाम एक बार सुनने अथवा उच्चारण करने से ही सारे अमंगलों को नष्ट कर देता है।

 

भगवान स्वभाव से ही चराचर जगत् का दुःख मिटाते रहते हैं। उनका मन्द-मन्द मुसकान से युक्त सुन्दर मुखारविन्द व्रजस्त्रियों और पुरस्त्रियों के हृदय में प्रेम—भाव का संचार करता रहता है। वास्तव में सारे जगत् पर वही विजयी हैं। उन्हीं की जय हो! जय हो ! !

 

 

भगवान ने धर्म-मर्यादा की रक्षा के लिये दिव्य लीला-शरीर ग्रहण किया और उनके अनुरूप अद्भुत चरित्रों का अभिनय किया। उनका एक-एक कर्म स्मरण करने वालों के कर्मबन्धनों को काट डालने वाला है। जो यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा का अधिकार प्राप्त करना चाहे, उसे उनकी लीलाओं का ही श्रवण करना चाहिये।

 

जब मनुष्य प्रतिक्षण भगवान श्रीकृष्ण की मनोहारिणी लीला-कथाओं का अधिकाधिक श्रवण, कीर्तन और चिन्तन करने लगता है, तब उसकी भक्ति उसे भगवान के परमधाम में पहुँचा देती है। यद्यपि काल की गति के परे पहुँच जाना बहुत ही कठिन है परन्तु भगवान के धाम में काल की दाल नहीं गलती। वह वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाता। उसी धाम की प्राप्ति के लिये अनेक सम्राटों ने अपना राजपाट छोड़कर तपस्या करने के उद्देश्य से जगल की यात्रा की है। इसलिए मनुष्य को उनकी लीला-कथा का ही श्रवण करना चाहिये।

Read : श्री कृष्ण की मृत्यु 

Read : कृष्ण का जन्म 

2 thoughts on “Lord Krishna Married life in hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.