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Balram Tirath Yatra Story in hindi

Balram Tirath Yatra Story in hindi

बलराम जी की तीर्थ यात्रा कहानी/कथा 

 

भगवान श्री कृष्ण ने शाल्व, उसके विमान सौभ, दन्तवक्त्र और विदूरथ को मारकर द्वारकापुरी में प्रवेश किया। देवता आदि सभी ने भगवान की स्तुति गाई है।

 

Romharshan Vadh by Balram : बलराम द्वारा रोमहर्षण का वध 

एक बार बलरामजी ने सुना कि दुर्योधनादि कौरव पाण्डवों के साथ युद्ध करने की तैयारी कर रहे हैं। वे मध्यस्थ थे, उन्हें किसी का पक्ष लेकर लड़ना पसंद नहीं था। इसलिये वे तीर्थों में स्नान करने के बहाने द्वारका से चले गये। सबसे पहले उन्होंने प्रभासक्षेत्र में स्नान किया और तर्पण तथा ब्राम्हणभोजन के द्वारा देवता, ऋषि, पितर और मनुष्यों को तृप्त किया। फिर बलराम जी अनेक तीर्थों में गए हैं।  यमुनातट और गंगातट के तीर्थों में होते हुए वे नैमिषारण्य में गये। उस क्षेत्र में बड़े-बड़े ऋषि सत्संगरूप महान् सत्र कर रहे थे । दीर्घकाल तक सत्संग सत्र का नियम लेकर बैठे हुए ऋषियों ने बलरामजी को आया देख अपने-अपने आसनों से उठकर उनका स्वागत-सत्कार किया और यथायोग्य प्रणाम-आशीर्वाद करके उनकी पूजा की।  वे अपने साथियों के साथ आसन ग्रहण करके बैठ गये और उनकी अर्चना -पूजा हो चुकी, तब उन्होंने देखा कि भगवान व्यास के शिष्य रोमहर्षण व्यासगद्दी पर बैठे हुए हैं।  बलरामजी ने देखा कि रोमहर्षणजी सूत-जाति में उत्पन्न होने पर भी उन श्रेष्ठ ब्राम्हणों से ऊँचें आसन पर बैठे हुए हैं और उनके आने पर न तो उठकर स्वागत करते हैं और न हाथ जोड़कर प्रणाम ही।

 

इस पर बलरामजी को क्रोध आ गया । वे कहने लगे कि ‘यह रोमहर्षण प्रतिलोम जाति का होने पर भी इन श्रेष्ठ ब्राम्हणों से तथा धर्म के रक्षक हम लोगों से ऊपर बैठा हुआ है, इसलिये यह बुरी बुद्धि वाला मृत्युदण्ड का पात्र है । भगवान व्यासदेव का शिष्य होकर इसने इतिहास पुराण, धर्मशास्त्र आदि बहुत-से शास्त्रों का अध्ययन भी किया है; परन्तु अभी इसका अपने मन पर संयम नहीं है। जो लोग धर्म का चिन्ह धारण करते हैं, परन्तु धर्म का पालन नहीं करते, वे अधिक पापी हैं और वे मेरे लिये वध करने योग्य हैं।  इतना कहकर उन्होंने अपने हाथ में स्थित कुश की नोक से उन पर प्रहार कर दिया और वे तुरंत मर गये। सूतजी के मरते ही सब ऋषि-मुनि हाय-हाय करने लगे, सबके चित्त खिन्न हो गये। उन्होंने बलराम से कहा की-‘प्रभो! आपने यह बहुत बड़ा अधर्म किया। सूतजी को हम लोगों ने ही ब्राम्हणोंचित आसन पर बैठाया था और जब तक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तब तक के लिये उन्हें शारीरिक कष्ट से रहित आयु भी दे दी थी। आपने अनजान में यह ऐसा काम कर दिया, जो ब्रम्हह्त्या के समान है। यदि आप किसी की प्रेरणा के बिना स्वयं अपनी इच्छा से ही इस ब्रम्हहत्या का प्रायश्चित कर लेंगे तो इससे लोगों को बहुत शिक्षा मिलेगी’ ।

 

तभी बलराम जी कहते हैं- मैं इस ब्रम्हहत्या का प्रायश्चित अवश्य करूँगा।

ऋषियों ने कहा—बलरामजी! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये जिससे आपका शस्त्र, पराक्रम और इनकी मृत्यु भी व्यर्थ न हो और हम लोगों ने उन्हें जो वरदान दिया था, वह भी सत्य हो जाय। बलराम ने कहा—ऋषियों! वेदों का ऐसा कहना है कि आत्मा ही पुत्र के रूप में उत्पन्न होता है। इसलिये रोमहर्षण के स्थान पर उनका पुत्र आप लोगों को पुराणों की कथा सुनायेगा। उसे मैं अपने शक्ति से दीर्घायु, इन्द्रियशक्ति और बल दिये देता हूँ ।

 

इसके अतिरिक्त आप लोग और जो कुछ भी चाहते हों, मुझसे कहिये। मैं आप लोगों की इच्छा पूर्ण करूँगा। अनजाने में मुझसे जो अपराध हो गया है, उसका प्रायश्चित भी आप लोग सोच-विचारकर बतलाइये; क्योंकि आप लोग इस विषय के विद्वान हैं।

 

ऋषियों ने कहा—बलरामजी! इल्वल का पुत्र बल्वल नाम का एक भयंकर दानव है। वह प्रत्येक पर्वत पर यहाँ आ पहुँचता है और हमारे इस सत्र को दूषित कर देता है। वह यहाँ आकर पीब, खून, विष्ठा, मूत्र, शराब और मांस की वर्षा करने लगता है। आप कृपा करके उसे मार डालिए। इसके बाद आप एकाग्रचित्त से तीर्थों में स्नान करते हुए बारह महीनों तक भारतवर्ष की परिक्रमा करते हुए विचरण कीजिये। इससे आपकी शुद्धि हो जायगी ।

 

 

पूर्व का दिन आने पर बड़ा भयंकर अंधड़ चलने लगा। धूल की वर्षा होने लगी और चारों ओर से पीब की दुर्गन्ध आने लगी । इसके बाद यज्ञशाला में बल्वल दानव ने मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओं की वर्षा की। फिर हाथ में त्रिशूल लिये वह खुद दिखायी पड़ा । उस का डील-डौल बहुत बड़ा था, ऐसा लगता था की मानो ढेर-का-ढेर कालिख इकठ्ठा कर दिया गया हो। उसकी चोटी और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबे के समान लाल-लाल थीं। बड़ी-बड़ी दाढ़ों और भौंहों के कारण उसका मुँह बड़ा भयावना लगता था।

 

उसे देखकर भगवान बलरामजी ने मूसल और हल का स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वे दोनों शस्त्र तुरंत वहाँ आ पहुँचे।

 

बलरामजी ने आकाश में विचरने वाले बल्वल दैत्य को अपने हल के अगले भाग से खींचकर उस ब्रम्हद्रोही के सिर पर बड़े क्रोध से एक मूसल कसकर जमाया, जिससे उसका ललाट फट गया और वह खून उगलता और चिल्लाता हुआ धरती पर गिर पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे वज्र की चोट खाकर गेरू आदि लाल हुआ कोई पहाड़ गिर पड़ा हो।

 

नैमिषारण्यवासी महाभाग्यवान् मुनियों ने बलरामजी की स्तुति की और उन्हें खूब आशीर्वाद दिया। इसके बाद ऋषियों ने बलरामजी को दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषण दिये तथा एक ऐसी वैजन्ती की माला भी दी, जो सौन्दर्य का आश्रय एवं कभी ने मुरझाने वाले कमल के पुष्पों से युक्त थी।

 

फिर बलरामजी ब्राम्हणों के साथ कौशिकी नदी के तट पर आये। वहाँ स्नान करके वे उस सरोवर पर गये, जहाँ से सरयू नदी निकलती है । वहाँ से सरयू के किनारे-किनारे चलने लगे, फिर उसे छोड़कर प्रयाग आये; वहाँ स्नान तथा देवता, ऋषि येवान्न पितरों का तर्पण करके वहाँ से पुलहाश्रम गये । वहाँ से गण्डकी, गोमती टाटा विपाशा नदियों में स्नान किया। इसके बाद गया में जाकर पितरों का वसुदेवजी के आज्ञानुसार पूजन-यजन किया। फिर गंगासागर-संगम पर गये; वहाँ भी स्नान आदि तीर्थ-कृत्यों से निवृत्त होकर महेन्द्र पर्वत पर गये। वहाँ परशुरामजी का दर्शन और अभिवादन किया। तदनन्तर सप्तगोदावरी, वेणा, पम्पा और भीमरथी आदि में स्नान करते हुए स्वामिकार्तिक का दर्शन करने गये तथा वहाँ से महादेवजी के निवास स्थान श्रीशैल पर पहुँचे। इसके बाद भगवान बलराम ने द्रविड़ देश के परम पुण्यमय स्थान वेंकटाचल (बालाजी) का दर्शन किया और वहाँ से वे कामाक्षी—शिवकांची, विष्णुकांची होते हुए तथा श्रेष्ठ नदी कावेरी में स्नान करते हुए पुण्यमय श्रीरंग क्षेत्र में पहुँचे। श्रीरंग क्षेत्र में भगवान विष्णु सदा विराजमान रहते हैं । वहाँ से उन्होंने विष्णु भगवान के क्षेत्र ऋषभ पर्वत, दक्षिण मथुरा तथा बड़े-बड़े महापापों को नष्ट करने वाले सेतुबन्ध की यात्रा की । वहाँ बलरामजी ने ब्राम्हणों को दस हजार गौएँ दान कीं। फिर वहाँ से कृतमाला और ताम्रपणीं नदियों में स्नान करते हुए वे मलयपर्वत पर गये। वह पर्वत सात कुलपर्वतों में से एक है।

 

वहाँ पर विराजमान अगस्त्य मुनि को को उन्होंने नमस्कार और अभिवादन किया। अगस्त्यजी ने आशीर्वाद और अनुमति प्राप्त करके बलरामजी ने दक्षिण समुद्र की यात्रा की। वहाँ उन्होंने दुर्गादेवी का कन्याकुमारी के रूप में दर्शन किया । इसके बाद वे फाल्गुन तीर्थ—अनन्तशयन क्षेत्र में गये और वहाँ के सर्वश्रेष्ठ पंचाप्सरस तीर्थ में स्नान किया। उस तीर्थ में सर्वदा विष्णु भगवान का सान्निध्य रहता है। वहाँ बलरामजी ने दस हजार गौएँ दान कीं । अब भगवान बलराम वहाँ से चलकर केरल और त्रिगर्त देशों में होकर भगवान शंकर के क्षेत्र गोकर्ण तीर्थ में आये। वहाँ सदा-सर्वदा भगवान शंकर विराजमान रहते हैं । वहाँ से जल से घिरे द्वीप में निवास करने वाली आर्यादेवी का दर्शन करने गये और फिर उस द्वीप से चलकर शूर्पारक-क्षेत्र की यात्रा की, इसके बाद तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या नदियों में स्नान करके वे दण्डकारण्य में आये । वहाँ होकर वे नर्मदाजी के तट पर गये। पर इस पवित्र नदी के तट पर ही माहिष्मतीपुरी है। वहाँ मनुतीर्थ में स्नान करके वे फिर प्रभासक्षेत्र में चले आये ।

 

 

वहीँ उन्होंने ब्राम्हणों से सुना कि कौरव और पाण्डवों के युद्ध में अधिकांश क्षत्रियों का संहार हो गया। उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि अब पृथ्वी का बहुत-सा भार उतर गया । जिस दिन रणभूमि में भीमसेन और दुर्योधन गदायुद्ध कर रहे थे, उसी दिन बलरामजी उन्हें रोकने के लिये कुरुक्षेत्र जा पहुँचे । महाराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने बलरामजी को देखकर प्रणाम किया तथा चुप हो रहे। वे डरते हुए मन-ही-मन सोचने लगे कि ये जाने क्या कहने के लिये यहाँ पधारे हैं ? उस समय भीमसेन और दुर्योधन दोनों ही हाथ में गदा लेकर एक-दूसरे को जीतने के लिये क्रोध से भरकर भाँति-भाँति के पैंतरे बदल रहे थे। उन्हें देखकर बलरामजी ने कहा— ‘राजा दुर्योधन और भीमसेन! तुम दोनों वीर हो। तुम दोनों में बल-पौरुष भी समान है। मैं ऐसा समझता हूँ कि भीमसेन में बल अधिक है और दुर्योधन ने गदा युद्ध में शिक्षा अधिक पायी है। इसलिये तुम लोगों-जैसे समान बलशालियों में किसी एक की जय या पराजय नहीं होती दीखती। अतः तुम लोग व्यर्थ का युद्ध मत करो, अब इसे बंद कर दो’ । बलरामजी की बात दोनों के लिये हितकर थी। परन्तु उन दोनों का वैरभाव इतना दृढ़ मूल हो गया था कि उन्होंने बलरामजी की बात न मानी। वे एक-दूसरे की कटुवाणी और दुर्व्यवहारों का स्मरण करके उन्मत्त-से हो रहे थे।

 

भगवान बलरामजी ने निश्चय किया की इनका भाग्य ऐसा ही है; इसलिये उसके सम्बन्ध में विशेष आग्रह न करके वे द्वारका लौट गये। द्वारका में उग्रसेन आदि गुरुजनों तथा अन्य सम्बन्धियों ने बड़े प्रेम से आगे आकर उनका स्वागत किया । वहाँ से बलरामजी फिर नैमिषारण्य क्षेत्र में गये। वहाँ ऋषियों ने विरोधभाव से—युद्धादि से निवृत्त बलरामजी के द्वारा बड़े प्रेम से सब प्रकार के यज्ञ कराये। परीक्षित्! सच पूछो तो जितने भी यज्ञ हैं, वे बलरामजी के अंग ही हैं। इसलिये उनका यह यज्ञानुष्ठान लोकसंग्रह के लिये ही था । सर्वसमर्थ भगवान बलराम ने उन ऋषियों को विशुद्ध तत्त्वज्ञान का उपदेश किया, जिससे वे लोग इस सम्पूर्ण विश्व को अपने-आप में और अपने-आपको सारे विश्व में अनुभव करने लगे । इसके बाद बलरामजी ने अपनी पत्नी रेवती के साथ यज्ञान्त-स्नान किया और सुन्दर-सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनकर अपने भाई-बन्धु तथा स्वजन-सम्बन्धियों के साथ इस प्रकार शोभायमान हुए, जैसे अपनी चन्द्रिका एवं नक्षत्रों के साथ चन्द्रदेव होते हैं ।  भगवान बलराम स्वयं अनन्त हैं। उनका स्वरुप मन और वाणी के परे हैं। उन्होंने लीला के लिये ही यह मनुष्यों का-सा शरीर ग्रहण किया है। उन बलशाली बलरामजी के ऐसे-ऐसे चरित्रों की गिनती भी नहीं की जा सकती । जो पुरुष अनन्त, सर्वव्यापक, अद्भुतकर्मा भगवान बलरामजी के चरित्रों का सायं-प्रातः स्मरण करता है, वह भगवान का अत्यन्त प्रिय हो जाता है।

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