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Lord Krishna Death Story in hindi

Lord Krishna Death Story in hindi

भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु कहानी/कथा 

 

भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत का युद्ध पूर्ण करवाया है। जिसमे धर्म(पांडवों) की विजय हुई है और अधर्म(कौरवों) की हार हुई है।
भगवान पांडवों को लेकर धृतराष्ट्र और गांधारी के पास गए हैं। कृष्णजी ने गांधारी के पैर को स्पर्श किया गांधारी बोलीं दूर हटो तुम्हारे कारण आज मेरा वंश समाप्त हो गया। यदि तुम चाहते तो युद्ध को रोक सकते थे लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। तुमने मेरा वंश नाश कर दिया। ये कहकर गांधारी रोने लगी और कृष्ण को शाप देते हुए कहती है- जिस प्रकार मेरा भरा-पूरा कुल समाप्त हो गया, ऐसे ही तुम्हारा वंश तुम्हारे ही सामने समाप्त हो जायेगा।

 

भगवान तो भगवान हैं, प्रणाम किया और कहते हैं मां गांधारी मुझे आपसे इसी आशीर्वाद की प्रतीक्षा थी। मैं आपके शाप को ग्रहण करता हूं मस्तक पर।

 

शाप देने के बाद गांधारी को अच्छा नहीं लगा और उन्हें ग्लानि होने लगी। लेकिन भगवान श्री कृष्ण को शाप का कोई दुःख नहीं था। अब भगवान पांडवों के साथ वापिस जाने लगे। भगवान अर्जुन से कहते हैं अर्जुन ये मेरी ही लीला थी क्योंकि मेरे यदुवंश को यह वरदान था कि उन्हें कोई दूसरा नहीं मार सकेगा, मरेंगे तो आपस में ही मरेंगे। देखो इन्होने शाप दे दिया तो यह व्यवस्था भी हो गई।

 

Yaduvansh ko Shrap(Shaap) : यदुवंश को श्राप(शाप) 

राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से पूछा- यदुवंशी बड़े ब्राह्मण भक्त थे। फिर उनसे ब्राह्मणों का अपराध कैसे बन गया ? और क्यों ब्राह्मणों ने उन्हें शाप दिया ?

श्री शुकदेव जी कहते हैं- द्वारिका के समीप पिण्डारक क्षेत्र में विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगीरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि निवास करने लगे थे। एक दिन यदुवंश के कुछ उद्दण्ड कुमार खेलते-खेलते उनके पास जा निकले। इन बालकों ने जाम्बवती के पुत्र साम्ब को स्त्री के वेष में सजाया और कहा – ‘ब्राह्मणों! ये एक सुन्दरी गर्भवती है। हम आपसे जानना चाहते हैं की यह पुत्री जनेगी या पुत्र ?’

 

इस बात से ब्राह्मण क्रोधित हो गए उन्होंने कहा- अरे मूर्खों ! तुम हमसे मजाक करते हो। यह एक ऐसा मूसल पैदा करेगी, जो तुम्हारे कुल का नाश करने वाला होगा।

 

ब्राह्मणों का शाप मिलते ही सब डर गए वे पछताने लगे और कहने लगे—‘हम बड़े अभागे हैं। देखो, हम लोगों ने यह क्या अनर्थ कर डाला ?

 

अब ये मूसल को लेकर अपने निवासस्थान में गये। उन्होंने भरी सभा में सब यादवों के समाने ले जाकर वह मूसल रख दिया और राजा उग्रसेन से सारी घटना कह सुनायी । राजा उग्रसेन ने उस मूसल को चूरा-चूरा करा डाला और उस चूरे तथा लोहे के बचे हुए छोटे टुकड़े को समद्र में फेंकवा दिया। (इसके सम्बन्ध में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कोई सलाह न ली; ऐसी ही उनकी प्रेरणा थी)।

 

उस लोहे के टुकड़े को एक मछली निगल गयी और चूरा तरंगों के साथ बह-बहकर समुद्र के किनारे आ लगा। वह थोड़े दिनों में एरक (बिना गाँठ की एक घास) के रूप में उग आया । मछली मारने वाले मछुओं ने समुद्र में दूसरी मछलियों के साथ उस मछली को भी पकड़ लिया। उसके पेट में जो लोहे का टुकड़ा था, उसको जरा नामक व्याध ने अपने बाण के नोक में लगा लिया।

 

 

एक दिन भगवान को अपशगुन दिखाई दिए हैं आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में बड़े-बड़े उत्पात हो रहे हैं। भगवान सभी यदुवंशियों को लेकर प्रभास क्षेत्र में पहुंचे हैं। वहाँ पहुँचकर यादवों ने यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण के आदेशानुसार बड़ी श्रद्धा और भक्ति से शान्ति पाठ आदि तथा और भी सब प्रकार के मंगल कृत्य किये । यह सब तो उन्होंने किया; परन्तु दैव ने उनकी बुद्धि हर ली और वे उस मैरेयक नामक मदिरा का पान करने लगे, जिसके नशे से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। उस तीव्र मदिरा के पान से सब-के-सब उन्मत्त हो गये और वे घमंडी वीर एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगे।

 

उस समय वे क्रोध से भरकर एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे और धनुष-बाण, तलवार, भाले, गदा, तोमर और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रों से वहाँ समुद्र तट पर ही एक-दूसरे से भिड गये। सभी यदुवंशी आपस में अस्त्र-शस्त्र से एक दूसरे पर हमला करने लगे और एक दूसरे को जान से मारने लगे। अन्त में जब उनके सब बाण समाप्त हो गये, धनुष टूट गये और शस्त्रास्त्र नष्ट-भ्रष्ट हो गये तब उन्होंने अपने हाथों से समुद्रतट पर लगी हुई एरका नाम की घास उखाड़नी शुरू की। यह वही घास थी, जो ऋषियों के शाप के कारण उत्पन्न हुए लोहमय मूसल के चूरे से पैदा हुई थी।
उनके हाथों में आते ही वह घास वज्र के समान कठोर हो गई। उसी घास के द्वारा अपने विपक्षियों पर प्रकार करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें मना किया, तो उन्होंने उनको और बलरामजी को भी अपना शत्रु समझ लिया। और उन्हें मारने के लिये उनकी ओर दौड़ पड़े । अब भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी भी क्रोध में भरकर युद्धभूमि में इधर-उधर विचरने और मुट्टी-की-मुट्टी एरका घास उखाड़-उखाड़ कर उन्हें मारने लगे। एरका घास की मुट्टी ही मुद्गर के समान चोट करती थी । जैसे बाँसों की रगड़ से उत्पन्न होकर दावानल बाँसों को ही भस्म कर देता है, वैसे ही ब्रह्मशाप से ग्रस्त और भगवान श्रीकृष्ण की माया से मोहित यदुवंशियों के स्पर्द्धामूलक क्रोध ने उनक ध्वंस कर दिया । जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि समस्त यदुवंशियों के संहार हो चुका है, तब उन्होंने यह सोचकर सन्तोष की साँस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा बार भी उतर गया ।

 

Balram Death/Samadhi : बलराम जी की मृत्यु(समाधि)—

बलरामजी ने समुद्र तट पर बैठकर एकाग्र-चित्त से परमात्मचिन्तन करते हुए अपने आत्मा को आत्मस्वरूप में ही स्थिर कर लिया और मनुष्य शरीर छोड़ दिया।

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5 thoughts on “Lord Krishna Death Story in hindi

  1. Shri radhe govind ki jay.
    बहुत अचछा वर्क हे ये आप का जहा आज हिंदू धर्म के लोग हि हिंदू धर्म के खिलाफ खडे है और उन सब को ये सब कल्पना मात्र लगता है उन्हे ये बताने के लिये जो भी था सच था उन प्रभू कि वजेह से हि इस दुनिया का अस्तित्व है |

  2. बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक भगवान श्री कृष्ण के परमधाम गमन की कथा पढ़कर धन्य हुआ, बहुत बहुत धन्यवाद

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