Krishna ki Mathura Vasiyon par Kripa

Krishna ki Mathura Vasiyon par Kripa

कृष्ण की मथुरा वासियों पर कृपा 

 

भगवान श्री कृष्ण जी ने मथुरा में प्रवेश किया है। मार्ग में स्थान-स्थान पर गाँवों के लोग मिलने के लिये आते और भगवान श्रीकृष्ण तथा बलरामजी को देखकर आनन्दमग्न हो जाते। सभी एकटक भगवान को निहार रहे थे बस। भगवान के रूप को देखकर कोई भी अपनी दृष्टि नही हटा पा रहा था।

 

नन्दबाबा आदि व्रजवासी तो पहले से ही वहाँ पहुँच गये थे, और मथुरापूरी के बाहरी उपवन में रुककर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे । उनके पास पहुंचकर भगवान ने अक्रूर से कहा- ‘चाचाजी! आप रथ लेकर पहले मथुरापुरी में प्रवेश कीजिये और अपने घर जाइये। हम लोग पहले यहाँ उतरकर फिर नगर देखने के लिये आयेंगें’ ।
अक्रूर जी कहते हैं-भगवन! मैं आपका भक्त हूँ! आप मुझे मत छोडिये । आप बलरामजी, ग्वालबालों तथा नन्दरायजी आदि आत्मीयों के साथ चलकर हमारा घर सनाथ कीजिये। आपके चरणों की धूलि से हमारा घर पवित्र कीजिये।

 

श्रीभगवान ने कहा—चाचाजी! मैं दाऊ भैया के साथ आपके घर आऊँगा, लेकिन पहले मुझे कंस मामा का उद्धार करना है।

 

भगवान के इस प्रकार कहने पर अक्रूरजी कुछ अनमने-से हो गये। उन्होंने पुरी में प्रवेश करके कंस से श्रीकृष्ण और बलराम के आने का समाचार निवेदन किया और फिर अपने घर गये।

 

दूसरे दिन तीसरे पहर बलरामजी और ग्वालबालों के साथ भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरापुरी की देखने के लिये नगर में प्रवेश किया । आज पूरी मथुरा दुल्हन की तरह सजी हुई है। वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी ने ग्वालबालों के साथ राजपथ से मथुरा नगरी में प्रवेश किया। उस समय नगर की नारियाँ बड़ी उत्सुकता से उन्हें देखने के लिये झटपट अटारियों पर चढ़ गयीं ।

 

 

Krishna Mathura leela : कृष्ण मथुरा लीला 

किसी-किसी ने जल्दी के कारण अपने वस्त्र और गहने पहन लिये। किसी ने भूल से कुण्डल, कंगन आदि जोड़ से पहने जाने वाले आभूषणों में से एक ही पहना और चल पड़ी। कोई एक ही कान में पत्र नामक आभूषण धारण कर पायी थी तो किसी ने एक ही पाँव में पायजेब पहन रखा था। कोई एक ही आँख में अंजन आँज पायी थी और दूसरी में बिना आँजे जी चल पड़ी।

 

आज मथुरा के सभी स्त्री-पुरुष भगवान के सौंदर्य को देखते ही रह गए हैं। सभी लोग अपने काम काज छोड़कर आज भगवान के दर्शन के लिए आये हैं। क्योंकि आज तक जिन भगवान की लीलाओं को सुना था आज उन भगवान को देखने का अवसर मिला है। ऐसे लोग बिरले ही होते हैं जिन्हे भगवान के साक्षात दर्शन हों। लोगों ने दही, अक्षत, जल से भरे पात्र, फूलों के हार, चन्दन और भेंट की सामग्रियों से आनन्दमग्न होकर भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी की पूजा की । भगवान को देखकर सभी पुरवासी आपस में कहने लगे—‘धन्य हैं! धन्य हैं!’ गोपियों ने ऐसी कौन-सी महान् तपस्या की है, जिसके कारण वे मनुष्यमात्र को परमानन्द देने वाले इन दोनों मनोहर किशोरों को देखती रहती हैं ।

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