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What is Dhyana Yoga/Meditation in hindi | ध्यान योग क्या है

What is Dhyana Yoga/Meditation in hindi | ध्यान योग क्या है 

ध्यान योग क्या है(Dhyana Yoga Kya hai) श्रीमद भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को ध्यानयोग(DhyanaYoga) के बारे में बता रहे हैं कि  

मुझे सम्पूर्ण साधने की एक ही शर्त है, मुझमें मन लगाए, मेरा ध्यान लगाए।

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अर्जुन पूछता है – इस सम्बन्ध में एक विचार और है, आपका ध्यान लगाते समय मन में केवल आप रहें और संसार का कोई विचार बाधा न डाले, इसका कोई तरीका तो होगा?
कृष्ण कहते हैं – हाँ! एक आसान तरीका तो है परन्तु वो कोई विधि नहीं है। बल्कि एक गुर है, एक यौगिक कला है। जिससे ध्यान लगाने में बड़ी सहायता होती है।

 

अर्जुन पूछता है – वो आसान तरीका, वो यौगिक कला क्या है मधुसूदन?
कृष्ण कहते हैं – सुनों अर्जुन! संसार के झमेलों से बचने के लिए मनुष्य एकांत में बैठकर मन को प्रभु के ध्यान में लगाए। क्योंकि एकांत में मनुष्य अपने भीतर झांक सकता है।

 

अर्जुन पूछता है – परन्तु ध्यान लगाने के लिए अपने अंतर् में झाँकने की क्या आवश्यकता है?
कृष्ण बताते हैं – हे अर्जुन! तुम भूल रहे हो कि परमात्मा का अंश, अर्थात आत्मा मनुष्य के भीतर ही वास करती है। इसी आत्मा से सम्पर्क ही प्रभु से मिलन का पहला चरण है। इसलिए हे अर्जुन! जो मुझसे मिलन चाहता है उसे सबसे पहले अपने अंतर् में ही झांकना चाहिए और ये तभी संभव हो सकता है जब मनुष्य का अपना शरीर उसके नियंत्रण में हो। यदि देह काबू में ना हो तो मनुष्य को ध्यान लगाने का उद्देश्य नहीं मिल पायेगा।

 

अर्जुन कहता है – हे योगेश्वर! ध्यान लगाने के अंतिम उद्देश्य क्या है?
कृष्ण बताते हैं – ध्यान योग का उद्देश्य परमात्मा से सम्पर्क करना होता है। परन्तु इसके प्रथम चरण में मनुष्य को आत्म शुद्धि प्राप्त होती है, स्वच्छता मिलती है और ध्यान लगाने वाले का अंतर् निर्मल हो जाता है।
हे अर्जुन! जब तक मनुष्य अपने अंतर् की शुद्धि नहीं कर लेता, परमात्मा से न तो सम्पर्क कर सकता है और न ही आत्मा परमात्मा में लीन हो सकती है और ये भी समझ लो कि जब ध्यान लगाने का पहला उद्देश्य क्योंकि अन्तः शुद्धि है इसलिए वो स्थान भी पवित्र होना चाहिए जहाँ ध्यान लगाया जाता है।

 

हे अर्जुन! मेरा ध्यान लगते समय मनुष्य को चाहिए कि वो अचल बैठकर अपनी पीठ, सिर और गले को समान और सीधा रखे और अपनी दृष्टि को अपने नाक के अगले भाग पर इस तरह जमाये कि दूसरी सारी दिशाएं आँखों से ओझल हो जाएँ। ऐसा करने से अपने आस-पास के वातावरण से उसकी इन्दिर्यों का सम्पर्क टूट जायेगा और मनुष्य अपने अंतर् में मन लगा सकेगा। हे पार्थ –

 

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।
अर्थ : – काया शिर और ग्रीवा को सीधे अचल धारण करके तथा दिशाओं को न देखकर केवल अपनी नासिका के अग्रभागको देखते हुए स्थिर होकर बैठे।

 

अर्जुन पूछते हैं – हे मधुसूदन! ये तो बड़ा ही सहज और अच्छा तरीका है। इस ढंग से तो कोई भी मनुष्य आसानी से ध्यान लगा सकेगा।
कृष्ण कहते हैं- ये ठीक है अर्जुन! परन्तु वो मनुष्य मुझमें ध्यान नहीं लगा सकेगा, जिसके जीवन में संतुलन ना हो। ध्यान लगाने में सफलता के लिए मनुष्य को संतुलन का पालन करने वाला होना चाहिए।

मेरे भक्त को चाहिए कि वो ना इतना खाये कि यूँ लगे जैसे वो केवल खाने के लिए जीता है।
ना ही इतना कम खाये कि हड्डियों का ढांचा बन जाये।
ना इतना सोये कि दिन को भी रात समझे, न इतना कम सोये कि रात को भी रात न समझे।

 

युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दू:खहा।। (गीता 6.17)
अर्थ:– जिसके आहार, विहार, विचार एवम् व्यवहार संतुलित तथा संयमित हैं, जिसके कार्यों में दिव्यता, मन में सदा पवित्रता एवम् शुभ के प्रति अभीप्सा है। जिसका शयन एवम् जागरण नियमित है वही सच्चा योगी है।

 

यदि सुख मिले तो खुशियों से नाचने न लगे और यदि दुःख मिले तो रो-रो कर अपने आपको हलकान न करे। दुःख-सुख की हवा के झोंकों से न भड़कने-बुझने वाला मनुष्य उस दीपक की ज्योति की भांति होता है जो तेज हवा में भी सीधी और अडोल रहती है।

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।
अर्थ:- जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक में कम्प नहीं होता वैसी ही उपमा आत्मा के ध्यान में लगे हुए उस योगी के समाहित चित्त की कही गयी है।

अर्जुन पूछते हैं – हे योगेश्वर! ये दुःख-सुख, ये प्यारी नींद, ये भिन्न-भिन्न और स्वादिष्ट भोजन आप ही का तो वरदान है। फिर इनका भरपूर आनंद ना लेना, ध्यान योग के लिए क्या वो आवश्यक है?

कृष्ण कहते हैं – हे अर्जुन! मैंने सुखों की माया मनुष्य के लिए ही रची है। वो इन सुखों का आनंद अवश्य ले, मैं ये नहीं चाहता कि मनुष्य दुःख में रहे, दरिद्रता में रहे। मैंने आनंद की रचना ही इसलिए की है कि समस्त प्राणी जीवन में आनंद से रहें। परन्तु इस आनंद में परमानन्द को भूल जाएँ, मैं ये नहीं चाहता। इसलिए कोई मनुष्य इस परमानन्द को पाना चाहता है, अर्थात ध्यानयोग द्वारा मुझ परमात्मा में लीन होना चाहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि वो इस माया में उलझा न रहे और मोक्ष प्राप्त करे अन्यथा जन्म-जन्मांतर के चक्रव्यूह में ऐसा फंस जायेगा कि निकल ही नहीं सकेगा।

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