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Krishna ka Kubja and Akrur ke ghar jana

Krishna ka Kubja and Akrur ke ghar jana

कृष्ण का कुब्जा और अक्रूर के घर जाना

भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव को प्रेम का पाठ पढ़ाया। भगवान ने कुब्जा को कहा था की मैं तुम्हारे घर आऊंगा।

 

krishna ka kubja ke ghar jana : कृष्ण का कुब्जा के घर जाना 

अब भगवान कुब्जा के घर गए हैं। कुब्जा का घर बहुमूल्य सामग्रियों से सम्पन्न था। उसमें श्रृंगार-रस का उद्दीपन करने वाली बहुत-सी साधन सामग्री भी भरी हुई थी। मोती की झालरें और स्थान-स्थान पर झंडियाँ भी लगी हुई थीं। चँदोवे तने हुए थे। सेजें बिछायी हुई थीं और बैठने के लिये बहुत सुन्दर-सुन्दर आसन लगाये हुए थे। धूप की सुगन्ध फ़ैल रही थी। दीपक की शिखाएँ जगमगा रही थीं। स्थान-स्थान पर फूलों के हार और चन्दन रखे हुए थे।

 

 

जैसे ही भगवान को अपने घर आता देखकर कुब्जा एकदम हड़बड़ा कर उठ गई। और अपनी सखियों के साथ भगवान का खूब सत्कार किया है। और फिर कुब्जा ने भगवान के चरणों की वंदना की है। इसके बाद भगवान ने अभीष्ट वर देकर उसकी पूजा स्वीकार की और फिर अपने प्यारे भक्त उद्धवजी के साथ अपने सर्वसम्मानित घर पर लौट आये ।

 

 

krishna ka Akrur ke ghar jana : कृष्ण का अक्रूर के घर जाना 

एक दिन श्रीकृष्ण बलरामजी और उद्धवजी के साथ अक्रूरजी की अभिलाषा पूर्ण करने और उनसे कुछ काम लेने के लिये उनके घर गये। अक्रूर जी ने जैसे ही भगवान को देखा तो तुरंत उठकर आगे गये और आनन्द से भरकर उनका अभिनन्दन और आलिंगन किया । अक्रूरजी ने भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी को नमस्कार किया तथा उद्धवजी के साथ उन दोनों भाइयों ने भी उन्हें नमस्कार किया।

 

अक्रूर ने भगवान के चरण धोये हैं। और दोनों भाइयों का खूब आदर-सत्कार किया है।
अक्रूर जी कहते हैं- आप सारे जगत् के एकमात्र पिता और शिक्षक हैं। वही आज आप हमारे घर पधारे। आपके आने से आज हमारा घर धन्य-धन्य हो गया है। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान पुरुष है जो आपको छोड़कर किसी दूसरे की शरण में जायगा ? आप अपना भजन करने वाले प्रेमी भक्त की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। यहाँ तक कि जिसकी कभी क्षति और वृद्धि नहीं होती—जो एकरस है, अपने उस आत्मा का भी आप दान कर देते हैं । हमें आपका साक्षात् दर्शन हो गया, यह कितने सौभाग्य की बात है। प्रभो! हम स्त्री, पुत्र, धन, स्वजन, गेह और देह आदि के मोह की रस्सी में बँधे हुए हैं। अवश्य ही यह आपकी माया का खेल है। आप कृपा करके इस गाढ़े बन्धन को शीघ्र काट दीजिये’ ।

 

इस प्रकार भक्त अक्रूरजी ने भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और स्तुति की। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने मुसकराकर अपनी मधुर वाणी से मानो मोहित करते हुए कहा -आप हमारे गुरु—हितोपदेशक और चाचा हैं। हम तो आपके बालक हैं और सदा ही आपकी रक्षा, पालन और कृपा के पात्र हैं । आप-जैसे संत देवताओं से भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओं में तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतों में नहीं।

 

चाचाजी! आप हमारे हितैषी सुहृदों में सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये आप पाण्डवों का हित करने के लिये तथा उनका कुशल-मंगल जानने के लिये हस्तिनापुर जाइये । हमने ऐसा सुना है कि राजा पाण्डु के मर पर जाने पर अपनी माता कुन्ती के साथ युधिष्ठिर आदि पाण्डव बड़े दुःख में पड़ गये थे। अब राजा धृतराष्ट्र उन्हें अपनी राजधानी हस्तिनापुर में ले आये हैं और वे वहीं रहते हैं ।

 

आप जानते हैं कि राजा धृतराष्ट्र एक तो अंधे हैं और दूसरे उनमें मनोबल की कमी है। उसका पुत्र दुर्योधन बहुत दुष्ट है और उसके अधीन होने कर कारण वे पाण्डवों के साथ अपने पुत्र-जैसा—समान व्यवहार नहीं कर पाते ।

 

इसलिये आप वहाँ जाइये और मालूम कीजिये कि उनकी स्थिति अच्छी है या बुरी। आपके द्वारा उसका समाचार जानकर मैं ऐसा उपाय करूँगा, जिससे उन सुहृदों को सुख मिले’ । सर्वशक्तिमान् भगवान श्रीकृष्ण अक्रूरजी को इस प्रकार आदेश देकर बलरामजी और उद्धवजी के साथ वहाँ से अपने घर लौट आये ।

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