Krishna and Kubja story in hindi

Krishna and Kubja story in hindi

कृष्ण और कुब्जा की कथा/कहानी

 

भगवान ने धोबी को मारा। फिर दर्जी और सुदामा नाम के माली पर कृपा करके आगे बढे। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण जब अपनी मण्डली के साथ राजमार्ग से आगे बढ़े, तब उन्होंने एक युवती स्त्री को देखा। उसका मुँह तो सुन्दर था, परन्तु वह शरीर से कुबड़ी थी। इसी से उनका नाम पड़ गया था ‘कुब्जा’। वह अपने हाथ में चन्दन का पात्र लिये हुए जा रही थी।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने कुब्जा पर कृपा करने के लिये हँसते हुए उससे पूछा- ‘सुन्दरी! तुम कौन हो ? यह चन्दन किसके लिये ले जा रही हो ? यह उत्तम चन्दन, यह अंगराग हमें भी दो। इस दान से शीघ्र ही तुम्हारा परम कल्याण होगा’ ।

 

 

सैरन्ध्री कुब्जा ने कहा—‘परम सुन्दर! मैं कंस की प्रिय दासी हूँ। महाराज मुझे बहुत मानते हैं। मेरा नाम त्रिवक्रा (कुब्जा) है। मैं उनके यहाँ चन्दन, अंगराग लगाने का काम करती हूँ। मेरे द्वारा तैयार किये हुए चन्दन और अंगराग भोजराज कंस को बहुत भाते हैं।

 

 

लेकिन मुझे नही लगता आप दोनों से सुंदर पात्र और कोई इस चन्दन के लिए है, आप ही उत्तम पात्र हैं। भगवान का रूप देखकर वो कुब्जा मुग्ध हो गई और उसने दोनों भाइयों को वह सुन्दर और गाढ़ा अंगराग दे दिया।

 

 

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने साँवले शरीर पर पीले रंग का और बलरामजी ने अपने गोर शरीर पर लाल रंग का अंगराग लगाया। भगवान श्रीकृष्ण उस कुब्जा पर बहुत प्रसन्न हुए। भगवान ने कुब्जा को सीधा करने का प्रयास किया। भगवान ने अपने चरणों से कुब्जा के पैर के दोनों पंजे दबा लिये और हाथ ऊँचा करके दो अंगुलियाँ उसकी ठोड़ी में लगायीं तथा उसके शरीर को तनिक उचका(झटका) दिया। जैसे ही भगवान ने झटका दिया उस कुब्जा के सभी अंग सीधे और समान हो गये। प्रेम और मुक्ति के दाता भगवान के स्पर्श से वह तत्काल एक अति सुंदर उत्तम योवन युवती बन गई।

 
उसी क्षण कुब्जा रूप, गुण और उदारता से सम्पन्न हो गयी। और बस भगवान को एकटक निहारती रही। उसने उनके दुपट्टे का छोर पकड़कर मुसकराते हुए कहा— ‘वीरशिरोमणे! आइये, घर चलें। अब मैं आपको यहाँ नहीं छोड़ सकती। पुरुषोत्तम! मुझ दासी पर प्रसन्न होइये’। हमे अपना कृपा पात्र बनाइये।

 

जब बलरामजी के सामने ही कुब्जा ने इस प्रकार प्रार्थना की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने साथी ग्वालबालों के मुँह की ओर देखकर हँसते हुए उससे कहा— ‘सुन्दरी! तुम्हारा घर संसारी लोगों के लिये अपनी मानसिक व्याधि मिटाने का साधन है। मैं आपना कार्य पूरा करके अवश्य वहाँ आऊँगा। हमारे-जैसे बेघर के बटोहियों को तुम्हारा ही तो आसरा है’ । इस प्रकार मीठी-मीठी बातें करके भगवान श्रीकृष्ण ने उसे विदा कर दिया।

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