Krishna leela: Karwat Utsav or Shakatasur

Krishna leela: Karwat Utsav or Shakatasur

श्री कृष्ण करवट उत्सव और शकट भंजन 

भगवान ने पूतना(Putna) का उद्धार किया। और माँ की गति प्रदान की है। एक दिन भगवान 81 दिन के हुए और आज जन्म नक्षत्र भी है प्रभु का। आज भगवान ने करवट ली है। तो भगवान का करवट उत्सव मनाया जा रहा है। देखिये बंधुओ जब भगवान करवट बदलते है तो भी उत्सव मनाया जाता है।
माँ ने विचार किया मैं ब्राह्मणों को अन्न दान, वस्त्र दान करुँगी और भोजन भी कराऊंगी। ऐसा मन में संकल्प लेकर माँ ने लाला को दूध पिलाकर पलने में सुलाया। एक टूटी बैलगाड़ी पड़ी थी। उसके ऊपर भगवान के पालने को डाल दिया। ऊपर दूध दही माखन की मटकियां रखी थी और नीचे भगवान का पलना है। गहरी नन्द में कृष्ण सोये हुए है। माँ ब्राह्मणों की सेवा में लग गई है।

इधर कंस के द्वारा भेजा हुआ शकटासुर असुर आया है और बैलगाड़ी पर बैठ गया। जोर जोर से बैलगाड़ी(शकट) हिलाने लगा। भगवान सो रहे थे तो नींद खुली तो देखा शकटासुर(Shaktasur) बैठा है। मन में प्रभु ने विचार किया की ये मुझे मरने के लिए आया है और जब मैं रोँऊगा तो माँ मेरी रोने की आवाज सुनेगी फिर माँ आ जाएगी और ये भाग जायेगा। भगवान ने रोना शुरू किया लेकिन नन्द भवन, गोशाला से थोड़ी दुरी पर था। इसलिए माँ ने आवाज नही सुनी। भगवान मन में बोले- मैया तो हमारी आवाज नहीं सुनती है चलो आज खुद ही दो-दो हाथ कर लेते है शकटासुर से। नन्हे नन्हे अपने चरण भगवान ने उठाये और जोर से उस शकट में लात मारी। और प्रभु ने झट शकट का भंजन कर दिया और भगवान पालने में झूलते हुए विराजमान हो गए। जितने भी दूध दही और माखन की मटकी थी सब नीचे गिरी और फूट गई।

शकटासुर कौन है ?Shaktasur kon hai?

हिरण्याक्ष का पुत्र था उत्कच, जो बहुत शक्तिशाली था। एक बार इसने लोमेश ऋषि के आश्रम पर जाकर वहां के सारे वृक्षों को कुचल डाला। तब महर्षि लोमेश ने श्राप दिया- अरे दुष्ट, अरे पापी, जा तू देह रहित(बिना शरीर के) हो जा। तभी यह ऋषि के चरणो में गिर पड़ा और बोला महर्षि मुझे क्षमा कर दीजिये। तब ऋषि ने कहा- मूर्ख जा मैं तुझे माफ़ करता हूँ। वैवस्त मन्वन्तर में श्री कृष्ण के चरण स्पर्श से तेरी मुक्ति हो जाएगी। वही असुर उस छकड़े(बैलगाड़ी) में आकर बैठ गया। और जैसे ही भगवान के चरणो का स्पर्श हुआ तो मुक्त हो गया।

 
इसका आध्यात्मिक पक्ष भी है। दूध दही की मटकी ऊपर रखी थी और नीचे भगवान का पलना था। गुरुदेव कहते है की मानव यही गलती करता है। हम सांसारिक वस्तुओं को बहुत अधिक महत्व देते है और भगवान को बहुत कम। छोटी छोटी बातों में भी हमारे लिए भगवान के लिए, धर्म के लिए उतना महत्व नही होता जितना संसार की वस्तुओं के लिए होता है। जब धर्म की बात आती है तो हमारा मन संकुचित हो जाता है।

ये बैलगाड़ी और कुछ नही भैया गृहस्थ रूपी गाड़ी है। जिसमे दो पहिये लगे हुए है । एक पति है और एक पत्नी। ये पहिये इस बैलगाड़ी को खीच रहे है। यदि हम चाहे हमारी गृहस्थ रूपी गाडी ठीक चले। कोई दिक्कत न आये और सुख शांति समृद्धि बनी रहे तो एक बात का जरूर ध्यान रखना। क्योंकि व्यक्ति को पुरुषार्थ का अभिमान हो जाता है। मैंने किया, मैं कर रहा हूँ और मैं करुगा। ये अभिमान इंसान को हो जाता है बस वहीँ से उसका पतन शुरू हो जाता है।
ऐसी स्तिथि में व्यक्ति को पुरुषार्थ करते हुए अभिमान न हो। तो पुरुषार्थ के साथ साथ भगवान की प्रार्थना भी करते रहो। क्योंकि भगवान की स्तुति से , प्रार्थना से अभिमान गल जाता है। जिससे हमारा अभिमान गले।

आज इस लीला के माध्यम से ब्रज में ये रहस्ये प्रकट किया।

बोलिए कृष्ण कन्हैया की जय !! Boliye Krishan Kanhaiya ki jai !!

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