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Krishna Marriage life Story in hindi

Krishna Marriage life Story in hindi

भगवान कृष्ण की गृहस्थ जीवन लीला 

 

नारद जी ने सुना की भगवान कृष्ण ने नरकासुर (भौमासुर) को मारकर 16108 रानियों के साथ विवाह कर लिया है तो नारद जी के मन में भगवान के गृहस्थ जीवन को देखने की इच्छा हुई। नारद जी वीणा उठाकर नारायण नारायण करते हुए भगवान के महल में पहुंच गए। भगवान जी का महल और आँगन और बाग़ बगीचे अति सुंदर हैं। भगवान की द्वारिका बनाने में विश्वकर्मा ने अपना सारा कला-कौशल, सारी कारीगरी लगा दी थी। महल की शोभा देखते हुए अंत में देवर्षि नारदजी ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण सबसे सुंदर महल की स्वामिनी रुक्मिणीजी के साथ बैठे हुए हैं और वे अपने हाथों भगवान को सोने की डांडीवाले चँवर से हवा कर रही हैं।

 

नारदजी को देखते ही भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणीजी के पलँग से सहसा उठ खड़े हुए। उन्होंने देवर्षि नारद के युगलचरणों में मुकुटयुक्त सिर से प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उन्हें अपने आसन पर बैठाया। कृष्ण ने नारद जी के चरण धोये और उनका चरणामृत अपने सिर पर धारण किया। भगवान नारायण ने शास्त्रोक्त विधि से देवर्षिशिरोमणि भगवान नारद की पूजा की। इसके बाद अमृत से भी मीठे किन्तु थोड़े शब्दों में उनका स्वागत-सत्कार किया और फिर कहा—‘प्रभो! आप तो स्वयं समग्र, ज्ञान, वैराग्य, धर्म, यश, श्री और ऐश्वर्य से पूर्ण हैं। आपकी हम क्या सेवा करें’ ?

 

देवर्षि नारद ने कहा—भगवन्! आप समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं। आपके लिये यह कोई नयी बात नहीं है कि आप अपने भक्तजनों से प्रेम करते हैं और दुष्टों को दण्ड देते हैं। यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आज मुझे आपके चरणकमलों के दर्शन हुए हैं। आपके चरण कमलों के दर्शन मात्र से मोक्ष प्राप्त हो जाता है इसमें तनिक भी संदेह नही है। ब्रम्हा, शंकर आदि सदा-सर्वदा अपने ह्रदय में उनका(आपके चरणों) चिन्तन करते रहते हैं। वास्तव में वे श्रीचरण ही संसाररूप कुएँ में गिरे हुए लोगों को बाहर निकलने के लिये अवलम्बन हैं। आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपके उन चरणकमलों की स्मृति सर्वदा बनी रहे और मैं चाहे जहाँ भी रहूँ, उसके ध्यान में तन्मय रहूँ ।

 

इसके बाद नारदजी वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया और उद्धवजी के साथ चौसर खेल रहे हैं। वहाँ भी भगवान ने खड़े होकर उनका स्वागत किया, आसन पर बैठाया और विविध सामग्रियों द्वारा बड़ी भक्ति से उनकी अर्चा-पूजा की । इसके बाद भगवान ने नारदजी से अनजान की तरह पूछा—‘आप यहाँ कब पधारे! आप तो परिपूर्ण आत्माराम—आप्तकाम हैं और हम लोग हैं अपूर्ण। ऐसी अवस्था में भला हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं। आप हमें सेवा का अवसर जरूर दीजिये और हमारा जीवन सफल कीजिये। नारद जी ये सब सुनकर चकित रह गए और दूसरे महल की ओर बढे।

 

भगवान ने वहां देखा की कृष्ण स्नान की तैयारी कर रहे हैं। इस तरह नारद जी ने हर महल में भगवान को अलग-अलग कार्य करते हुए देखा। कहीं भगवान यज्ञ-कुंडों में हवन कर रहे हैं, कहीं ब्राह्मणों को भोजन करवा रहे हैं तो कहीं खुद भोजन कर रहे हैं। कहीं संध्या वंदन कर रहे हैं तो कहीं मौन रहकर गायत्री का जप कर रहे थे। कहीं भगवान भ्रमण कर रहे हैं तो कहीं भगवान सो रहे हैं। कहीं अपनी पत्नी के साथ हास्य-विनोद की बात कर रहे हैं तो कहीं धर्म का पालन कर रहे हैं। कहीं गाओं का दान कर रहे हैं तो कहीं एकांत में बैठकर पुराण-पुरुष का ध्यान कर रहे हैं। भगवान किसी के साथ युद्ध की बातें कर रहे हैं तो किसी के साथ संधि की।

 

इस तरह भगवान श्री कृष्ण के अलग-अलग रूप देखकर और उनकी योगमाया को देखकर नारदजी ने मुस्कुराते हुए भगवान से कहा-आपकी योगमाया को ब्रह्मा जी भी नही जान सकते हैं। लेकिन हमने आपकी योगमाया के दर्शन किये हैं किन्तु ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमें आपके चरण कमलों की सेवा करने करना का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अब आप मुझे चलने की आज्ञा दीजिये।

 

भगवान श्री कृष्ण ने कहा- मैं धर्म का पालन और आचरण करता हूँ इसलिए मेरी यह योगमाया को देखकर मोहित मत होना।

 

इस तरह भगवान धर्म का आचरण कर रहे हैं और उपदेश दे रहे हैं। भगवान सभी रानियों के साथ एक-एक रूप बनाकर रहते थे और सुंदर गृहस्थ जीवन का पालन करते थे।

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