Krishna meet(milan) with Devki Vasudev

Krishna meet(milan) with Devki Vasudev 

कृष्ण का देवकी और वसुदेव से मिलन

 

भगवान ने कंस का संहार किया है। उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी ने जेल में जाकर अपने माता(देवकी)पिता(वसुदेव) को बन्धन से छुड़ाया और सिर से स्पर्श करके उनके चरणों की वन्दना की ।  लेकिन कृष्ण बलराम के प्रणाम करने के बाद भी  देवकी और वसुदेव ने उन्हें भगवान समझकर अपने ह्रदय से नहीं लगाया। उन्हें शंका हो गयी कि हम भगवान को पुत्र कैसे समझें।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि माता-पिता को मेरे ऐश्वर्य का, मेरे भगवान होने का ज्ञान हो गया है, परन्तु ये ठीक नहीं है, (इससे तो ये पुत्र-स्नेह का सुख नहीं पा सकते) ऐसा सोचकर उन्होंने उनपर अपनी वह योगमाया फैला दी, जो उनके स्वजनों को मुग्ध रखकर उनकी लीला में सहायक होती है।

 

फिर भगवान श्रीकृष्ण-बलरामजी के साथ अपने माँ-बाप के पास जाकर आदरपूर्वक झुककर बोले – ‘मेरी अम्मा! मेरे पिताजी!’ इन शब्दों से उन्हें प्रसन्न करते हुए कहने लगे— ‘पिताजी! माताजी! हम आपके पुत्र हैं और आप हमारे लिये सर्वदा उत्कण्ठित रहे हैं, फिर भी आप हमारे बाल्य, पौगण्ड और किशोर-अवस्था का सुख हमसे नहीं पा सके । दुदैववश हमलोगों को आपके पास रहने का सौभाग्य ही नहीं मिला। इसी से बालकों को माता-पिता के घर में रहकर जो लाड़-प्यार का सुख मिलता है, वह हमें भी नहीं मिल सका ।

 

पिता और माता ही इस शरीर को जन्म देते हैं और इसका लालन-पालन करते हैं। तब कहीं जाकर यह शरीर धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्ष की प्राप्ति का साधन बनता है। यदि कोई मनुष्य सौ वर्ष तक जीकर माता और पिता की सेवा करता रहे, तब भी वह उनके उपकार से उऋण नहीं हो सकता । जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ-बाप की शरीर और धन से सेवा नहीं करता, उसके मरने पर यमदूत उसे उसके अपने शरीर का मांस खिलाते हैं । जो पुरुष समर्थ होकर भी बूढ़े माता-पिता, सती पत्नी, बालक, सन्तान, गुरु, ब्राम्हण और शरणागत का भरण-पोषण नहीं करता—वह जीता हुआ भी मुर्दे के समान ही है! ।

 

पिताजी! हमारे इतने दिन बेकार ही बीत गये। क्योंकि कंस के भय से सदा उद्विग्नचित रहने कारण हम आपकी सेवा करने में असमर्थ रहे।  मेरी माँ और मेरे पिताजी! आप दोनों हमें क्षमा करें। हाय! दुष्ट कंस ने आपको इतने-इतने कष्ट दिये, परन्तु हम परतन्त्र रहने के कारण आपकी कोई सेवा-शुश्रूषा न कर सके’ ।

 

भगवान के मीठी वाणी से मोहित होकर देवकी-वसुदेव ने उन्हें गोद में उठा लिया और ह्रदय से चिपकाकर परमानन्द प्राप्त किया। और उनकी आँखों से प्रेमअश्रु गिरने लगे। आँसुओं के कारण गला रूँध जाने से वे कुछ बोल भी न सके ।

 

देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार अपने माता-पिता को सान्त्वना देकर अपने नाना उग्रसेन को यदुवंशियों का राजा बना दिया । और उनसे कहा—‘महाराज! हम आपकी प्रजा हैं। आप हम लोगों पर शासन कीजिये। राजा ययाति का शाप होने के कारण यदुवंशी राजसिंहसन पर नहीं बैठ सकते; (परन्तु मेरी ऐसी ही इच्छा है, इसलिये आपको दोष न होगा । जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे।’ दूसरे नरपतियों के बारे में तो कहना ही क्या है ।

 

जो कंस के भय से व्याकुल होकर इधर-उधर भाग गये थे, उन यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दशार्ह और कुकुर आदि वंशों में उत्पन्न सजातीय सम्बन्धियों को ढूँढ-ढूँढ़कर बुलवाया।  भगवान ने उनका सत्कार किया, सान्त्वना दी और उन्हें ख़ूब धन-सम्पत्ति देकर तृप्त किया तथा अपने-अपने घरों में बसा दिया । अब सारे-के-सारे यदुवंशी भगवान श्रीकृष्ण तथा बलरामजी के बाहुबल से सुरक्षित थे। उनकी कृपा से उन्हें किसी प्रकार की व्यथा नहीं थी, दुःख नहीं था। मथुरा के वृद्ध पुरुष भी युवकों के समान अत्यन्त बलवान् और उत्साही हो गये थे; क्योंकि वे अपने नेत्रों के दोनों से बारंबार भगवान के मुखारविन्द का अमृतमय मकरन्द-रस पान करते रहते थे ।

 

देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ही नन्दबाबा के पास आये और गले लगने के बाद उनसे कहने लगे— ‘पिताजी! अपने और माँ यशोदा ने बड़े स्नेह और दुलार से हमारा लालन-पालन किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माता-पिता सन्तान पर अपने शरीर से भी अधिक स्नेह करते हैं। जिन्हें पालन-पोषण न कर सकने के कारण स्वजन-सम्बन्धियों ने त्याग दिया है, उन बालकों को जो लोग अपने पुत्र के समान लाड़-प्यार से पालते हैं, वे ही वास्तव में उनके माँ-बाप हैं । पिताजी! अब आप लोग व्रज में जाइये।

 

मैं जानता हूँ की आपको मेरे और बलराम के बिना ब्रज लौटने से बहुत दुःख होगा। लेकिन हम बाद में आपसे मिलने आएंगे। भगवान श्रीकृष्ण ने नन्दबाबा और दूसरे व्रजवासियों को इस प्रकार समझा-बुझाकर बड़े आदर के साथ वस्त्र, आभूषण और अनेक धातुओं के बने बरतन आदि देकर उनका सत्कार किया । भगवान बात सुनकर नन्दबाबा ने प्रेम से अधीर होकर दोनों भाइयों को गले लगा लिया और फिर नेत्रों में आँसू भरकर गोपों के साथ व्रज के लिये प्रस्थान किया ।

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