Keshi and Vyomasura vadh story in hindi

Keshi and Vyomasura vadh story in hindi

केशी और व्योमासुर वध कथा

 

कंस ने केशी नामक दैत्य को कृष्ण भगवान को मारने के लिए भेजा। वह बड़े भारी घोड़े के रूप में मनके समान वेग से दौड़ता हुआ व्रज में आया।

 

Keshi vadh(killed) by Krishna  : कृष्ण द्वारा केशी का वध

वह अपनी टापों से धरती को खड़ता आ रहा था! उसकी बहुत मोटी गर्दन थी। उसकी गर्दन के छितराये हुए बालों के झटके से आकाश के बादल और विमानों की भीड़ तितर-बितर हो रही थी। उसकी भयानक हिनहिनाहट से सब-के-सब भय से काँप रहे थे। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें थीं, मुँह क्या था, मानो किसी वृक्ष का खोड़र ही हो। उसे देखने से ही डर लगता था। शरीर इतना विशाल था कि मालूम होता था काली-काली बादल की घटा है। उसकी नीयत में पाप भरा था। उसके चलने से भूकम्प होने लगता था ।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि उसकी हिनहिनाहट से उनके आश्रित रहने वाला गोकुल भयभीत हो रहा है और उसकी पूँछ के बालों से बादल तितर-बितर हो रहे हैं, तथा वह लड़के के लिये उन्हीं को ढूँढ भी रहा है—तब वे बढ़कर उसके सामने आ गये और उन्होंने सिंह के समान गरजकर उसे ललकारा ।

 

भगवान को सामने आया देख वह और भी चिढ़ गया तथा उनकी ओर इस प्रकार मुँह फैलाकर दौड़ा, मानो आकाश को पी जायगा। उसने भगवान के पास पहुँचकर दुलत्ती झाड़ी।

 

परन्तु भगवान ने उससे अपने को बचा लिया। कृष्ण ने अपने दोनों हाथों से उसके दोनों पिछले पैर पकड़ लिये और जैसे गरुड़ साँप को पकड़ कर झटक देते हैं, उसी प्रकार क्रोध से उसे घुमाकर बड़े अपमान के साथ चार सौ हाथ की दूरी पर फेंक दिया और स्वयं अकड़कर खड़े हो गये ।

 
थोड़ी ही देर के बाद केशी फिर सचेत हो गया और उठ खड़ा हुआ। इसके बाद वह क्रोध से से तिलमिलाकर और मुँह फाड़कर बड़े वेग से भगवान की ओर झपटा। उसको दौड़ते देख भगवान मुसकराने लगे। उन्होंने अपना बायाँ हाथ उसके मुँह में इस प्रकार डाल दिया, जैसे सर्प बिना किसी आशंका के अपने बिल में घुस जाता है ।

 

शुकदेव जी महाराज कहते हैं परीक्षित्! भगवान का अत्यन्त कोमल करकमल भी उस समय ऐसा हो गया, मानो तपाया हुआ लोहा हो। उसका स्पर्श होते ही केशी के दाँत टूट-टूटकर गिर गये और जैसे जलोदर रोग उपेक्षा कर देने पर बहुत बढ़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्ण का भुजदण्ड उसके मुँह में बढ़ने लगा । अचिन्त्यशक्ति भगवान श्रीकृष्ण का हाथ उसके मुँह में इतना बढ़ गया कि उसकी साँस के भी आने-जाने का मार्ग न रहा। अब तो दम घुटने के कारण वह पैर पीटने लगा। उसका शरीर पसीने से लथपथ हो गया, आँखों की पुतली उलट गयी, वह मल-त्याग करने लगा। थोड़ी ही देर में उसका शरीर निश्चेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा तथा उसके प्राण-पखेरू उड़ गये ।

 

उसका निष्प्राण शरीर फूला हुआ होने के कारण ही पकी ककड़ी की तरह फट गया। महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण ने उसके शरीर से अपनी भुजा खींच ली। उन्हें इससे कुछ भी आश्चर्य या गर्व नहीं हुआ। बिना प्रयत्न के ही शत्रु का नाश हो गया।

 

देवताओं को अवश्य ही इससे बड़ा आश्चर्य हुआ। वे प्रसन्न हो-होकर भगवान के ऊपर फूल बरसाने और उनकी स्तुति करने लगे।

 

Narada Stuti Krishna : नारद द्वारा कृष्ण की स्तुति

कंस से लौटकर देवर्षि नारद भगवान श्री कृष्ण के पास आये हैं। और भगवान की सुंदर स्तुति करते हुए कहते हैं की – ‘सच्चिदानंदस्वरुप श्रीकृष्ण! आपका स्वरुप मन और वाणी का विषय नहीं है। आप योगेश्वर हैं। सारे जगत् का नियन्त्रण आप ही करते हैं। आप सबके ह्रदय में निवास करते हैं और सब-के-सब आपके ह्रदय में निवास करते हैं। आप भक्तों के एकमात्र वांछनीय, यदुवंश-शिरोमणि और हमारे स्वामी हैं । जैसे एक ही अग्नि सभी लकड़ियों में व्याप्त रहती है, वैसे एक ही आप समस्त प्राणियों के आत्मा हैं। आत्मा के रूप में होने पर भी आप अपने को छिपाये रखते हैं; क्योंकि पंचकोशरूप गुफाओं के भीतर रहते हैं। फिर भी पुरुषोत्तम के रूप में, सबके नियन्ता के रूप में और सबके साक्षी के रूप में आपका अनुभव होता ही है ।

 

प्रभो! आप सबके अधिष्ठान और स्वयं अधिष्ठानरहित हैं। आपने सृष्टि के प्रारम्भ में अपनी माया से ही गुणों की सृष्टि की और उन गुणों को ही स्वीकार करके आप जगत् की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय करते रहते हैं। यह सब करने के लिये आपको अपने से अतिरिक्त और किसी भी वस्तु आवश्यकता नहीं है। क्योंकि आप सर्वशक्तिमान् और सत्यसंकल्प हैं । वही आप दैत्य, प्रमथ और राक्षसों का, जिन्होंने आजकल राजाओं का वेष धारण कर रखा है, विनाश करने के लिये तथा धर्म की मर्यादाओं की रक्षा करने के लिये यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं । यह बड़े आनन्द की बात है कि आपने खेल-ही-खेल में घोड़े के रूप में रहने वाले इस केशी दैत्य को मार डाला। इसकी हिनहिनाहट से डरकर देवता लोग अपना स्वर्ग छोड़कर भाग जाया करते थे ।

 

प्रभो! अब परसों मैं आपके हाथों चाणूर, मुष्टिक, दूसरे पहलवान, कुवलयापीड हाथी और स्वयं कंस को मरते देखूँगा।

अब आपकी मथुरा और द्वारिका लीला को देखने के लिए मैं ललायित हो रहा हूँ‘।

 

प्रभो! आप विशुद्ध वज्ञानघन हैं। आपके स्वरुप में और किसी का अस्तित्व है ही नहीं। आप नित्य-निरन्तर अपने परमानन्दस्वरुप में स्थित रहते हैं। इसलिये सारे पदार्थ आपको नित्य प्राप्त ही हैं। आपका संकल्प अमोघ है। आपकी चिन्मयी शक्ति के सामने माया और माया से होने वाला यह त्रिगुणमय संसार-चक्र नित्यनिवृत है—कभी हुआ ही नहीं। ऐसे आप अखण्ड, एकरस, सच्चिंदानंदस्वरुप, निरतिशय ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ।

 

आप सबके अन्तर्यामी और नियन्ता हैं। अपने-आपमें स्थित, परम स्वतन्त्र हैं। जगत् और उसके अशेष विशेषों—भाव-अभावरूप सारे भेद-विभेदों की कल्पना केवल आपकी माया से ही हुई है। इस समय आपने अपनी लीला प्रकट करने के लिये मनुष्य का-सा श्रीविग्रह प्रकट किया है और आप यदु, वृष्णि तथा सात्वतवंशियों के शिरोमणि बने हैं। प्रभो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ’।

 
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान के परमप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजी ने इस प्रकार भगवान की स्तुति और प्रणाम किया। भगवान के दर्शनों के आह्लाद से नारदजी का रोम-रोम खिल उठा। तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्त करके वे चले गये।

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