Krishna Kripa on Yagyapatniyon hindi story

Krishna Kripa on Yagyapatniyon hindi story

कृष्ण का यज्ञपत्नियों पर कृपा करना 

 

शुकदेव जी(sukhdev ji) महाराज परीक्षित(Parikshit) जी को सुन्दर भगवान की लीलाओं का कथा रस पान करवा रहे हैं। एक बार ग्वाल बालों ने कन्हैया और बलराम से कहा से -तुमने बहुत बड़े-बड़े दुष्टों का संहार किया हैं। उन्ही दुष्टों की तरह हमें भूख सता रही हैं। आप दोनों इसे भी बुझाने का उपाय करो।

तब भगवान कृष्ण बोले की ग्वाल बालों! यहाँ से थोड़ी दुरी पर वेदवादी ब्राह्मण अंगिरारस नमक यज्ञ कर रहे हैं। तुम वहां जाओ और बलराम जी का और मेरा नाम लेकर कुछ खाने की वस्तु ले आओ।

ग्वाल बाल गए और ब्राह्मणों को प्रणाम किया। ग्वाल बाल बोले की थोड़ी दुरी पर भगवान बलराम और कृष्ण आये हैं। उन्हें भूख लगी हैं आप कृपा करके कुछ खाने को दीजिये। लेकिन उन ब्राहम्णो ने कुछ भी खाने के लिए नही दिया और इनकी बात को अनसुना कर दिया।
शुकदेव जी महाराज कहते हैं परीक्षित! ये ब्राह्मण खुद को ज्ञान वृद्ध मानते हैं पर वास्तव में बालक ही हैं।

जब ग्वाल बालों को कोई उत्तर नही मिला तो निराश होकर लोट आये। और सब बात भगवान को बताई।
कृष्ण ने जब सुना तो हँसने लगे और ग्वाल बालों को समझाया की ‘संसार में असफलता तो बार-बार होती ही हैं, उससे निराश नही होना चाहिए; बार बार प्रयत्न करते रहने से सफलता मिल जाती हैं।’

मेरे प्यारे ग्वाल बालों अबकी बार तुम उनकी पत्नियों के पास जाओ और तुम जाकर कहना की कृष्ण बलराम आये हैं। तुम जितना चाहोगे उतना भोजन वे तुम्हे दे देंगी। क्योंकि उनका मन मुझमे लगा हैं और वो मुझसे प्रेम करती हैं।

अबकी बार ग्वाल बाल ब्राह्मणों की पत्नियों के पास गए और बोले- आपको हम प्रणाम करते हैं। भगवान श्री कृष्ण और हम गौए चराते हुए यहाँ से थोड़ी दुरी पर आये हैं और इस समय उनको और हमे भूख लगी हैं। आप कृपा करके कुछ भोजन दे दीजिये।

जैसे ही उन्होंने सुना तो सुंदर भोजन की थाली तैयार की और उसमे अलग अलग प्रकार की भोजन सामग्री ली हैं। और कृष्ण की और दौड़ पड़ी हैं। उनके पति , भाई-बंधुओं और सगे सम्बन्धियों ने रोकने का बहुत प्रयास किया लेकिन जिस तरह नदी समुद्र के लिए निकल पड़ती हैं वैसी ही आज ये निकल पड़ी हैं।

जब ब्राह्मणपत्नियों(Brahmanpatniyon) ने देखा उस सांवरे सलोने कृष्ण(krishan) को तो बस देखती ही रह गई हैं। आज तक उन्होंने भगवान के बारे में केवल सुना था लेकिन आज देखना का भी अवसर प्राप्त हुआ हैं। एकटक भगवान को देख रही हैं। उनके रूप माधुर्य का पान कर रही हैं। भगवान बैठे बैठे मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं।

भगवान ने उनसे कहा की देवियों! तुम्हारा स्वागत हैं। आओ, बैठो। हम तुम्हारा स्वागत कैसे करें? भगवान कहते हैं मैं जानता हुँ की तुम सभी मुझसे प्रेम करती हो। तुम्हारा यहाँ आना उचित हैं। मैं तुम्हारे प्रेम का अभिवादन करता हुँ। परन्तु अब तुम मेरा दर्शन कर चुकी हो। अब अपनी यज्ञशाला में लौट जाओ। तुम्हारे पति ब्राह्मण गृहस्थ हैं। वे तुम्हारे साथ मिलकर ही अपना यज्ञ पूर्ण कर सकेंगे।

ब्राह्मण पत्नियों ने कहा ये अंतर्यामी स्यामसुन्दर! आपको ऐसी बात नही कहनी चाहिए। हम अपने सभी सगे सम्बन्धियों को छोड़कर आपके पास आई हैं। स्वामी! अब हमारे पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-बंधू और स्वजन-सम्बन्धी हमे स्वीकार नहीं करेंगे; फिर दुसरों की तो बात ही क्या? अब हम आपके चरणों में आ गई हैं और किसी का सहारा नही हैं। कुछ ऐसा कीजिये की हमे दूसरों की शरण में जाना ना पड़े।

भगवान बोले की देवियों! तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारा तिरस्कार नही करेंगे। उनकी तो बात ही क्या, सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा। इसका कारण ये हैं की तुम अब मेरी हो गई हो। इसलिए अब तुम जाओ, और अपना मन मुझमे लगा दो। तुम्हे शीघ्र ही मेरी प्राप्ति हो जाएगी। और फिर भगवान ने ग्वाल बालों के साथ सुंदर भोजन किया है

शुकदेव जी कहते हैं इस प्रकार भगवान के कहने पर सभी ब्राह्मणपत्नियां यज्ञशाला में आई हैं। उन ब्राह्मणों ने अपनी स्त्रियों में तनिक भी दोषदृष्टि नही की। और सबके साथ मिलकर यज्ञ पूरा किया हैं। एक स्त्री ने भगवान की याद में अपने शरीर को छोड़ दिया हैं। इस प्रकार भगवान ने सुन्दर लीला की हैं और सबको आनंद प्रदान किया हैं।

इधर जब ब्राह्मणों को पता चला की श्री कृष्ण को स्वयं भगवान हैं। तो उन्हें बड़ा पछतावा हुआ हैं। अपने आप को कोसने लगे हैं। की हमने अपराध किया भगवान की आज्ञा ना मानकर। हमने ऊँचे कूल में जन्म किया और वेदाध्ययन करके बड़े बड़े यज्ञ किये लेकिन वह सब किस काम का? हमारी विद्या व्यर्थ गई । हमारी इस बहुज्ञता को धिक्कार हैं। हमारा भगवान के चरणों में प्रेम नहीं हैं। हमसे अच्छी तो हमारी पत्नियां हैं जिन्होंने भगवान के साक्षात दर्शन कर लिए हैं। और जिनका भगवान श्री कृष्ण में अगाध प्रेम हैं।

हे श्री कृष्ण! हमारा ज्ञान अबाध हैं। हमारी बुद्धि माया से मोहित हैं। हम कर्म काण्ड में पड़े हुए हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं। हे पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण आप हमारे अपराध को क्षमा करें।

शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन! इन ब्राह्मणों को अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ हैं। लेकिन कंस के डर के कारण ये भगवान का दर्शन करने नहीं जा सकते।

बोलिए कृष्ण चन्द्र भगवान की जय!! Krishan Chander Bhagwan Ki jai!!

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