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Krishna returned Devaki Sons Story in Hindi

Krishna returned Devaki Sons Story in Hindi

कृष्ण द्वारा देवकी के पुत्रों को लौटना 

 

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी प्रातःकालीन प्रणाम करने के लिये माता-पिता के पास गये। प्रणाम कर लेने पर वसुदेवजी ने  कहा – ‘सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! महायोगीश्वर संकर्षण! तुम दोनों सनातन हो। मैं जानता हूँ कि तुम दोनों सारे जगत् के साक्षात् कारणस्वरूप प्रधान और पुरुष के भी नियामक परमेश्वर हो।  ऐसा कहकर वसुदेव ने सुंदर स्तुति की है।

 

 भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—पिताजी! हम तो आपके पुत्र ही हैं। इस समय देवकी जी भी यहीं बैठी थी। उन्हें अपने उन पुत्रों की याद आ गयी, जिन्हें कंस ने मार डाला था। और उन्हें याद करके देवकी की आखों में आंसू आ गए।  देवकीजी ने कृष्ण -बलराम से कहा- तुम्हारी शक्ति मन और वाणी के परे हैं। श्रीकृष्ण! तुम योगेश्वरों के भी ईश्वर हो। मैं जानती हूँ की तुम दोनों प्रजापतियों के भी ईश्वर, आदिपुरुष नारायण हो। आज मैं तुम्हारी शरण में हूँ। मैंने सुना है की तुम्हारे गुरु सान्दीपनि जी के पुत्र को मरे बहुत दिन हो गये थे। उनको गुरुदक्षिणा देने के लिये उनकी आज्ञा तथा काल की प्रेरणा से तुम दोनों ने उनके पुत्र को यमपुरी से वापस ला दिया। इसलिये आज मेरी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं चाहती हूँ की तुम दोनों मेरे उन पुत्रों को, जिन्हें कंस ने मार डाला था, ला दो और उन्हें मैं भर आँख देख लूँ।

 

माँ की बात सुनते ही कृष्ण और बलराम ने योगमाया का आश्रय लेकर सुतल लोक में प्रवेश किया। राजा बलि ने देखा की जगत की आत्मा और मेरे स्वामी कृष्ण-बलराम आये हैं तब उनका हृदय उनके दर्शन के आनन्द में निमग्न हो गया। उन्होंने झटपट अपने परिवार के साथ आसन से उठकर भगवान के चरणों में प्रणाम किया। फिर दैत्यराज बलि ने भगवान को आसान पर बिठाया है और भगवान के चरण धोकर उनके चरणामृत का सपरिवार पान किया है। फिर भगवान की सुंदर पूजा की है और भगवान की स्तुति की है।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—‘दैत्यराज! स्वायम्भुव मन्वन्तर में प्रजापति मरीचि की पत्नी उर्णा के गर्भ से छः पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी देवता थे। वे यह देखकर की ब्रह्माजी अपनी पुत्री से समागम करने के लिये उद्दत हैं, हँसने लगे । इस परिहासरूप अपराध के कारण उन्हें ब्रह्माजी ने शाप दे दिया और वे असुर-योनि में हिरण्यकशिपु के पुत्र रूप से उत्पन्न हुए। अब योगमाया ने उन्हें वहाँ से लाकर देवकी के गर्भ में रख दिया और उनको उत्पन्न होते ही कंस ने मार डाला। दैत्यराज! माता देवकीजी अपने उन पुत्रों के लिये अत्यन्त शोकातुर हो रही हैं और वे तुम्हारे पास हैं । अतः हम अपनी माता का शोक दूर करने के लिये उन्हें यहाँ से ले जायँगे। इसके बाद ये शाप से मुक्त हो जायँगे और आनन्दपूर्वक अपने लोक में चले जायँगे । इनके छः नाम हैं—स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतंग, क्षुद्रभृत् और घृणि। उन्हें मेरी कृपा से पुनः सद्गति पाप्त होगी’ ।

 

भगवान ने इतना कहा और चुप हो गये। दैत्यराजबलि ने उनकी पूजा की और उन बालकों को भगवान को लौटा दिया ; इसके बाद श्रीकृष्ण और बलरामजी बालकों को लेकर फिर द्वारका लौट आये तथा माता देवकी को उनके पुत्र सौंप दिये ।

 

 माता देवकी ने पुत्रों को ह्रदय से लगा लिया, उन्हें खूब लाड प्यार किया और देवकी जी ने उनको स्तन-पान कराया। जो दूध कृष्ण-बलराम ने पिया था वही उन बालकों ने पिया। उस दूध के पीने से भगवान श्रीकृष्ण के अंगों का स्पर्श होने से उन्हें आत्मसाक्षात्कार हो गया । इसके बाद लोगों ने भगवान श्रीकृष्ण, माता देवकी, पिता वसुदेव और बलरामजी को नमस्कार किया। तदनन्तर सबके सामने ही वे देवलोक में चले गये ।

 

देवकी यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो गयीं की मरे हुए बालक लौट आये और फिर चले भी गये। उन्होंने ऐसा निश्चय किया की यह श्रीकृष्ण का ही कोई लीला-कौशल है ।

 

शुकदेव  जी कहते हैं- परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण स्वयं परमात्मा हैं, उनकी शक्ति अनन्त हैं। उनके ऐसे-ऐसे अद्भुत चरित्र इतने हैं की किसी प्रकार उनका पार नहीं पाया जा सकता ।

 

सूतजी कहते है—शौनकादि ऋषियों! भगवान श्रीकृष्ण की कीर्ति अमर है, अमृतमयी है। उनका चरित्र जगत् के समस्त पाप-तापों को मिटाने वाला तथा भक्तजनों के कर्णकुहरों में आनन्दसुधा प्रवाहित करने वाला है। इसके वर्णन स्वयं व्यासनन्दन भगवान श्रीशुकदेवजी ने किया है। जो इसका श्रवण करता है अथवा दूसरों को सुनाता है, उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति भगवान में लग जाती है और वह उन्हीं के परम कल्याणस्वरूप धाम को प्राप्त होता है ।

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