Gopi Venu Geet in sanskrit and hindi

Gopi Venu Geet in sanskrit and hindi

गोपी वेणु गीत

शुकदेव(shukdev) जी महाराज ने सुन्दर ग्रीष्म ऋतू का वर्णन किया हैं, इसके बाद वर्षा ऋतू का वर्णन किया हैं और फिर वर्षा ऋतू की दिव्यता का अति सुंदर वर्णन किया। वर्षा ऋतू के बाद शरद ऋतू का वर्णन शुकदेव जी महाराज ने किया हैं। और गोपियों ने सुंदर वेणु गीत गया हैं। जिसके केवल ये ही भाव हैं की अगर संसार में कोई देखने योग्य हैं तो वे केवल भगवान श्री कृष्ण हैं। अगर आँखे भगवान को छोड़कर और किसी को देखती हैं तो वो आँखे जल जानी चाहिए। गोपियाँ एक क्षण के लिए भी परमात्मा श्री कृष्ण से दूर नही होना चाहती। अपनी पलकों तक को झपकने नही देना चाहती। गोपियाँ कह रही हैं भगवान के अवतार लेने से चेतन और जड़ सभी उनके रूप रस का माधुर्य का पान कर रहे हैं। ये गऊ, ये वेणु(वंशी), ये नदियां और ये ग्वाल बाल, ये गिरिराज सभी बड़भागी हैं। जिन्हे भगवान का सानिध्य प्राप्त हो रहा हैं।

श्रीमद भागवत में सुंदर वेणु गीत(Venu geet) का वर्णन आया है-

श्रीशुक उवाच(srisuk uvach:-

इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना ।
न्यविशद्वायुना वातं स गोगोपालकोऽच्युतः ।।१।।

अर्थ:- श्री शुकदेवजी कहते हैं – परीक्षित ! शरद ऋतू के कारण वह वन बड़ा सुन्दर हो रहा था । जल निर्मल तह और जलाशयों में खिले हुए कमलों की सुगन्ध से सनकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी । भगवान श्री कृष्ण ने गौवों और ग्वाल बालों के साथ उस वन में प्रवेश किया ।।1।।

कुसुमितवनराजिशुष्मिभृङ्ग द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् ।।
मधुपतिरवगाह्य चारयन्गाः सहपशुपालबलश्चुकूज वेणुम् ।।२।।

अर्थ:- सुन्दर-सुन्दर पुष्पों से परिपूर्ण हरी-हरी वृक्ष-पंक्तियों में मतवाले भौरें स्थान-स्थान पर गुनगुना रहे थे, जिससे उस वन के सरोवर, नदियाँ और पर्वत सब के सब गूंजते रहते थे । मधुपति श्री कृष्ण ने बलरामजी और ग्वाल-बालों के साथ उसके भीतर घूंसकर गौवों को चराते हुए अपनी बाँसुरी पर बड़ी मधुर तान छेड़ी ।।२।।

तद्व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम् ।
काश्चित्परोक्षं कृष्णस्य स्वसखीभ्योऽन्ववर्णयन् ।।३।।

अर्थ:- श्री कृष्ण की वह बंशीध्वनि भगवान के प्रति प्रेमभाव को उनके मिलन की आकाँक्षा को जगाने वाली थी । (उसे सुनकर गोपियों का हृदय प्रेम से परिपूर्ण हो गया) वे एकान्त में अपनी सखियों से उनके रूप, गुण और बंशीध्वनि के प्रभाव वर्णन करने लगीं ।।३।।

तद्वर्णयितुमारब्धाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम् ।
नाशकन्स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप ।।४।।

अर्थ:- व्रज की गोपियों ने बंशीध्वनि का माधुर्य आपस में वर्णन करना चाहा तो अवश्य परन्तु वंशी का स्मरण होते ही उन्हें श्रीकृष्ण की मधुर चेष्टाओं की, प्रेमपूर्ण चितवन, भौहों के इशारे और मधुर मुस्कान आदि की याद हो आयी । उनकी भगवान से मिलने की आकाँक्षा और भी बढ़ गयी । उनका मन हाथ से निकल गया । वे मन ही मन वहाँ पहुँच गयी, जहाँ श्रीकृष्ण थे । अब अब उनकी वाणी बोले कैसे ? वे उसके वर्णन में असमर्थ हो गयी ।।4।।

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं,
बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ।
रन्ध्रान्वेणोरधरसुधयापूरयन्गोपवृन्दैर्-
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः ।।५।।

अर्थ:- (वे मन ही मन देखने लगीं, कि) श्रीकृष्ण ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन में प्रवेश कर रहे हैं । उनके सिरपर मयूरपिच्छ है और कानों पर कनेर के पीले-पीले पुष्प शरीर पर सुनहला पीताम्बर और गले में पाँच प्रकार के सुगन्धित पुष्पों की बनी बैजयन्ती माला है । रंगमंच पर अभिनय करते हुए श्रेष्ठ नट जैसा क्या सुन्दर वेश है । बाँसुरी के छिद्रों को वे अपने अधरामृत से भर रहे हैं । उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी लोकपावन कीर्ति का गान कर रहे हैं । इस प्रकार वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ वह वृन्दावन धाम उनके उनके चरण चिन्हों से और भी रमणीय बन गया है ।।5।।

इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् ।।
श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे ।।६।।

अर्थ:- परीक्षित ! यह वंशीध्वनि जड़-चेतन समस्त भूतों का मन चुरा लेती है । गोपियों ने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं । वर्णन करते-करते वे तन्मय ही गयीं और श्रीकृष्ण को पाकर आलिंगन करने लगीं ।।6।।

श्रीगोप्य ऊचुः – srigopye uchu:-

अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः ,
सख्यः पशूननविवेशयतोर्वयस्यैः ।।
वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनवेणुजुष्टं,
यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ।।७।।

अर्थ:- गोपियाँ आपस में बातचीत करने लगी – अरी सखीं ! हमने तो आँखवालों के जीवन की और उनकी आँखों की बश यही इतनी ही सफलता समझी है, और तो हमें कुछ मालूम ही नहीं है । वह कौन सा लाभ है ? वह यही है, कि जब श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और गौरसुन्दर बलराम ग्वालबालों के साथ गायों को हाँककर वन में ले जा रहे हों या लौटाकर ला रहे हों, उन्होंने अपने अधरों पर मुरली धर रखी हो और प्रेमभरी तिरछी चितवन से हमारी ओर देख रहे हों, उस समय हम उनकी मुख माधुरी का पान करती रहें ।।7।।

चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज,
मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेशौ ।।
मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां,
रङ्गे यथा नटवरौ क्वच गायमानौ ।।८।।

अर्थ:- अरी सखी ! जब वे आम की नयी कोपलें, मोरों के पंख, फूलों के गुच्छे, रंग-विरंगे कमल और कुमुद की मालाएँ धारण कर लेते हैं, श्रीकृष्ण के साँवरे शरीर पर पीताम्बर और बलराम के गोर शरीर पर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा ही विचित्र बन जाता है । ग्वालबालों की गोष्ठी में वो दोनों बीचोबीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीत की तान छेड़ देते हैं । मेरी प्यारी सखी ! उस समय ऐसा जान पड़ता है मानों दो चतुर नट रंगमंच पर अभिनय कर रहे हों । मैं क्या बताऊँ कि उस समय उनकी कितनी शोभा होती है ।।8।।

गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुर्-
दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम् ।।
भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो,
हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्यः ।।९।।

अर्थ:- अरी गोपियों ! यह वेणु पुरुष जाती का होनेपर भी पूर्वजन्म में न जाने ऐसा कौन सा साधन-भजन कर चूका है, कि हम गोपियों की अपनी संपत्ति दामोदर के अधरों की सुधा स्वयं ही इस प्रकार पिये जा रहा है कि हमलोगों के लिए थोडा सा भी रस शेष नहीं रह जायेगा । इस वेणु को अपने रस से सींचने वाली हृदिनियाँ आज कमलों के मिस रोमाँचित हो रही है और अपने वंश में भगवत्प्रेमी संतानों को देखकर श्रेष्ठ पुरुषों के समान वृक्ष भी इसके साथ अपना सम्बन्ध जोडकर आँखों से आनन्दाश्रु बहा रहे हैं ।।9।।

वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं,
यद्देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि ।।
गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं,
प्रेक्ष्याद्रिसान्ववरतान्यसमस्तसत्त्वम् ।।१०।।
धन्याः स्म मूढगतयोऽपि हरिण्य एता,
या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम् ।।
आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः ,
पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ।।११।।

अर्थ:- अरी सखी ! यह वृन्दावन वैकुण्ठलोक तक पृथ्वी की कीर्ति का विस्तार कर रहा है । क्योंकि यशोदानन्दन श्रीकृष्ण के चरण कमलों के चिन्हों से यह चिन्हित हो रहा है । सखी ! जब श्रीकृष्ण अपनी मुनिजन मोहिनी मुरली बजाते हैं,

अगले पेज पर जाएं

One thought on “Gopi Venu Geet in sanskrit and hindi

  1. I would like to see panchgeet in pdf format so it is easy to download.
    It was amazing to read with hindi translation.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.