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kalyavan and krishna ranchod Story in hindi

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कालयवन और कृष्ण रणछोड़ कहानी/कथा

जिस समय भगवान श्रीकृष्ण मथुरा नगर के मुख्य द्वार से निकले, उस समय ऐसा मालूम पड़ा मानो पूर्व दिशा से चंद्रोदय हो रहा हो। भगवान का बड़ा ही सुंदर रूप है और भगवान ने पीताम्बर धारण किया हुआ है। उन्हें देखकर कालयवन ने निश्चय किया कि ‘यही पुरुषवासुदेव है। क्योंकि नारदजी ने जो-जो लक्षण बतलाये थे—वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह, चार भुजाएँ, कमल के-से- नेत्र, गले में वनमाला और सुन्दरता की सीमा; वे सब इसमें मिल रहे हैं। इसलिये यह कोई दूसरा नहीं हो सकता। इस समय यह बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के पैदल ही इस ओर चला आ रहा है, इसलिये मैं भी इसके साथ बिना अस्त्र-शस्त्र के ही लडूँगा’।

Ranchod Krishna :  रणछोड़ कृष्ण 

जब कालयवन भगवान श्रीकृष्ण कि ओर दौड़ा, तब वे दूसरी ओर मुँह करके रणभूमि से भाग चले और उन योगिदुर्लभ प्रभु को पकड़ने के लिये कालयवन उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा।  रणछोड़ भगवान लीला करते हुए भाग रहे थे; कालयवन पग-पग पर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। इस प्रकार भगवान उसे बहुत दूर एक पहाड़ की गुफा में ले गये। 

 

 कालयवन पीछे से बार-बार आवाज लगाकर कहता है-   ‘अरे भाई! तुम परम यशस्वी यदुवंश में पैदा हुए हो, तुम्हारा इस प्रकार युद्ध छोड़कर भागना उचित नहीं है।’

 

Kalyavan Death Story hindi : कालयवन की मृत्यु

फिर भगवान उस पर्वत की गुफा में घुस गये। उसके पीछे कालयवन भी घुसा। वहाँ उसने एक दूसरे ही मनुष्य को सोते हुए देखा । उसे देखकर कालयवन ने सोचा ‘देखो तो सही, यह मुझे इस प्रकार इतनी दूर ले आया और अब इस तरह—मानो इसे कुछ पता ही न हो—साधु बाबा बनकर सो रहा है।’ यह सोचकर उसने एक कसकर एक लात मारी ।

 

वह पुरुष वहाँ बहुत दिनों से सोया हुआ था। पैर की ठोकर लगने से वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें खोलीं। इधर-उधर देखने पर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखायी दिया। वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर जगाये जाने से कुछ रुष्ट हो गया था। उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन के शरीर में आग पैदा हो गयी और वह क्षणभर में जलकर ढेर हो गया। ये राजा मुचकुन्द थे। जिन्होंने कालयवन को जलाकर भस्म कर दिया था।

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राजा मुचुकुन्द को दर्शन देने के बाद भगवान श्रीकृष्ण मथुरापुरी में लौट आये। अब तक कालयवन की सेना ने उसे घेर रखा था। अब उन्होंने म्लेच्छों की सेना का संहार किया और उसका सारा धन छीनकर द्वारका को ले चले । जिस समय भगवान श्रीकृष्ण के आज्ञानुसार मनुष्यों और बैलों पर वह धन ले जाया जाने लगा, उसी समय मगधराज जरासन्ध फिर (अठारहवीं बार) तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर आ धमका।

 

शत्रु-सेना का प्रबल वेग देखकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम मनुष्यों की-सी लीला करते हुए उसके सामने से बड़ी फुर्ती के साथ भाग निकले। उनके मन में तनिक भी भय न था। फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गये हों—इस प्रकार का नाट्य करते हुए, वह सब-का-सब धन वहीँ छोड़कर अनेक योजनों तक वे अपने कमलदल के समान सुकोमल चरणों से ही—पैदल भागते चले गये । जब महाबली मगधराज जरासन्ध ने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम तो भाग रहे हैं, तब वह हँसने लगा और अपनी रथ-सेना के साथ उनका पीछा करने लगा। जरासंध उन्हें कहने लगा अरे रणछोड़ कृष्ण कहाँ भगा जा रहा है।

 

बहुत दूर तक दौड़ने के कारण दोनों भाई कुछ थक-से गये। अब वे बहुत ऊँचे प्रवर्षण पर्वत पर चढ़ गये। उस पर्वत का ‘प्रवर्षण’ नाम इसलिये पड़ा था कि वहाँ सदा ही मेघ वर्षा किया करते थे । परीक्षित्! जब जरासन्ध ने देखा कि वे दोनों पहाड़ में छिप गये और बहुत ढूँढ़ने पर भी पता न चला, तब उसने ईधन से भरे हुए प्रवर्षण पर्वत के चारों ओर आग लगवाकर उसे जला दिया । जब भगवान ने देखा कि पर्वत के छोर जलने लगे हैं, तब दोनों भाई जरासन्ध की सेना के घेरे को लाँघते हुए बड़े वेग से उस ग्यारह योजन (चौवालीस कोस) ऊँचे पर्वत से एकदम नीचे धरती-पर कूद आये । राजन्! उन्हें जरासन्ध ने अथवा उसके किसी सैनिक ने देखा नहीं और वे दोनों भाई वहाँ से चलकर फिर फिर अपनी समुद्र से घिरी हुई द्वारकापुरी में चले आये । जरासन्ध ने झूठमूठ ऐसा मान लिया कि श्रीकृष्ण और बलराम तो जल गये और फिर वह बहुत बड़ी सेना लौटाकर मगधदेश को चला गया । यह बात मैं तुमसे पहले ही (नवम स्कन्ध में) कह चुका हूँ कि आनर्तदेश के राजा श्रीमान् रैवतजी ने अपनी रेवती नाम की कन्या ब्रम्हाजी की प्रेरणा से बलरामजी के साथ ब्याह दी ।

 

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