krishna dhanush break and kuvalayapida elephant hindi story

Krishna Dhanush break and Kuvalayapida Elephant hindi story

कृष्ण का धनुष तोडना और कुवलयापीड हाथी की कथा/कहानी 

 

भगवान श्री कृष्ण ने कुब्जा का उद्धार किया है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण पुरवासियों से धनुष-यज्ञ का स्थान पूछते हुए रंगशाला में पहुँचे।

 

Krishna Broke Kans Dhanusha hindi : कृष्ण द्वारा कंस का धनुष तोडना 

वहाँ उन्होंने इन्द्रधनुष के समान एक अद्भुत धनुष देखा। उस धनुष में बहुत-सा धन लगाया गया था, अनेक बहुमूल्य अलंकारों से उसे सजाया गया था। उसकी खूब पूजा की गयी थी और बहुत-से सैनिक उसकी रक्षा कर रहे थे।

 

भगवान श्री कृष्ण उस धनुष को उठाने के लिए उसके पास गए। लेकिन कंस के रक्षकों ने भगवान को रोक दिया। सबके देखते ही देखते भगवान ने बाएं हाथ से जबरदस्ती उस धनुष को उठा लिया और उस पर डोरी चढ़ायी और एक क्षण में खींचकर बीचो-बीच से उसी प्रकार उसके दो टुकड़े कर डाले। धनुष टूटने की आवाज से आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ भर गयीं; उसे सुनकर कंस भी डर गया।

 

अब कंस के रक्षक श्रीकृष्ण को घेरकर खड़े हो गये और उन्हें पकड़ लेने की इच्छा से चिल्लाने लगे—‘पकड़ लो, बाँध लो, जाने पावे’। इस पर बलरामजी और श्रीकृष्ण थोड़े से क्रोधित हो गये और उस धनुष के टुकड़ों को उठाकर उन्हीं से उनका काम तमाम कर दिया। उन्हीं धनुषखण्डों से उन्होंने उन असुरों की सहायता के लिये कंस की भेजी हुई सेना का भी संहार कर डाला।

 

इसके बाद वे यज्ञशाला के प्रधान द्वार से होकर बाहर निकल आये और बड़े आनन्द से मथुरापुरी की शोभा देखते हुए विचरने लगे। स प्रकार भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी पूरी स्वतंत्रता से मथुरापुरी में विचरण करने लगे। मथुरावासी उन्हीं पुरुषभूषण भगवान श्रीकृष्ण के अंग-अंग का सौन्दर्य देख रहे हैं। जब सूर्यास्त हो गया तब दोनों भाई ग्वालबालों से घिरे हुए नगर से बाहर अपने डेरे पर, जहाँ छकड़े थे, लौट आये ।

 
कंस बहुत डर गया, उस दुर्बुद्धि को बहुत देर तक नींद न आयी। उसे जाग्रत-अवस्था में तथा स्वपन में भी बहुत-से ऐसे अपशकुन हुए जो उसकी मृत्यु के सूचक थे । कंस ने सपने में देखा कि वह प्रेतों के गले लग रहा है, गधे पर चढ़कर चलता है और विष खा रहा है। उसका सारा शरीर तेल से तर है, गले में जपाकुसुम (अड़हुल)—की माला है और नग्न होकर कहीं जा रहा है । स्वप्न और जाग्रत-अवस्था में उसने इसी प्रकार के और भी बहुत-से अपशकुन देखे। उनके कारण उसे नींद न आयी।

 
इस प्रकार रात बीत गई। प्रातः काल कंस ने मल्ल-क्रीड़ा (दंगल)—का महोत्सव प्रारम्भ कराया । राजकर्मचारियों ने रंगभूमि को भलीभाँति सजाया। तुरही, भेरी आदि बाजे बजने लगे। लोगों के बैठने के मंच फूलों के गजरों, झंडियों, वस्त्र और बंदनवारों से सजा दिये गये । उनपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक तथा ग्रामवासी—सब यथास्थान बैठ गये। राजालोग भी अपने-अपने निश्चित स्थान पर जा डटे । राजा कंस अपने मन्त्रियों के साथ मण्डलेश्वरों (छोटे-छोटे राजाओं) के बीच में सबसे श्रेष्ठ राजसिंहासन पर जा बैठा। इस समय भी अपशकुनों के कारण वह घबराया हुआ था ।

 

 

तब पहलवानों के ताल ठोंकने के साथ ही बाजे बजने लगे और गरबीले पहलवान खूब सज-धजकर अपने-अपने उस्तादों के साथ अखाड़े में आ उतरे । चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल आदि प्रधान-प्रधान पहलवान बाजों की सुमधुर ध्वनि से उत्साहित होकर अखाड़े में आ-आकर बैठ गये । इसी समय भोजराज कंस ने नन्द आदि गोपों को बुलवाया। उन लोगों ने आकर उसे तरह-तरह की भेंटें दीं और फिर जाकर वे एक मंच पर बैठ गये ।

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