Krishna Mathura Gaman Leela

Krishna Mathura Gaman Leela

कृष्ण मथुरा गमन लीला

अक्रूर जी ब्रज में कंस के आदेश पर कृष्ण और बलराम को लेने के लिए आये हैं।

 

Gopi Dasha Krishna Mathura gaman ke samay : गोपी दशा कृष्ण के मथुरा गमन के समय 

जब गोपियों ने सुना कि हमारे मनमोहन श्यामसुन्दर और गौरसुन्दर बलरामजी को मथुरा ले जाने के लिये अक्रूरजी व्रज में आये हैं तब उनके ह्रदय में बड़ी व्यथा हुई। वे व्याकुल हो गयीं।

 

गोपियाँ ऐसे चिंतित हो गई की उनका सब कुछ आज लूटने जा रहा है। गोपियाँ समाधिस्थ—आत्मा में स्थित हो गयी हों, और उन्हें अपने शरीर और संसार का कुछ ध्यान ही न रहा। गोपियों का सब कुछ भगवान के प्रति समर्पित था। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। वे झुंड-के-झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं।

 

गोपियाँ कहती हैं- हे विधाता तुम धन्य हो! कैसी लीला है तुम्हारी पहले तो तुम मिलते हो फिर अलग कर देते हो। तुम्हारा यह खिलवाड़ बच्चों के खेल की तरह व्यर्थ ही है। विधाता! तुमने एक बार तो हमें वह परम सुन्दर मुखकमल दिखाया और अब उसे ही हमारी आँखों से ओझल कर रह हो! सचमुच तुम्हारी यह करतूत बहुत ही अनुचित है । हम जानती हैं, इसमें अक्रूर का दोष नहीं है; यह तो साफ़ तुम्हारी क्रूरता है। वास्तव में तुम्हीं अक्रूर के नाम से यहाँ आये हो और अपनी ही दी हुई आँखें तुम हमसे मूर्ख की भाँति छीन रहे हो। इनके द्वारा हम श्यामसुन्दर के एक-एक अंग में तुम्हारी सृष्टि का सम्पूर्ण सौन्दर्य निहारती रहती थीं। विधाता! तुम्हें ऐसा नहीं चाहिये ।

 

हम तो अपने घर-द्वार, स्वजन-सम्बन्धी, पति-पुत्र आदि को छोड़कर इनकी दासीं बनीं और इन्हीं के लिये आज हमारा ह्रदय शोकातुर हो रहा है, परन्तु ये ऐसे हैं कि हमारी ओर देखते तक नहीं ।

 

जब हमारे व्रजराज श्यामसुन्दर अपनी तिरछी चितवन और मन्द-मन्द मुसकान से युक्त मुखारविन्द का मादक मधु वितरण करते हुए मथुरापुरी में प्रवेश करेंगे, अब वे उनका पान करके धन्य-धन्य हो जायँगी ।

 

एक सखी कहती है देखो सखी! यह अक्रूर कितना निष्ठुर, कितना ह्रदयहीन है। इधर तो हम गोपियाँ इतनी दुःखित हो रही हैं और यह हमारे परम प्रियतम नन्ददुलारे श्यामसुन्दर को हमारी आँखों से ओझल करके बहुत दूर ले जाना चाहता है और दो बात कहकर हमें धीरज भी नहीं बँधाता, आश्वासन भी नहीं देता। सचमुच ऐसे अत्यन्त क्रूर पुरुष का ‘अक्रूर’ नाम नहीं होना चाहिये था ।

 

हमारे ये श्यामसुन्दर भी तो कम निष्ठुर नहीं हैं। देखो-देखो, वे भी रथपर बैठ गये। और मतवाले गोपगण छकड़ों द्वारा उनके साथ जाने के लिये कितनी जल्दी मचा रहे हैं।

 

अरी सखी! हम आधे क्षण के लिये भी प्राणवल्लभ नन्दनन्दन का संग छोड़ने में असमर्थ थीं। आज हमारे दुर्भाग्य ने हमारे सामने उनका वियोग उपस्थित करके हमारे चित्त को विनष्ट एवं व्याकुल कर दिया है। उनके बिना हम उन्हीं की दी हुई अपार विरहव्यथा का पार कैसे पावेँगी ।

 

 

प्रतिदिन की बात है, सायंकाल में प्रतिदिन वे ग्वालबालों से घिरे हुए बलरामजी के साथ वन से गौएँ चराकर लौटते हैं। उनकी काली-काली घुँघराली अलकें और गले के पुष्पहार गौओं के खुर की रज से ढके रहते हैं। वे बाँसुरी बजाते हुए अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवन से देख-देखकर हमारे ह्रदय को बेध डालते हैं। उनके बिना भला, हम कैसे जी सकेंगी ?

 

 

माँ को सारी रात नींद नही आई। माँ भी इसी चिंता में डूबी रही की कृष्ण और बलराम अब चले जायेंगे। मेरी आँखों के तारे अब न जाने कब दिखाई देंगे। पूरी रात माँ की रोते-रोते बीत गई।

 

गोपियाँ भी इस प्रकार रो रहीं थीं! रोते-रोते सारी रात बीत गयी, सूर्योदय हुआ।

 

 

अक्रूरजी सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर रथपर सवार हुए और उसे हाँक ले चले । नन्दबाबा आदि गोपों ने भी दूध, दही, मक्खन, घी आदि से भरे मटके और भेंट की बहुत-सी सामग्रियाँ ले लीं तथा वे छकड़ों पर चढ़कर उनके पीछे-पीछे चले । इसी समय अनुराग के रँग में रँगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्ण के पास गयीं और उनकी चितवन, मुसकान आदि निरखकर कुछ-कुछ सुखी हुईं। अब वे अपने प्रियतम श्यामसुन्दर से कुछ सन्देश पाने की आकांक्षा से वहीँ खड़ी हो गयीं ।

 

 

यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरे मथुरा जाने से गोपियों के ह्रदय में बड़ी जलन हो रही है, वे सन्तप्त हो रही हैं, तब उन्होंने दूत के द्वारा ‘मैं आऊँगा’ यह प्रेम-सन्देश भेजकर उन्हें धीरज बँधाया । गोपियाँ रथ को जाते हुए एकटक निहार रही हैं। अब जब रथ दिखना बंद हो गया है तो रथ की ध्वजा को देख रही हैं और जब ध्वजा भी दिखनी बंद हो गई तो रथ के पहियों से उड़ती हुई धूल को गोपियाँ देख रही है। तब तक उनके शरीर चित्रलिखित-से वहीँ ज्यों-के-त्यों खड़े रहे। परन्तु उन्होंने अपना चित्त तो मनमोहन प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण के साथ ही भेज दिया था। अभी उनके मन में आशा थी कि शायद श्रीकृष्ण कुछ दूर जाकर लौट आयें! परन्तु जब नहीं लौटे, तब वे निराश हो गयीं और अपने-अपने घर चली आयीं। परीक्षित्! वे रात-दिन अपने प्यारे श्यामसुन्दर की लीलाओं का गान करती रहतीं और इस प्रकार अपने शोकसन्ताप को हल्का करतीं ।

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