Krishna and chanoor aur mushtik Story in hindi

Krishna and Chanoor aur Mushtik Story in hindi

कृष्ण और चाणूर और मुष्टिक की कहानी/कथा

 

भगवान ने कुवलयापीड हाथी को मारा और उसके दांत तोड़ दिए। एक दांत को कृष्ण ने अपने हाथ में लिया और दूसरे को बलराम ने। कंधे पर दांत रखकर ग्वाल बालों के भगवान ने रंग भूमि में प्रवेश किया। भगवान की शोभा देखने योग्य है।

Chanoor-Mushtik uddhar by Krishna : कृष्णा द्वारा चाणूर-मुष्टिक का उद्धार 

जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ रंगभूमि के पधारे, उस समय वे पहलवानों को व्रजकठोर शरीर, साधारण मनुष्यों को नर-रत्न, स्त्रियों को मूर्तिमान् कामदेव, गोपों को स्वजन, दुष्ट राजाओं को दण्ड देने वाले शासक, माता-पिता के समान बड़े-बूढ़ों को शिशु, कंस को मृत्यु, अज्ञानियों को विराट्, योगियों को परम तत्त्व और भक्तशिरोमणि वृष्णिवंशियों को अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, श्रृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेमभक्ति रस का अनुभव किया) । जिसकी जैसी भावना थी भगवान सबको उसी रूप में दर्शन दे रहे हैं। लेकिन कंस बहुत डरा हुआ था।

 

मंचों पर जितने लोग बैठे थे—वे मथुरा के नागरिक और राष्ट्र के जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी को देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उनके नेत्र और मुखकमल खिल उठे। उत्कण्ठा से भर गये। वे नेत्रों के द्वारा उनकी मुखमाधुरी का पान करते-करते तृप्त ही नहीं होते थे । मानो वे उन्हें नेत्रों से पी रहे हों, जिभ्हा से चाट रहे हों, नासिका से सूँघ रहे हों और भुजाओं से पकड़कर ह्रदय से सटा रहे हों । सभी देवकी और वासुदेव, नन्द और यशोदा और ब्रजवासियों को धन्य मान रहे हैं जिन्हे कृष्ण का संग मिला। सभी लोग भगवान की लीलाओं को याद कर रहे हैं कैसे भगवान ने ब्रज में अपनी लीलाएं की।

 

जिस समय दर्शक भगवान की लीलाओं को याद कर रहे थे उसी समय चाणूर ने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को कहा— ‘नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामजी! तुम दोनों वीरों के आदरणीय हो। हमारे महाराज ने यह सुनकर कि तुम लोग कुश्ती लड़ने में बड़े निपुण हो, तुम्हारा कौशल देखने के लिये तुम्हें यहाँ बुलवाया है । देखो भाई! जो प्रजा मन, वचन और कर्म से राजा का प्रिय कार्य करती है, उसका भला होता है और जो राजा की इच्छा के विपरीत काम करती है, उसे हानि उठानी पड़ती है । यह सभी जानते हैं कि गाय और बछड़े चराने वाले ग्वालिये प्रतिदिन आनन्द से जंगलों में कुश्ती लड़-लड़कर खेलते रहते हैं और गायें चराते रहते हैं । इसलिये आओ, हम और तुम मिलकर महाराज को प्रसन्न करने के लिये कुश्ती लड़े। ऐसा करने से हम पर सभी प्राणी प्रसन्न होंगे, क्योंकि राजा सारी प्रजा का प्रतीक है’ ।

 

 

भगवान ने कहा – ‘चाणूर! हम भी इन भोजराज कंस की वनवासी प्रजा हैं। हमें राजा को प्रसन्न जरूर करना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण है। किन्तु चाणूर! हम लोग अभी बालक हैं। इसलिये हम अपने समान बलवाले बालकों के साथ ही लड़ने का खेल करेंगे। कुश्ती समान बलवालों के साथ ही होनी चाहिये, जिससे देखने वाले सभासदों को अन्याय के समर्थक होने का पाप न लगे’।

 

चाणूर ने कहा—अजी! तुम और बलराम न बालक हो और न तो किशोर। तुम दोनों बलवानों में श्रेष्ठ हो, तुमने अभी-अभी हजार हाथियों का बल रखने वाले कुवलयापीड को खेल-ही-खेल में माना ना? इसलिये तुम दोनों को हम-जैसे बलवानों के साथ ही लड़ना चाहिये। इसमें अन्याय की कोई बात नहीं है। इसलिये कृष्ण! तुम मुझ पर अपना जोर आजमाओ और बलराम के साथ मुष्टिक लड़ेगा।

 

भगवान ने सोचा इन दुष्टों को मारने में ही भलाई है। ऐसा सोचकर श्रीकृष्ण चाणूर से और बलरामजी मुष्टिक से जा भिड़े । वे लोग एक-दूसरे को जीत लेने की इच्छा से हाथ से हाथ बाँधकर और पैरों में पैर अड़ाकर बलपूर्वक अपनी-अपनी ओर खींचने गये । वे पंजों से पंजे, घुटनों से घुटने, माथे से माथा और छाती से छाती भिड़ाकर एक-दूसरे पर चोट करने लगे । इस प्रकार दाँव-पेंच करते-करते अपने-अपने जोड़ीदार को पकड़कर इधर-उधर घुमाते, दूर ढकेल देते, जोर से जकड़ लेते, लिपट जाते, उठाकर पटक देते, छूटकर निकल भागते और कभी छोड़कर पीछे हट जाते थे। इस प्रकार एक-दूसरे को रोकते, प्रहार करते और अपने जोड़ीदार को पछाड़ देने की चेष्टा करते। कभी कोई नीचे गिर जाता, तो दूसरा उसे घुटनों और पैरों में दबाकर उठा लेता। हाथों से पकड़कर ऊपर ले जाता। गले में लिपट जाने पर ढकेल देता और आवश्यकता होने पर हाथ-पाँव इकट्ठे करके गाँठ बाँध देता ।

 

इस दंगल को देखने के लिये नगर की बहुत-सी महिलाएँ भी आयी हुई थीं। वे कह रही थी की कंस बड़े-बड़े पहलवानों के साथ ये छोटे-छोटे बलहीन बालकों को लड़ा रहा हैं। बहिन! देखो, इन पहलवानों का एक-एक अंग व्रज के समान कठोर है। ये देखने में बड़े भारी पर्वत-से मालूम होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण और बलराम अभी जवान भी नहीं हुए हैं। इसकी किशोरावस्था है।

 

 

जिस समय पुरवासिनी स्त्रियाँ इस प्रकार बातें कर रही थीं, उसी समय योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने मन-ही-मन शत्रु को मार डालने का निश्चय किया । भगवान श्रीकृष्ण और उनसे भिड़ने वाला चाणूर दोनों ही भिन्न-भिन्न प्रकार के दाँव-पेंच का प्रयोग करते हुए परस्पर जिस प्रकार लड़ रहे थे, वैसे ही बलरामजी और मुष्टिक भी भिड़े हुए थे । भगवान के अंग-प्रत्यंक वज्र से भी कठोर हो रहे थे। उनकी रगड़ से चाणूर की रग-रग ढीली पड़ गयी। बार-बार उसे ऐसा मालूम हो रहा था मानो उसके उसके शरीर के सारे बन्धन टूट रहे हैं। उसे बड़ी ग्लानि, बड़ी व्यथा हुई । अब वह अत्यन्त क्रोधित होकर बाज की तरह झपटा और दोनों हाथों के घूँसे बाँधकर उसने भगवान श्रीकृष्ण की छाती पर प्रहार किया । परन्तु उसके प्रहार से भगवान तनिक भी विचलित न हुए, जैसे फूलों के गजरे की मार से गजराज। उन्होंने चाणूर की दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और उसे अंतरिक्ष में बड़े वेग से कई बार घुमाकर धरती पर दे मारा।

 

 

उसकी वेष-भूषा अस्त-व्यस्त हो गयी, केश और मालाएँ बिखर गयीं, वह इन्द्रध्वज (इन्द्र की पूजा के लिये खड़े किये गये बड़े झंडे) के समान गिर पड़ा ।

इसी प्रकार मुष्टिक ने भी पहले बलरामजी को एक घूँसा मारा। इस पर बली बलरामजी ने उसे बड़े जोर से एक तमाचा जड़ दिया । तमाचा लगने से वह काँप उठा और आँधी से उखड़े हुए वृक्ष के समान अत्यन्त व्यथित और अन्त में प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा । हे राजन्! इसके बाद योद्धाओं में श्रेष्ठ भगवान बलरामजी ने अपने सामने आते ही कूट नामक पहलवान को खेल-खेल में ही बायें हाथ के घूँसे से उपेक्षापूर्वक मार डाला ।

 

 

उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने पैर की ठोकर से शल का सिर धड़ से अलग कर दिया और तोशल को तिनके की तरह चीर कर दो टुकड़े कर दिया। इस प्रकार दोनों धराशायी हो गये । जब चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल—ये पाँचों पहलवान मर चुके, तब जो बच रहे थे, वे अपने प्राण बचाने के लिये स्वयं वहाँ भाग खड़े हुए ।

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