X Karma Akarma Vikarma

Karma Yoga Kya hai | Shrimad Bhagwat Geeta

Karma Yoga Kya hai | Shrimad Bhagwat Geeta

कर्म योग क्या है | श्रीमद भगवत गीता

What is Karma Yoga in hindi

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम कर्म करो और फल की इच्छा मत रखो। तुम कर्मयोग(Karma yoga) करो। भगवान अर्जुन को बताते हैं कि आप कर्म ऐसे करो जैसे यज्ञ कर रहे हो। 

अर्जुन पूछता है कि – हे केशव! तुम कहते हो कि प्राणी को सारे कर्म इस प्रकार करने चाहिए जैसे वो भगवान की पूजा कर रहा हो अथवा लोक कल्याण के लिए कोई यज्ञ कर रहा हो जैसे द्रव्य यज्ञ, ज्ञान यज्ञ आदि!

Read : वास्तव में यज्ञ क्या होता है?

तो हे माधव! मेरे मार्गदर्शन के लिए मुझे ये बताओ कि मेरे लिए कौनसा यज्ञ उचित होगा?

कृष्ण कहते हैं – रण यज्ञ।
अर्जुन बोले – रण यज्ञ?

कृष्ण कहते हैं – हाँ पार्थ! तुम एक क्षत्रिय हो, धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करके तुम इस युद्ध भूमि पर आये हो। इसलिए समय तुम्हें सबसे रण यज्ञ ही करना चाहिए अर्थात युद्ध करना चाहिए।

हे पार्थ! कर्म योगी का जीवन भी एक यज्ञ ही होता है। इसलिए तुम भी आशक्ति से मुक्त होकर स्वधर्म पालन करो, युद्ध करो।
हे पार्थ! यदि तुम धर्म के लिए युद्ध रूपी यज्ञ करोगे तो दूसरे लोग भी तुमसे धर्म की प्रेरणा लेंगे। क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, अन्य पुरुष वैसा ही आचरण करते हैं। सब उसी का अनुसरण करते हैं क्योंकि बड़ों का अनुसरण छोटे तो करते ही हैं।

हे अर्जुन! मेरी और देखो, यदि मैं भी तटस्थ होकर निष्क्रिय हो जाऊँ, न्याय का समर्थन ना करूँ, अन्याय का प्रतिरोध ना करूँ तो लोग मेरा अनुसरण करके निष्क्रिय हो जायेंगे। कर्म का त्याग करेंगे और इस लोक का सारा विधान अस्त-व्यस्त हो जायेगा। संसार नष्ट हो जायेगा। इसलिए श्रेष्ठ लोगों को दुसरो को अधर्म से बचाने और धर्म के रास्ते पर चलाने के लिए आदर्श कर्मों का उदाहरण दिखाना पड़ता है।

मैं भी इसी उद्देश्य से कर्म करता हूँ। इसलिए नहीं करता कि मुझे कर्म करके कुछ पाना है, असाध्य को साधना है। सब तो मेरे वश में है।

 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थ – श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।3.22
अर्थ :- हे पार्थ मुझे तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है फिर भी मैं कर्तव्यकर्म में ही लगा रहता हूँ।

श्रेष्ठ पुरुष जिस ओर रथ को गमन करें, चलते हैं पग चिन्हों पर उनके,
उनका दिया प्रमाण बनता है लोक धर्म, आचरण करें सब उन्ही को देख सुन के,
मेरे लिए कोई कर्तव्य न अप्राप्य कुछ, फिर भी मैं चलता हूँ कर्म पथ चूम के,
ऐसा न करूँ तो बड़ी हानि होगी पार्थ क्योंकि मुझही को आदर्श मान प्राणी त्रिभुवन के।

कृष्ण बोलते हैं – हे पार्थ! अहंकारी मनुष्य समझता है कि वो स्वयं कर्म कर रहा है, परन्तु वास्तव में इसका कर्ता साक्षात् ईश्वर है। ईश्वर तुमसे कर्म करवा रहा है। ये मान कर तू अपने सारे कर्म मुझको अर्पण कर दो। कर्मफल की आशा छोड़कर युद्ध करो। अर्जुन तुम मेरे मित्र हो, सखा हो, फिर भी मोह-माया के अधीन कैसे हो गए?

 

याद रखो पार्थ कि अधर्म का साथ देने वालों का विनाश अधर्मियों की तरह ही होता है और जो तुम्हारी तरह धर्म के मार्ग से हट जाता है और धर्म पर चलने वालों का साथ नहीं देता वो अनजाने में अधर्म का ही साथ देता है, अधर्मियों की सहायता करता है। इसलिए तुम हथियार डालकर धर्मराज युधिष्ठिर का नहीं, अधर्मी दुर्योधन का साथ दे रहे हो।

 

हे अर्जुन! तुम महात्मा हो, महात्मा। जो दूसरों के लिए जीते और दूसरों के लिए मरते हैं। वो अपना जीवन और अपनी मृत्यु दोनों ही लोक कल्याण के लिए समर्पित करते हैं। इसलिए तुम्हें भी लोक कल्याण के लिए जीवन मृत्यु के स्तर से उठकर सोचना और निष्काम कर्म करना चाहिए।

 

हे अर्जुन! जीवन देने वाला और जीवन लेने वाला मैं हूँ। जन्म भी मैं हूँ। मृत्यु भी मैं हूँ।

 

हे अर्जुन! जो अज्ञानी मेरी निंदा करते हैं, मेरे बताये हुए कर्मयोग को नहीं अपनाते वो नष्ट हो जाते हैं। क्योंकि जो अहंकारी होते हैं वो अपने अहम् से बने रहते हैं इसलिए अपने आपको समर्पित नहीं करते। समर्पण का अर्थ है – अपने आप को, अपने सम्पूर्ण अहम् को प्रभु के चरणों में विलीन कर देना।

इस प्रकार जो पूर्ण समर्पण करता है वो चाहे संसार का सबसे बड़ा दुराचारी भी हो, मैं उसे तत्काल उसे अपनी शरण में लेकर निष्पाप कर देता हूँ।

 

हे पार्थ! जैसे सूर्य उदय होते ही रात का अंधकार नष्ट हो जाता है वैसे ही ज्ञान का प्रकाश अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर देता है। फिर मनुष्य परमात्मा की ओर जाने वाले मार्ग से कभी भटकता नहीं, विचलित होता नहीं। ज्ञान का साक्षात्कार होने के कारण मनुष्य जान जाता है कि एक ही कर्म पुण्य कैसे बनता है और वही कर्म पाप कैसे बन जाता है।

अर्जुन पूछता है – एक ही कर्म पुण्य भी हो सकता है और पाप भी? वो कैसे?

कृष्ण कहते हैं – मैं बताता हूँ पार्थ, उदाहरण के तौर पर एक कर्म को लो। एक मनुष्य ने दूसरे मनुष्य की हत्या कर दी है, तो मुख्य कर्म क्या हुआ?
हत्या करना। परन्तु यही कर्म पुण्य भी हो सकता है और पाप भी।

अर्जुन पूछता है – वो कैसे?

कृष्ण बताते हैं- एक मनुष्य किसी कमजोर, बूढ़े व्यक्ति का धन लूटने के लिए उसकी हत्या कर देता है। तो वो क्या हुआ?
अर्जुन कहता है – निश्चय ही वो पाप है।

कृष्ण पूछते हैं – यदि एक दुष्ट मनुष्य किसी अबला स्त्री के साथ जबरदस्ती बलात्कार करने की कोशिश कर रहा है तो उस अबला की रक्षा के लिए यदि बलात्कार करने वाले की हत्या कर दी जाये तो वो क्या होगा?

अर्जुन कहते हैं – ये तो स्पष्ट है कि किसी भी सहाय अबला की रक्षा करना पुण्य होगा।

कृष्ण कहते हैं- तुमने स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर दे दिया पार्थ! कर्म तो वो ही रहा, किसी की हत्या करना परन्तु उस कर्म के पीछे भावना क्या है? मारने वाले की नियत क्या है? इसी के फर्क से एक ही कर्म पाप हो सकता है अथवा पुण्य।

हे अर्जुन! जिस भावना, जिस नियत से मनुष्य कर्म करता है उस नियत के कारण एक ही कर्म किसी के लिए पाप बन जाता है तो किसी के लिए पुण्य बन जाता है।

Read : मन पर कण्ट्रोल कैसे करें?

Read : स्थितप्रज्ञ क्या है?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.