Krishna Sudama story in hindi part 1

Krishna Sudama story in hindi part 1

 कृष्ण सुदामा कहानी पार्ट 1 

परीक्षित(Parikshit) जी महाराज शुकदेव(Sukhdev) जी से पूछते है अगर द्वारिका में की किसी भक्त पर कृपा हुई हो तो सुनाइए।

शुकदेव जी कहते है राजन मैं आपको परम भक्त की कथा सुनाऊंगा। सुदामा(sudama) भक्त कृष्ण के परम मित्र(friend) थे। ये ब्रह्मज्ञानी, विषयों से विरक्त, शांतचित्त और जितेन्द्रिय थे। लेकिन बहुत गरीब थे। लेकिन दरिद्र नही थे।लोग सोचते हैं की जो गरीब हैं तो दरिद्र हैं पर गुरुदेव कहते हैं नही! नही! दरिद्रता और निर्धनता में अंतर हैं। भगवान का भक्त गरीब हो सकता हैं , निर्धन हो सकता हैं पर दरिद्र नही हो सकता। क्योंकि दरिद्र व्यक्ति वो हैं जिसके पास सब कुछ हो लेकिन संतोष(santosh) न हो। शास्त्र की दृष्टि में दरिद्र वही हैं जिसके मन में सब कुछ होने पर भी संतोष नही हैं।

सुदामा जी को एक समय का भोजन भी ठीक से नही मिलता था। घर में दीवार तो हैं पर छत का ठिकाना नहीं हैं। टूटे फूटे पात्र थे। 3 -3 दिन तक अपनी पत्नी के साथ भूखे रहते थे। लेकिन कभी भगवान को शिकायत नही की। सुदामा जी की पत्नी(wife) का नाम सुशीला(Susheela) था। सुशीला ने एक कहा महाराज! घर में बच्चे भूखे हैं। मैं कैसे इनका पालन करूँ? और आप मुझे अपने मित्र कृष्ण की कथा सुनते हैं। तो आप कहते हैं मेरा मित्र द्वारिका का राजा हैं। तो आप अपने मित्र के द्वार पर मांगने क्यों नही जाते?

सुदामाजी ने कहा, सुशीला मर जाऊंगा लेकिन मांगने नही जाऊंगा। कैसे जाऊं? वो मेरा मित्र हैं।
सुशीला बोली ठीक हैं आप अपने मित्र से कुछ मांगने मत जाओ पर दर्शन तो करके आ जाओ और उनसे मिल आओ।

सुदामा जी महाराज कहते हैं ठीक हैं सुशीला मैं अपने मित्र कन्हैया से मिलने जरूर जाँऊगा। लेकिन घर में कुछ हैं क्या? जिसे अपने मित्र को भेंट कर सकूँ?

सुशीला ये जानती थी की घर में कुछ नही हैं। सारे पात्र खाली पड़े हैं। लेकिन फिर भी रसोई घर में गई। और चुपके से घर से निकली। चार घर गई और चार मुट्ठी चावल लेकर आई। सुदामा जी का एक फटा हुआ दुपट्टा था। जिस दुपट्टे की चार तय की। लेकिन फिर भी फटा हुआ हैं इतनी गरीबी हैं। चार की आठ तय की। और जैसे तैसे लपेटा। और सुदामा जी को विदा किया।

लेकर सुदामा जी महाराज जब चलने लगे तो मार्ग में सोचने लगते हैं की मैं एक गरीब हूँ और कृष्ण द्वारिका के राजा हैं। सहायद मेरा कन्हैया मुझे ना मिले।

लेकिन गुरुदेव कहते हैं भगवान की दृष्टि में पैसे का कोई महत्व नही हैं, धन का कोई महत्व नही हैं, बल का कोई महत्व नही हैं, कोई व्यक्ति ऊँचे औहदे पर हो उसका कोई महत्व नही हैं। उनकी दृष्टि में तो केवल और केवल भाव का महत्व हैं। बिना भाव रीझे नही नटवर नन्द किशोर। Bina bhaav rije nhi natwar nand kishore.

एक बार मन में आया की वापिस लौट चलूँ। फिर कहते हैं नही नही, मेरे प्रभु तो प्रेम की मूर्ति है। मैं उनसे मिलकर आऊंगा।  सुदामा जी को चलते चलते शाम हो गई। सुदामा जी एक पेड़ के नीचे बैठ गए रात्रि का प्रहार था तो भगवान को याद करते करते सो गए। इधर भगवान भी सुदामा को याद कर रहे थे।

गुरुदेव कहते है इस बात को अच्छी तरह याद रखना अगर तुम अपने आराध्य को याद करते हो तो भगवान भी अपने भक्त को याद करता है। ऐसा नही है की भगवान याद ना करे।

भगवान ने सोचा मेरा मित्र थक कर सो गया है और गहरी नींद  में है। भगवान ने योग माया को आज्ञा दी है की तुम जाओ और मेरे मित्र को द्वारिका में पहुँच दो।

योग माया ने भगवान को द्वारिका में पहुंचा दिया। जब सुबह हुई तो सुदामा जी ने देखा की चारों और महल ही महल खड़े है। सुदामा जी महाराज सोचते है की हम तो एक पेड़ के नीचे सोये थे लेकिन यहाँ तो महल ही महल है।

सुदामा जी ने राहगीर से पूछा की भैया, ये कोनसा नगर है। तो लोगो ने कहा ये द्वारिका है।
सुदामा बोली की ये द्वारिका है तो हमारे कन्हैया का मकान कोनसा है? राहगीरों ने मना कर दिया।
सुदामा जी सबसे पूछ रहे है लेकिन कोई नही बता रहा की कन्हैया का मकान कौनसा है।
दोपहर हो गई सुदामा जी को। सुदामा जी के पास एक यादव आये और बोले की हे ब्राह्मण देवता! मैं सुबह से देख रहा हूँ। आप किसका पता पूछ रहे है?

सुदामा जी बोले की यहाँ कोई मेरे मित्र कन्हैया का मकान नही जनता क्या?
वो बोला की ये सब महल आपके मित्र कृष्ण के है। आप जिस भी महल में जाओगे आपको आपके मित्र कन्हैया का ही दर्शन होगा। सबसे बड़ी रानी रुक्मणी जी है। आप वहां चले जाइये। सुदामा जी को बताकर वो चला गया।

अब सुदामा जी महाराज महल के दरवाजे पर पहुंचे है। द्वारपालों ने अंदर जाने से रोक दिया। अरे ब्राह्मण! आप कौन हो? कहाँ से आये हो? कहाँ जाओगे?
सुदामा जी कहते है भैया, आप अंदर जाकर कृष्ण से केवल इतना कह देना की तेरे बचपन का मित्र सुदामा मिलने आया है। मेरा कन्हैया सब कुछ समझ जायेगा। उसे ज्यादा बताने की आवश्यक्ता नहीं है।

द्वारपाल अंदर गया। भगवान सिंहासन पर बैठे है। उस द्वारपाल ने भगवान को प्रणाम किया और उसकी दीन दशा का वर्णन किया है।

सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोति फटी-सी लटी दुपटी अरु, पाँय उपानह की नहिं सामा॥
द्वार खड्यो द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकिसौं वसुधा अभिरामा।
पूछत दीन दयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा॥

seesh pagha n jhaga tann me prbhu, jaane ko aahi base kehi grama
dhoti fati si lati dupti aru, paay upanh ki nhi sama
dwar khadyo dwij durbal ek, ryo chakison vaudha abhi rama.
puchat deen dayal ko dhaam, btawat aapno naam sudama.

नरोत्तम(Narotam) नाम के कवि(kavi) ने सुदामा(sudama) जी की दशा का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। आप सभी भाव में डूबकर अर्थ समझिय-
द्वारपाल ने कहा की प्रभु द्वार पर एक ब्राह्मण खड़ा है, जिसके सर पर ना पगड़ी है और तन पर एक पुराना सा वस्त्र है। फटी हुई धोती है जिसकी हालत जीर्ण-शीर्ण है। और तो और पैरो में जूते, चप्पल भी नही हैं। जिसके पैरों में से बिवाइयां फट रही हैं। यहाँ के वैभव को देख कर आश्चर्यचकित हो रहा हैं। आपके बारे में पूछ रहा हैं और उसने अपना नाम सुदामा बताया हैं।

कृष्ण सुदामा कथा पार्ट 2: Krishan Sudama Part 2

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