Balram ji Braj Aagman Story in hindi

Balram ji Braj Aagman Story in hindi

बलराम जी का ब्रज आगमन

 

एक बार बलराम जी के मन में ब्रज जाने की इच्छा हुई। बलराम जी नन्द बाबा, ग्वाल बाल सबसे मिलना चाहते हैं। वे रथ पर सवार होकर द्वारका से नन्दबाबा के व्रज में आये । इधर उनके लिये व्रजवासी गोप और गोपियाँ भी बहुत दिनों से उत्कण्ठित थीं। उन्हें अपने बीच में पाकर सबने बड़े प्रेम से गले लगाया। बलरामजी ने माता यशोदा और नन्दबाबा को प्रणाम किया। उन लोगों ने भी आशीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया ।

 

यह कहकर कि ‘बलरामजी! तुम जगदीश्वर हो, अपने छोटे भाई श्रीकृष्ण के साथ सर्वदा हमारी रक्षा करते रहो, उनको गोद में ले लिया और अपने प्रेमाश्रुओं से उन्हें भिगो दिया । इसके बाद बड़े-बड़े गोपों को बलरामजी ने और छोटे-छोटे गोपों ने बलरामजी को नमस्कार किया। वे अपनी आयु, मेल-जोल और सम्बन्ध के अनुसार सबसे मिले-जुले । ग्वालबालों के पास जाकर किसी से हाथ मिलाया, किसी से मीठी-मीठी बातें कीं, किसी को खूब हँस-हँसकर गले लगाया। इसके बाद जब बलरामजी की थकावट दूर हो गयी, वे आराम से बैठ गये, तब सब ग्वाल उनके पास आये।

 

इन ग्वालों ने भगवान श्री कृष्ण के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सबका त्याग कर रखा था। बलरामजी ने जब उनके और उनके घर वालों के सम्बन्ध में कुशलप्रश्न किया, तब उन्होंने प्रेम-गद्गद वाणी से उनसे प्रश्न किया । ‘बलरामजी! वसुदेवजी आदि हमारे सब भाई-बन्धु सकुशल हैं न ? अब आप लोग स्त्री-पुत्र आदि के साथ रहते हैं, बाल-बच्चेदार हो गये हैं; क्या कभी आप लोगों को हमारी याद भी आती है ? यह बड़े सौभाग्य की बात है कि पापी कंस को आप लोगों ने मार डाला और अपने सुह्रद्-सम्बन्धियों को बड़े कष्ट से बचा लिया। यह भी कम आनन्द की बात नहीं है कि आप लोगों ने और भी बहुत-से शत्रुओं को मार डाला या जीत लिया और अब अत्यन्त सुरक्षित दुर्ग (किले) में आप लोग निवास करते हैं’।

 

 

बलरामजी के दर्शन से, उनकी प्रेमभरी चितवन से गोपियाँ निहाल हो गयीं। उन्होंने हँसकर पूछा—‘क्यों बलरामजी! नगर-नारियों के प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण अब सकुशल हो हैं न ? क्या कभी उन्हें अपने भाई-बन्धु और पिता-माता की भी याद आती है! क्या वे अपनी माता के दर्शन के लिये एक बार भी यहाँ आ सकेंगे! क्या महाबाहु श्रीकृष्ण कभी हम लोगों की सेवा का भी कुछ स्मरण करते हैं । आप जानते हैं कि स्वजन-सम्बन्धियों को छोड़ना बहुत ही कठिन है। फिर भी हमने उनके लिये माँ-बाप, भाई-बन्धु, पति-पुत्र और बहिन-बेटियों को भी छोड़ दिया। हमारे कृष्ण प्रेम का बन्धन काटकर, हमसे नाता तोड़कर परदेश चले गये; हम लोगों को बिलकुल ही छोड़ दिया। हम चाहतीं तो उन्हें रोक लेतीं; परन्तु जब वे कहते कि हम तुम्हारे ऋणी हैं—तुम्हारे उपकार का बदला कभी नहीं चुका सकते, तब ऐसी कौन-सी स्त्री है, जो उनकी मीठी-मीठी बातों पर विश्वास न कर लेतीं’।

 

फिर बलराम जी ने गोपियों की सभी शिकायते सुनी हैं और भगवान श्रीकृष्ण के ह्रदयस्पर्शी और लुभावने सन्देश सुना-सुनकर गोपियों को सान्त्वना दी। और वसन्त के दो महीने—चैत्र और वैशाख वहीं बिताये।

 

फिर बलराम जी ने यमुना का आकर्षण भी किया है और यमुना को थोड़ी दूर खींच दिया। यमुनाजी अब भी बलरामजी के खींचे हुए मार्ग से बहती हैं और वे ऐसी जान पड़ती हैं, मानो अनन्तशक्ति भगवान बलरामजी का यश-गान कर रही हों ।

 

इस तरह बलराम जी ने सबको सुख प्रदान किया।

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