Krishna Rukmani vivah story in hindi

Krishna Rukmani vivah story in hindi

कृष्ण रुक्मणी विवाह कथा/कहानी 

राजा परीक्षित् ने शुकदेव मुनि से पूछा- भगवन्! हमने सुना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भीष्मक नन्दिनी परमसुन्दरी रुक्मिणी देवी को बलपूर्वक हरण करके राक्षसविधि से उनके साथ विवाह किया था। क्योंकि भगवान की लीला सुनते सुनते मेरे कान तृप्त नही हो रहे हैं। भला ऐसा कौन रसिक, कौन मर्मज्ञ है, जो उन्हें सुनकर तृप्त न हो जाय।

 

शुकदेव जी महराज कहते हैं — परीक्षित्! महाराज भीष्मक विदर्भदेश के अधिपति थे। उनके पाँच पुत्र और एक सुन्दरी कन्या थी । सबसे बड़े पुत्र का नाम था रुक्मी और चार छोटे थे—जिनके नाम थे क्रमशः रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्ममाली। इनकी बहिन थीं सती रुक्मिणी।

 

ये रुक्मणी भगवान की कथा और लीला को सुनते-सुनते ही बड़ी हुई थी। ये अपने पिता के साथ जाकर सत्संग में बैठ जाती थी। और भगवान की लीलाओं का आनंद लेती थी। तभी से इनके मन में कृष्ण के प्रति प्रेम जाग्रत हो गया और इन्होने कृष्ण जी को मन में अपना पति स्वीकार कर लिया।

 

भगवान श्रीकृष्ण भी समझते थे कि ‘रुक्मिणी में बड़े सुन्दर-सुन्दर लक्षण हैं, वह परम बुद्धिमती है; उदारता, सौन्दर्य, शीलस्वभाव और गुणों में भी अद्वितीय है। इसलिये रुक्मिणीजी ही मेरे अनुरूप पत्नी है। अतः भगवान ने रुक्मिणीजी से विवाह करने का निश्चय किया । रुक्मिणीजी के भाई-बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहिन का विवाह श्रीकृष्ण से ही हो। परन्तु रुक्मी श्रीकृष्ण से बड़ा द्वेष रखता था, उसने उन्हें विवाह करने से रोक दिया और शिशुपाल को ही अपनी बहिन के योग्य समझा।

Rukmani Letter to Krishna : रुक्मणी का विश्वास पत्र कृष्ण के लिए

रुक्मिणी को जब इस बात का पता चला कि मेरा बड़ा भाई रुक्मी शिशुपाल के साथ मेरा विवाह करना चाहता है, तब वे बहुत उदास हो गयीं। उन्होंने बहुत कुछ सोंच-विचारकर एक विश्वास-पात्र ब्राम्हण को तुरंत श्रीकृष्ण के पास भेजा ।

 

जब वे ब्राम्हण-देवता द्वारकापुरी में पहुँचे तब द्वारपाल उन्हें राजमहल के भीतर ले गये। वहाँ जाकर ब्राम्हण-देवता ने देखा कि आदिपुरुष भगवान श्रीकृष्ण सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं । ब्राम्हणों के परमभक्त भगवान श्रीकृष्ण उन ब्राम्हणदेवता को देखते ही अपने आसन से नीचे उतर गये और उन्हें अपने आसन पर बैठाकर वैसी ही पूजा की जैसे देव्तालोग उनकी (भगवान की) किया करते हैं । आदर-सत्कार, और भोजन करवाने के बाद श्री कृष्ण जी अपने कोमल हाथों से उनके पैर सहलाते हुए बड़े शान्त भाव से पूछने लगे-

 

आपका मन बहुत शांत हैं, और संतो का मन शांत होता है। जिसके मन में संतोष है वो ही संत है। इसलिए हे ब्राह्मण देव! आप किस प्रयोजन से यहाँ पर पधारे हैं। श्रीकृष्ण ने जब इस प्रकार ब्राम्हण देवता से पूछा, तब उन्होंने सारी बात कह सुनायी। वे कहते हैं –

 

रुक्मिणीजी ने कहा है—त्रिभुवनसुन्दर! आपके गुणों को, जो सुनने वालों के कानों के रास्ते ह्रदय में प्रवेश करके एक-एक अंग के ताप, जन्म-जन्म की जलन बुझा देते हैं तथा अपने रूप-सौन्दर्य को जो नेत्रवाले जीवों के नेत्रों के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थों के फल एवं स्वार्थ-परमार्थ, सब कुछ हैं, श्रवण करके प्यारे अच्युत! मेरा चित्त लज्जा, शर्म सब कुछ छोड़कर आपमें ही प्रवेश कर रहा है । प्रेमस्वरुप श्यामसुन्दर! चाहे जिस दृष्टि से देखें; कुल, शील, स्वभाव, सौन्दर्य, विद्या, अवस्था, धन-धाम—सभी में आप अद्वितीय हैं, अपने ही समान हैं। मनुष्यलोक में जितने भी प्राणी हैं, सबका मन आपको देखकर शान्ति का अनुभव करता है, आनन्दित होता है। अब पुरुषभूषण! आप ही बतलाइये—ऐसी कौन-सी कुलवती महागुणी और धर्यवती कन्या होगी, जो विवाह के योग्य समय आने पर आपको ही पति के रम में वरण न करेगी ? इसीलिये प्रियतम! मैंने आपको पतिरूप से वरण किया है।

 

मैं आपको आत्मसमर्पण कर चुकी हूँ। आप अन्तर्यामी हैं। मेरे ह्रदय की बात आपसे छिपी नहीं हैं। आप यहाँ पधार कर मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कीजिये। कमलनयन! प्राणवल्लभ! मैं आप-सरीखे वीर को समर्पित हो चुकी हूँ, आपकी हूँ। अब जैसे सिंह का भाग सियार छू जाय, वैसे कहीं शिशुपाल निकट से आकर मेरा स्पर्श न कर जाय । मैंने यदि जन्म-जन्म में पूर्त (कुआँ, बावली आदि खुदवाना), इष्ट (याज्ञादि करना), दान, नियम, व्रत तथा देवता, ब्राम्हण और गुरु आदि की पूजा के द्वारा भगवान परमेश्वर की ही आराधना की हो और वे मुझ पर प्रसन्न हों तो भगवान श्रीकृष्ण आकर मेरा पाणिग्रहण करें; शिशुपाल अथवा दूसरा कोई भी पुरुष मेरा स्पर्श न कर सके ।

 

जिस दिन मेरा विवाह होने वाला हो उसके एक दिन पहले आप हमारी राजधानी में गुप्त रूप से आ जाइये और फिर बड़े-बड़े सेनापतियों के साथ शिशुपाल तथा जरासन्ध की सेनाओं को मथ डालिये, तहस-नहस कर दीजिये और बलपूर्वक राक्षस-विधि से वीरता का मूल्य देकर मेरा पाणिग्रहण कीजिये ।

 

यदि आप यह सोचते हों कि ‘तुम तो अन्तःपुर में—भीतर के जनाने महलों में पहरे के अंदर रहती हो, तुम्हारे भाई-बंधुओं को मारे बिना मैं तुम्हें कैसे ले जा सकता हूँ ?’ तो इसका उपाय मैं आपको बतलाये देती हूँ। हमारे कुल का ऐसा नियम है कि विवाह के पहले दिन कुलदेवी का दर्शन करने के लिये एक बहुत बड़ी यात्रा होती है, जुलूस निकलता है—जिसमें विवाहि जाने वाली कन्या को, दुलहिन को नगर के बाहर गिरिजादेवी के मन्दिर में जाना पड़ता है । कमलनयन! उमापति भगवान शंकर के समान बड़े-बड़े महापुरुष भी आत्माशुद्धि के लिये आपके चरणकमलों की धूल से स्नान करना चाहते हैं। यदि मैं आपका वह प्रसाद, आपकी चरणधूल नहीं प्राप्त कर सकी तो व्रत द्वारा शरीर को सुखाकर प्राण छोड़ दूँगी। चाहे उसके लिये सैकड़ों जन्म क्यों ने लेने पड़े, कभी-न-कभी तो आपका वह प्रसाद अवश्य ही मिलेगा ।

 

ब्राम्हणदेवता ने कहा—यदुवंशशुरोमणे! यही रुक्मिणी के अत्यन्त गोपनीय सन्देश हैं, जिन्हें लेकर मैं आपके पास आया हूँ। इसके सम्बन्ध में जो कुछ करना हो, विचार कर लीजिये और तुरंत ही उसके अनुसार कार्य कीजिये ।

Krishna Love to Rukmani : कृष्ण का रुक्मणी के लिए प्रेम

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान श्रीकृष्ण ने विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणीजी का यह सन्देश सुनकर अपनी हाथ से ब्राम्हण देवता का हाथ पकड़ लिया और हँसते हुए यों बोले- ब्राम्हण देवता! जैसे विदर्भ राजकुमारी मुझे चाहती हैं, वैसे ही मैं भी उन्हें चाहता हूँ। मेरा चित्त उन्हीं में लगा रहता है। आप रुक्मणी को कह देना कि वो चिंता ना करे, मैं वहां आऊंगा और रुक्मणी को लेकर जाऊंगा।

 

मधुसूदन श्रीकृष्ण ने यह जानकर कि रुक्मिणी के विवाह की लग्न परसों रात्रि ही है, सारथि को आज्ञा दी कि ‘दारुक! तनिक भी विलम्ब न करके रथ जोत लाओ’। दारुक भगवान के रथ में शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलवाहक नाम के चार घोड़े जोतकर उसे ले आया और हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़ा हो गया । शूरनन्दन श्रीकृष्ण ब्राम्हण देवता को पहले रथ पर चढ़ाकर फिर आप भी सवार हुए और उन शीघ्रगामी घोड़ों के द्वारा एक ही रात में आनर्त-देह से विदर्भ देश में जा पहुँचे।

 

वहां पर  विवाहोत्सव की तैयारी जोर शोर से चल रही थी। हर जगह आनंद ही आनंद और खुशियां ही खुशियां बिखरी हुई थी। राजा भीष्मक ने पितर और देवताओं का विधिपूर्वक पूजन करके ब्राम्हणों को भोजन कराया और नियमानुसार स्वस्तिवाचन भी । रुक्मणी जी का अद्भुत सौंदर्य है। जिसका वर्णन करते नही बनता। सुंदर वस्त्र और सुंदर आभूषण रुक्मणी जी ने धारण किये हुए हैं।

 

इसी प्रकार चेदिनरेश राजा दमघोष ने भी अपने पुत्र शिशुपाल के लिये मन्त्रज्ञ ब्राम्हणों से अपने पुत्र के विवाह-सम्बन्धी मंगलकृत्य कराये। इसके बाद वे मद चुआते हुए हाथियों, सोने की मालाओं से सजाये हुए रथों, पैदलों तथा घुड़सवारों की चतुरंगिणी सेना साथ लेकर कुण्निपुर जा पहुँचे । विदर्भराज भीष्मक ने आगे आकर उनका स्वागत-सत्कार और प्रथा के अनुसार अर्चन-पूजन किया। इसके बाद उन लोगों को पहले से ही निश्चित किये हुए जनवासों में आनन्दपूर्वक ठहरा दिया । उस बारात में शाल्व, जरासन्ध, दन्तवक्त्र, विदूरथ और पौण्ड्रक आदि शिशुपाल के सहस्त्रों मित्र नरपति आये थे । वे सब राजा श्रीकृष्ण और बलरामजी के विरोधी थे और राजकुमारी रुक्मिणी शिशुपाल को ही मिले, इस विचार से आये थे। उन्होंने अपने-अपने मन में यह पहले से ही निश्चय कर रखा था कि यदि श्रीकृष्ण बलराम आदि यदुवंशियों के साथ आकर कन्या को हरने की चेष्टा करेगा तो हम सब मिलकर उससे लड़ेंगे। यही कारण था कि उन राजाओं ने अपनी-अपनी पूरी सेना और रथ, घोड़े, हाथी आदि भी अपने साथ ले लिये थे ।

 

जब बलरामजी को इस बात का पता लग गया कि भैया श्रीकृष्ण अकेले ही राजकुमारी का हरण करने के लिये चले गये हैं, तब उन्हें वहाँ लड़ाई-झगड़े की बड़ी आशंका हुई। क्योंकि वहां तो बड़े-बड़े राजा आये हुए होंगे। भाई के प्रेम के कारण वे तुरंत ही हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों की बड़ी भारी चतुरंगिणी सेना साथ लेकर कुण्डिनपुर के लिये चल पड़े ।

 

इधर परमसुन्दरी रुक्मिणीजी भगवान श्रीकृष्ण के शुभागमन की प्रतीक्षा कर रही थीं। उन्होंने देखा श्रीकृष्ण की तो कौन कहे, अभी ब्राम्हण देवता भी नहीं लौटे! तो वे बड़ी चिन्ता में पड़ गयीं; सोचने लगीं। रुक्मणी जी मन ही मन कहती हैं- केवल एक रात बची हुई है लेकिन कृष्ण अब तक नही आये। और वो ब्राह्मण देव भी अब तक नही आये। लगता है मेरा भाग्य ही मंद है। भगवान शंकर भी मेरे अनुकूल नहीं जान पड़ते। यह भी सम्भव है कि रूद्रपत्नी गिरिराजकुमारी सती पार्वतीजी मुझसे अप्रसन्न हों’।

 

जब रुक्मणी ये सब सोच रही थी तब श्रीकृष्ण के भेजे हुए वे ब्राम्हण-देवता आ गये और उन्होंने अन्तःपुर में राजकुमारी रुक्मिणी को इस प्रकार देखा, मानो कोई ध्यानमग्न देवी हो । ब्राह्मण ने कहा- ‘राजकुमारीजी! आपको ले जाने की उन्होंने सत्य प्रतिज्ञा की है’।

आज जब रुक्मणी जी ने ये बात सुनी तो उनकी खुशी का ठिकाना नही रहा। उन्होंने इसके बदले में ब्राम्हण के लिए भगवान के अतिरिक्त और कुछ प्रिय न देखकर उन्होंने केवल नमस्कार कर लिया। अर्थात् जगत् कि समग्र लक्ष्मी ब्राम्हण देवता को सौंप दी ।

 

राजा भीष्मक ने सुना कि भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी मेरी कन्या का विवाह देखने के लिये उत्सुकतावश यहाँ पधारे हैं। तो इन्होने भगवान का बहुत स्वागत किया है। वहां पर जितने  विदर्भ देश के नागरिक हैं सभी चाहते हैं कि भगवान का विवाह रुक्मणी के साथ ही हो।  वे आपस में इस प्रकार बातचीत करते थे—रुक्मिणी इन्हीं की अर्द्धांगिनी होने के योग्य हैं, और ये परम पवित्रमूर्ति श्यामसुन्दर रुक्मिणी के ही योग्य पति हैं। दूसरी कोई इनकी पत्नी होने के योग्य नहीं है । यदि हमने अपने पूर्वजन्म या इस जन्म में कुछ भी सत्कर्म किया हो तो त्रिलोक-विधाता भगवान हम पर प्रसन्न हों और ऐसी कृपा करें कि श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण ही विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणी का पाणिग्रहण करें’ ।

 

जिस समय प्रेम-परवश होकर पुरवासी-लोग परस्पर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, उसी समय रुक्मिणीजी अन्तःपुर से निकलकर देवीजी के मन्दिर के लिये चलीं। बहुत-से सैनिक उनकी रक्षा में नियुक्त थे । वे प्रेममूर्ति श्रीकृष्णचन्द्र के चरणकमलों का चिन्तन करती हुई भगवती भवानी के पाद-पल्लवों का दर्शन करने के लिये पैदल ही चलीं । वे स्वयं मौन थीं और माताएँ तथा सखी-सहेलियाँ सब ओर से उन्हें घेरे हुए थीं। शूरवीर राजसैनिक हाथों में अस्त्र-शस्त्र उठाये, कवच पहने उनकी रक्षः कर रहे थे। उस समय मृदंग, शंख, ढोल, तुरही और भेरी आदि बाजे बज रहे थे ।

 

रुक्मणजी जी ने अम्बिकादेवी के मन्दिर में प्रवेश किया । बहुत-सी विधि-विधान जानने वाली बड़ी-बूढ़ी ब्रम्हाणियाँ उनके साथ थीं। उन्होंने भगवान शंकर की अर्द्धांगिनी भवानी को और भगवान शंकरजी को भी रुक्मिणीजी से प्रणाम करवाया । रुक्मिणीजी ने भगवती से प्रार्थना की—‘अम्बिकामाता! आपकी गोद में बैठे हुए आपके प्रिय पुत्र गणेशजी को तथा आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूँ। आप ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि मेरी अभिलाषा पूर्ण हो। भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों’। इसके बाद रुक्मिणीजी ने जल, गन्ध, अक्षत, धूप, वस्त्र, पुष्पमाला, हार, आभूषण, अनेकों प्रकार के नैवेद्य, भेंट और आरती आदि सामग्रियों से अम्बिकादेवी की पूजा की । तदनन्तर उक्त सामग्रियों से तथा नमक, पुआ, पान, कण्ठसूत्र, फल और ईख से सुहागिनी ब्रम्हाणियों की भी पूजा की। तब ब्राम्हणियों ने उन्हें प्रसाद देकर आशीर्वाद दिये और दुलहिन ने ब्राम्हणियों और माता अम्बिका को नमस्कार करके प्रसाद ग्रहण किया ।

 

पूजा-अर्चाकी विधि समाप्त हो जाने पर उन्होंने मौनव्रत तोड़ दिया और रत्नजटित अँगूठी से जगमगाते हुए कर कमल के द्वारा एक सहेली का हाथ पकड़ कर वे गिरिजामन्दिर से बाहर निकलीं।

 

रुक्मिणीजी इस प्रकार इस उत्सवयात्रा के बहाने मन्द-मन्द गति से चलकर भगवान श्रीकृष्ण पर अपना राशि-राशि सौन्दर्य निछावर कर रही थीं। उन्हें देखकर बड़े-बड़े नरपति एवं वीर इतने मोहित और बेहोश हो गये कि उनके हाथों से अस्त्र-शस्त्र छूटकर गिर पड़े और वे स्वयं भी रथ, हाथी तथा घोड़ों से धरती पर आ गिरे । इस प्रकार रुक्मिणीजी भगवान श्रीकृष्ण के शुभागमन की प्रतीक्षा करती हुई अपने कमल की कली के समान सुकुमार चरणों को बहुत ही धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहीं थीं। उन्होंने अपने बायें हाथ की अँगुलियों से मुख की ओर लटकती हुई अलकें हटायीं और वहाँ आये हुए नरपतियों की ओर जलीजी चितवन से देखा।

अगले पेज पर जाइये

5 thoughts on “Krishna Rukmani vivah story in hindi

    • Krishna ji loves both, and i want to say krishna ji loves to all, everyone. फिर भी को बड़ छोट कहत अपराधू। किससे प्रेम कम है और किससे ज्यादा, कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.