Balram killed Davidh monkey story in hindi

Balram killed Davidh Monkey story in hindi 

बलराम द्वारा द्विविद वानर का उद्धार 

 

द्विविद नाम का एक वानर था। वह भौमासुर का सखा, सुग्रीव का मन्त्री और मैन्द का शक्तिशाली भाई था। जब उसे पता चला की भगवान श्री कृष्ण ने भौमासुर को मार डाला। तो उसने अपनी दोस्ती निभाने की सोची। वह वानर बड़े-बड़े नगरों, गावों, खानों और अहीरों की बस्तियों में आग लगाकर उन्हें जलाने लगा। बड़े-बड़े पहाड़ों को उखाड़कर चकनाचूर करने लगा। द्विविद वानर में दस हजार हाथियों का बल था।

 

कभी-कभी वह दुष्ट समुद्र में खड़ा हो जाता और हाथों से इतना जल उछालता कि समुद्रतट के देश डूब जाते। वह दुष्ट बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के आश्रमों की सुन्दर-सुन्दर लता-वनस्पतियों को तोड़-मरोड़ चौपट कर देता और उनके यज्ञसम्बन्धी अग्नि-कुण्डो में मलमूत्र डालकर अग्नियों को दूषित कर देता। ये स्त्रियों को भी उठाकर गुफा में ले जाता और फिर गुफा का मुह बंद कर देता था। एक बार यह रैवतक पर्वत पर गया। वहाँ उसने देखा कि यदुवंशशिरोमणि बलरामजी सुन्दर-सुन्दर युवतियों के झुंड में विराजमान हैं।

 

वह दुष्ट वानर वृक्षों की शाखाओं पर चढ़ जाता और उन्हें झकझोर देता। कभी स्त्रियों के सामने आकर किलकारी भी मारने लगता। बलरामजी की स्त्रियाँ उस वानर की ढिठाई देखकर हँसने लगीं । अब वह वानर भगवान बलरामजी के सामने ही उन स्त्रियों की अवहेलना करने लगा। वीरशिरोमणि बलरामजी उसकी यह चेष्टा देखकर क्रोधित हो गये। उन्होंने उस पर पत्थर का एक टुकड़ा फेंका। परन्तु द्विविद ने उससे अपने को बचा लिया। अब बलराम जी को क्रोध आ गया और उन्होंने अपना हल-मूसल उठाया। द्विविद भी बड़ा बलवान् था। उसने अपने एक ही हाथ से शाल का पेड़ उखाड़ लिया और बड़े वेग से दौड़कर बलरामजी के सिर पर उसे दे मारा। भगवान बलराम पर्वत की तरह अविचल खड़े रहे। उन्होंने अपने हाथ से उस वृक्ष को सिर पर गिरते-गिरते पकड़ लिया और अपने सुनन्द नामक मूसल से उस पर प्रहार किया। मूसल लगने से द्विविद का मस्तक फट गया और उससे खून की धारा बहने लगी।

 

 

अब द्विविद ने एक दूसरा वृक्ष उखाड़ा, उसे झाड़-झूड़कर बिना पत्ते का कर दिया और फिर उससे बलरामजी पर बड़े जोर का प्रहार किया। बलरामजी ने उस वृक्ष के सैकड़ों टुकड़े कर दिये। इसके बाद द्विविद ने बड़े क्रोध से दूसरा वृक्ष चलाया, परन्तु भगवान बलरामजी ने उसे भी सतधा छिन्न-भिन्न कर दिया। एक वृक्ष के टूट जाने पर दूसरा वृक्ष उखाड़ता और उससे प्रहार करने की चेष्टा करता। इस तरह सब ओर से वृक्ष उखाड़-उखाड़कर लड़ते-लड़ते उसने सारे वन को ही वृक्षहीन कर दिया । वृक्ष न रहे, तब द्विविद का क्रोध और भी बढ़ गया तथा वह बहुत चिढ़कर बलरामजी के ऊपर बड़ी-बड़ी चट्टानों की वर्षा करने लगा। परन्तु भगवान बलरामजी ने अपने मूसल से उन सभी चट्टानों को खेल-खेल में ही चकनाचूर कर दिया।

 

 

अन्त में द्विविद अपनी बाँहों से घूँसा बाँधकर बलरामजी की ओर झपटा और पास जाकर उसने उनकी छाती पर प्रहार किया । अब बलरामजी ने हल और मूसल अलग रख दिये तथा क्रुद्ध होकर दोनों हाथों से उसके जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह वानर खून उगलता हुआ धरती पर गिर पड़ा। आकाश में देवता लोग ‘जय-जय’, सिद्ध लोग ‘नमो-नमः’ और बड़े-बड़े ऋषि-मुनि ‘साधु-साधु’ के नारे लगाने और बलरामजी पर फूलों की वर्षा करने लगे। द्विविद ने जगत् में बड़ा उपद्रव मचा रखा था, अतः भगवान बलरामजी ने उसे इस प्रकार मार डाला और फिर वे द्वारका पुरी में लौट आये। उस समय सभी पुरजन-परिजन भगवान बलराम की प्रशंसा कर रहे थे।

 

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