Krishna Study and Guru Dakshina in hindi

Krishna Study and Guru Dakshina in hindi

कृष्ण विद्या अध्ययन और गुरु दक्षिणा

भगवान श्री कृष्ण ने अपने पिता नन्द बाबा को ग्वाल बालों के साथ ब्रज भेजा है। इसके बाद वसुदेवजी ने अपने पुरोहित गर्गाचार्य तथा दूसरे ब्राम्हणों से दोनों पुत्रों का विधिपूर्वक द्विजाति-समुचित यज्ञोपवीत संस्कार करवाया । उन्होंने विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषणों से ब्राम्हणों का सत्कार करके उन्हें बहुत-सी दक्षिणा तथा बछड़ों वाली गौएँ दीं। सभी गौएँ गले में सोने की माला पहले हुए थीं तथा और भी बहुत से आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रों की मालाओं से विभूषित थीं।

 

यदुवंश के आचार्य गर्गजी से संस्कार कराकर बलरामजी और भगवान श्रीकृष्ण द्विजत्व को प्राप्त हुए। उसका ब्रम्हचर्य अखण्ड तो था ही, अब उन्होंने गायत्रीपूवक अध्ययन करने के लिये उसे नियमतः स्वीकार किया । श्रीकृष्ण और बलराम जगत् के एकमात्र स्वामी हैं। सर्वज्ञ हैं। सभी विद्याएँ उन्हीं से निकली हैं। उनका निर्मल ज्ञान स्वतःसिद्ध है। फिर भी उन्होंने मनुष्य-सी लीला करके उसे छिपा रखा था ।

 

Sandipani Rishi ashram : संदीपनी ऋषि आश्रम

अब कृष्ण और बलराम दोनों ने संदीपनी मुनि के गुरुकुल आश्रम में प्रवेश किया है। वे दोनों भाई विधिपूर्वक गुरूजी के पास रहने लगे। उस समय वे बड़े ही सुसंयत, अपनी चेष्टाओं को सर्वथा नियमित रखे हुए थे। गुरूजी तो उनका आदर करते ही थे, भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी भी गुरु की उत्तम सेवा कैसे करनी चाहिये, इसका आदर्श लोगों के सामने रखते हुए बड़ी भक्ति से इष्टदेव के समान उनकी सेवा करने लगे । गुरुवर सान्दीपनिजी उनकी शुद्धभाव से युक्त सेवा से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने दोनों भाइयों को छहों अंग और उपनिषदों के सहित सम्पूर्ण वेदों की शिक्षा दी ।
इनके सिवा मन्त्र और देवताओं के ज्ञान के साथ धनुर्वेद, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र, मीमांसा आदि, वेदों का तात्पर्य बतलाने वाले शास्त्र, तर्कविद्या (न्यायशास्त्र) आदि की भी शिक्षा दी। साथ ही सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्विध और आश्रय—इन छः भेदों से युक्त राजनीति का भी अध्ययन कराया । परीक्षित्! भगवान श्रीकृष्ण और बलराम सारी विद्याओं के प्रवर्तक हैं। इस समय केवल श्रेष्ठ मनुष्य का—सा व्यवहार करते हुए ही वे अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने गुरूजी के केवल एक बार कहने मात्र से सारी विद्याएँ सीख लीं । केवल चौंसठ दिन-रात में ही संयमीशिरोमणि दोनों भाइयों ने चौंसठो कलाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया।

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Sandipani muni Guru Dakshina  :  संदीपनी मुनि गुरु दक्षिणा

विद्या अध्ययन समाप्त होने पर कृष्ण-बलराम ने सान्दिपनी मुनि से प्रार्थना की कि ‘आपकी जो इच्छा हो, गुरु-दक्षिणा माँग लें’ ।

 

सान्दिपनी मुनि ने अपनी पत्नी से सलाह करके यह गुरुदक्षिणा माँगी कि ‘प्रभासक्षेत्र में हमारा बालक समुद्र में डूबकर मर गया था, उसे तुम लोग ला दो’ ।

 

बलरामजी और श्रीकृष्ण दोनों ही महारथी गुरूजी की आज्ञा मानकर रथपर सवार होकर प्रभासक्षेत्र में गये। वे समुद्र तट जाकर क्षणभर बैठे रहे। उस समय यह जानकार कि ये साक्षात् परमेश्वर हैं, अनेक प्रकार की पूजा-सामग्री लेकर समुद्र उनके सामने उपस्थित हुआ । भगवान ने समुद्र से कहा—‘समुद्र! तुम यहाँ अपनी बड़ी-बड़ी तरंगों से हमारे जिस गुरुपुत्र को बहा ले गये थे, उसे लाकर शीघ्र हमें दो’ ।

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